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Monday 20 Nov 2017

निर्विकल्पता का अहसास करती एक कलाकृति

पल्लव
फ्लैट न. 393 डी.डी.ए., ब्लाक सी एंड डी, कनिष्क अपार्टमेन्ट
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ऐसी कितनी रचनाएं हैं जो पाठकों को लम्बे अरस्रे तक याद रहें, बार-बार पढ़ीं जाएँ और सबसे बढक़र अपने समय और समाज रूपक बनने योग्य हों। स्वयं प्रकाश की कहानी नीलकांत का सफर का स्मरण करते ही ये बातें जेहन में आती हैं। एक और बात ध्यान में आती है कि जमाना बहुत आगे बढ़ गया, देश बहुत तरक्की कर गया, बहुत खुशहाली आ गई लेकिन अभी भी सारे लोग खुशहाल नहीं हो पाए, परेशान हैं, मजबूर हैं। जब तक ऐसे लोग हैं स्वयं प्रकाश की यह कहानी पुरानी नहीं लग सकती और बाद में भी विगत की याद की तरह संभालकर कर रखने वाली रचना रहेगी। ऐसा क्यों है? कहानी को फिर से पढा जाए, वहीं से इसके रहस्य को समझा जाए तो बेहतर होगा।
कहानी बहुत छोटी है और घटनात्मकता से लगभग रहित। पात्र भी ज्यादा नहीं और ऐसी रोचक कि पाठक से छूटे न छूटे। होता यह है कि नीलकांत नाम के एक व्यक्ति रेल की यात्रा कर रहे हैं। तृतीय श्रेणी का उनका अनारक्षित डिब्बा रेल के आखिर में लगा था। डिब्बे में भारी भीड़ थी। लोग भेड़ बकरियों की तरह भरे हुए थे। नीलकांत जब चढ़े तो उन्हें पैर टिकाने की जगह भी संडास में मिल पाई, फिर वे बड़ी मुश्किल के साथ आगे तो बढ़े ,लेकिन आगे गर्मी बहुत थी। उन्होंने ध्यान दिया कि सारी खिड़कियाँ बंद हैं, उन्होंने बैठे हुए (और बेशर्मी से लेटे हुए) लोगों से कहा कि खिडक़ी खोल दें। जवाब मिला- नहीं खुलती। उन्होंने कोशिश की लेकिन सब बेकार। तरह तरह के विचार उनके मन में आते गए और गाड़ी आगे बढ़ती गई-गर्मी, गंदगी, भीड़ और घुटन के साथ। आगे एक स्टेशन पर आठ-दस काले-कलूटे फटेहाल मजदूर डिब्बे में चढ़ आते हैं। उनके साथ दो धाकड़ लुगाइयां भी थीं। फिर उन मजदूरों ने अपनी गेंती के जोर से खिड़कियाँ खोल दीं। खिड़कियाँ खुलते ही डिब्बे में उजाला हो गया,हवा आने लगी।
इस मामूली घटनाक्रम को स्वयं प्रकाश जिस अंदाज से बयाँ करते हैं वही कहानी को यादगार बनाने वाली चीज है और केवल यहाँ अंदाज नहीं पूरी प्रक्रिया है जिससे नीलकांत गुजरे हैं, उनके साथ साथ पाठक भी। इस प्रक्रिया के बाद पाठक वह नहीं रह जाता जो कि वह कहानी पढऩे से पहले था। कभी यहाँ कहानी का वाचक खुद बोल रहा है तो कभी नीलकांत के मन की बातें सुना रहा है। यह बोलना-सुनाना असल में स्वयं प्रकाश की अपनी कथा-प्रविधि है जिससे वे कहानी को कलाकृति बनाने में सफल हुए हैं। स्वयं प्रकाश ने यह कहानी जिस दौर में लिखी थी तब सोवियत संघ के सुनहरे दिन थे, भारत में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी संविधान में समाजवाद जैसे शब्द जुड़वा रही थीं और हर कोई मानता था कि दूसरी दुनिया संभव है। भारतीय वामपंथ की समझ यह थी कि मध्य वर्ग सबसे लोलुप वर्ग है जिसकी पूरी शक्ति अपने हित में लगी हुई है और बदलाव कोई ला सकता है तो वह मजदूर वर्ग ही है जो क्रान्ति करेगा। कहानी कहीं न कहीं उस समझ का भाष्य बनी है। अब समस्या यह कि किसी खास विचारधारा से परिचालित कोई रचना भला कलाकृति कैसे बन सकती है। आपत्ति बिलकुल भी गलत नहीं है और यहाँ भी आपत्ति संगत है। कहानी कलाकृति बनी है तो स्वयं प्रकाश की समझ और उनके कला कौशल से। देखें। कहानी में एक बहुत घिसा हुआ दृश्य है जिसमें मजदूर अपनी गेंती के जोर से खिडक़ी खोल रहे हैं, उन्हें सहयात्री देख रहे हैं और सब के सब मान रहे हैं कि हम पढ़े-लिखों से नहीं खुली तो इन अनपढ़ गंवारों से भला क्या खुलेगी। हद तो यह है-धीरे धीरे उन बांकों ने सारी खिड़कियाँ खोल दीं और सारे पसरे पैर और फैले हुए पु_े हटाकर रख दिए, ठाठ से बैठ गए और फिर हंसने लगे। खड़े हुए फिर चकित थे और कई मजदूरों के साथ उनकी बराबरी में बैठने को लालायित। इस स्टेशन से मानो सारे डिब्बे का नक्शा ही बदलना शुरू हो गया। हद यह कि क्रान्ति की मजदूरों ने और मध्य वर्ग जो दर्शक था अब उनके साथ बैठने को आतुर। यह है विचार का आरोपण। लेकिन कहानी यही नहीं है। कहानी इससे ज्यादा है। ज्यादा इसीलिए कि हालांकि नीलकांत भी इसी दर्शक मध्यवर्ग के प्राणी हैं लेकिन वे अब वही नहीं रहे। असल में स्वयं प्रकाश को जितना भरोसा मजदूर वर्ग पर है उतनी ही आशा मध्य वर्ग से भी है। वे इसे बिलकुल नाकारा नहीं मान सकते। उन्हें लगता है कि धक्के खाकर, रगड़-रगड़ कर यह वर्ग भी अपने स्वार्थ से बाहर निकल सकेगा। भला यह कैसे? इसे भी कहानी में ही देखें, एक लंबा उद्धरण देखना होगा ताकि बात साफ हो सके। यहाँ मजदूरों के आने से पहले नीलकांत सोच में डूबे हैं और रेल की इस हालत पर विचार कर रहे हैं। स्वयं प्रकाश लिखते हैं-सोचने लगे। फिर से उलझ गए। पर सोचने तो लगे। हालांकि नतीजे तक नहीं पहुंचे। पर उलझे तो। पर पता नहीं, क्यों इन चीजों पर सोचने लगे, हालांकि पढ़ते तो धर्मयुग,इलेस्ट्रेट वीकली वगैरह ही हैं। वे लोग तो चाहते थे कि नीलकांत प्रदूषण के बारे में सोचें, परामनोविज्ञान और आधुनिक प्रेत विद्या के बारे में सोचें, स्वीडन के मुक्त यौवन और अमरीका की स्वतंत्र पत्रकारिता के बारे में सोचें, सोचें कि शास्त्रीजी मरे या उनकी हत्या हुई ...पर वे तो अपनी दुर्दशा के लिए दोषी कौन हंै? इस पर सोचने लगे! गजब हो गया!! खैर, सेठजी चिंता न करें, नीलकांत इन तकलीफों के बारे में तभी तक सोचेंगे, जब तक उन्हें बैठने के लिए ठीक-ठाक जगह नहीं मिल जाती, या हद से हद जब तक यह सफर जारी है। गाड़ी से उतर जाने पर वह गाड़ी के बारे में सब भूल जायेंगे और फिर यही सोचने लगेंगे, जो सेठ लोग सोचवाना चाहते हैं। पर क्या पता? अगर कल कोई दूसरी तकलीफ आयी- आयेगी ही- और वे सोचने लगे कि उसका असली जिम्मेदार कौन है-तो....? यह तो मामूली नहीं है। वस्तुत: व्यवस्था को देखना, समझना और उस पर सवाल खड़ा करना ही व्यवस्था को बदलने की बुनियादी शुरुआत है। जिस व्यवस्था में विचारों पर ऐसा पहरा हो कि आपका सोचवाना भी दूसरे तय कर रहे हैं तब भला बदलाव कैसे करीब लग सकता है। ध्यान से देखिये स्थिति में बहुत फर्क नहीं आया है। रेल के डिब्बे भले बदल गए लेकिन भीड़ वही है, और बढ़ गई है, संकट गहरा ही हुआ है। संकट की पहचान करने की शक्ति मध्य वर्ग प्राप्त करना जान जाए तब? नीलकांत में आया बुनियादी विचार ऐसे ही नहीं आ गया है इसके लिए स्वयं प्रकाश पूरी प्रक्रिया बता दे रहे हैं जिससे असहमत नहीं हुआ जा सकता। 1980 के आसपास इस तरह से स्थितियों की व्याख्या करने का कौशल देने वाली रचनाओं की खोज कीजिये पसीना आ जाएगा। यह वह जमाना था जब हिन्दी कहानी नयी कहानी के बाद हो रहे कहानी आन्दोलनों की जोर-आजमाइश में हलकान हुई जा रही थी। कहना न होगा कि विचारधारा का ऐसा सजग और कलापूर्ण संस्कार कहानी को फिर से पटरी पर ला पाया। इस समय की असगर वजाहत, पंकज बिष्ट और संजीव की कहानियों को पढेंग़े तो बात साफ हो जायेगी।
आम तौर पर इस कहानी की भाषा और कहन की बहुत चर्चा होती है। सबसे पहले शीर्षक ही देखें -नीलकांत का सफर, सफर ही क्यों? यात्रा क्यों नहीं? सोचने पर उत्तर मिलता है। अंगरेजी का सफर याद आ जाता है जब हम कहानी पढ़ चुके होते हैं और फिर आज भी आम हिन्दुस्तानी की बोली में यात्रा नहीं सफर ही शब्द है। स्वयं प्रकाश भाषा की ऐसी बारीकियों पर कड़ी नजर रखते हैं और इसीलिए वे कहानी में आए प्रसाधन की खबर ले सके हैं। कहानी के अंश बहुत याद किये जाते हैं- चूंकि वह जनता थे, इसलिए थर्ड क्लास में सफर कर रहे थे और चूंकि वह थर्ड क्लास था, इसलिए ट्रेन के आखिरी डिब्बे का आखिरी कम्पार्टमेंट था। बाकी ट्रेन या तो फस्र्ट थी या शयनयान या आरक्षित या और कुछ। लगता था, साधारण थर्ड के इस कम्पार्टमेंट को भी पीछे मात्र दयावश या औपचारिकता निभाने के लिए जोड़ दिया गया है। यह कहानीकार की व्यंजना की शक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण है। स्वयं प्रकाश अपनी इस शैली और समझ के लिए जाने जाते हैं कि चुहल करते हुए अचानक ऐसी जगह पाठक को खड़ा कर देंगे कि वह विचार से भाग न सके। पाठक को विवेकवान नागरिक बनाना जैसे उनका धर्म हो। हिन्दी कहानी की यह रवायत पुरानी है। प्रेमचंद के बाद अमरकांत के साथ हरिशंकर परसाई ने ऐसा बहुत किया है। स्वयं प्रकाश का अंदाज निराला इसलिए है कि वे सही जगह का चुनाव करना जानते हैं और सही जगह सही मार करना भी। जब खिडक़ी नहीं खुल रही थी और भारी भीड़ से लोग परेशान थे। तब देखिये- एक गाय जैसे चेहरे वाले बाबा नहीं खुलती तो छोड़ो, बर्दाश्त कर लो की अपील कर रहे थे। एक उग्र से व्यापारी सज्जन कह रहे थे साले सब रेलवाले व्यापारी चोर हैं (इसलिए खिडक़ी को छोड़ो वह नहीं खुलेगी।) ऊपर की सीट पर आराम से बैठा एक दढिय़ल गरज रहा था-तोड़ दो। मैं कहता हूँ, तोड़ दो नहीं खुलती तो। यहाँ इस वर्णन के बीच में स्वयं प्रकाश लेखकीय हस्तक्षेप करते हैं, व्यापारी के बयान पर, इसे कहानी में कोष्ठक में दिया गया है-इसलिए खिडक़ी को छोड़ो वह नहीं खुलेगी। यह हस्तक्षेप जहां पाठक को तीखे व्यंग्य का अहसास करवाता है वहीं उग्र व्यापारी की असली नीयत पहचानने की समझ भी दे रहा है। यहाँ देखें ये कौन-कौन लोग हैं जिनके बोलने को लेखक कहानी में नोट कर रहा है। बाबा,व्यापारी,दढिय़ल.... अर्थात? स्वयं प्रकाश इशारे-इशारे में सब कह रहे हैं और खबर ले रहे हैं। विचारधारा की समझ का मतलब यह नहीं होता है कि पार्टी के अनुयायी बन जाएँ। स्वयं प्रकाश बहुत ध्यान से आब्जर्व कर रहे हैं और तभी दढिय़ल की हरकत पर भी व्यंग्य कर सके हैं। ऐसे ही कहानी में मजदूरों के साथ उनकी औरतें आई हैं, स्वयं प्रकाश उन्हें औरतें नहीं लुगाइयां कहते हैं। उन लुगाइयों के बारे में दिया गया वर्णन पढें़ तो औरतों को देखने और उनके बारे में सोचने के मध्यवर्गीय ढंग को चोट लगती है। स्वयं प्रकाश उनकी कांचली (ब्लाउज) का जिक्र करते हैं तो उनकी जूतियों की मार की कल्पना भी साथ-साथ करवाते चलते हैं-पड़ जाय तो थोबड़ा लहूलुहान हो जाय। कहानी का एक और अंश देखा जाए-नीलकांत की इच्छा हुई, वापस उसी संडास में चले जायें। खड़े यहाँ भी हैं,वहां भी थे। वहां थोड़ी बहुत हवा तो थी, माना कि बदबू और गंदगी और सबसे ज्यादा अपने संडास में होने का अहसास - ऐसी ही कुछ परेशानियाँ थीं, पर यहाँ क्या कम परेशानी है? और सुविधा क्या है? सिवा इस गरिमा के कि डिब्बे में हैं, संडास में नहीं? लिहाजा चलो वापस संडास में। यह है बेचैनी? निर्विकल्पता का अहसास करवाने वाली बेचैनी। एक कलाकृति भला कर भी क्या सकती है?
(कहानी के सभी उद्धरण स्वयं प्रकाश की पुस्तक- सूरज कब निकलेगा, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली के द्वितीय संस्करण 1983 से लिए गए हैं।)