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Thursday 23 Nov 2017

मारांग दाई नहीं रहीं (महाश्वेता देवी- जन्म- 1926, मृत्यु- 2016)

राधा बोस
बूढ़ापारा शिशु शिक्षा केन्द्र के पास, गोपाल मंदिर वाली गली
बूढ़ापारा, रायपुर (छ.ग.)
चली गई महाश्वेता देवी- एक जिद्दी- सर उठाकर जीने वाली ज्वलंत अग्नि शिखा, साहित्यिक शरत्चन्द्र के जाने के बाद लोगों ने सोचा- अब उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। परिस्थितियों में रहकर समस्याओं से रूबरू जूझते हुए गरीब दलित, लांछित, आदिवासी, किसानों को तब ममत्व-संवेदना से महाश्वेता ने न केवल अपनाया, वरन उन सबका प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हें एक सम्मानजनक पहचान देने हेतु उनकी विद्रोही वाणी शासन के खिलाफ सोच्चार हो उठी थीं। वामपंथी विचारधारा वाली महाश्वेता ने अपनी जीवन चेतना से समाज में बदलाव लाना चाहा, बलात्कार लांछिता को समाज में आदर और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है, आजीवन आदिवासियों के बीच रहकर उनके दुखदर्द को जीया, उन्हें संघर्ष का पाठ पढ़ाया, मार्गदर्शन किया। वे उनके बीच माता की भूमिका निभाती थी, इसीलिए उनके निधन के शोक समाचार से वे रो पड़े। हमारी ‘मारांग दाई’ चली गई, अपनी थाली का आधा भात हमें खिलाने वाली ‘मारांग दाई’ नहीं रही।
महाश्वेता देवी लेखिका थीं ही लेकिन किसी ने उनकी परिस्थिति का सजीव चित्रण करते देख उन्हें एक सशस्त्र पत्रकार भी कहा है। वे व्यक्तित्व की धनी थी, न कभी उन्हें नाम और यश की लालसा रही और न ही उन्हें कभी धन कमाने की सृष्टा रही, वरन अपना सब कुछ लुटाकर सदैव समाज चेतना को जागृत करने की राह पर चल पड़ी थीं। यहां तक उन्होंने इसके चलते अपने पारिवारिक जीवन से भी समझौता नहीं किया।  किसी ने ठीक कहा है महाश्वेता की लेखनी से मसि नहीं आग बरसती है। स्मरण आता है वह प्रसंग जब लांछिता आदिवासी बाला तहकीकात के नाम पर आए हुए अधिकारी के आदेश को ठुकराते हुए निर्वस्त्र उनके सामने उपस्थित होकर पूरी शक्ति से घृणा बरसाते हुए उनकी वर्दी पर थूक देती है। आक्रोश का यह स्तब्ध कर देने वाला वर्णन कोई क्या भूल सकता है। उसी प्रकार ‘हजार चौरासी की मां’ में एक मां की तड़प- जिसके बेटे की पहचान हजार चौरासी नम्बर भर कर रह गई। ‘रूदाली’ में वंचिता नारी का रूदन क्या कोई भूल सकता है। इन फिल्मों ने अनेक पुरस्कार बटोरे। कितने लोग जानते हैं कि इन कृतियों की जीवनदायिनी लेखिका महाश्वेता जी हैं।
महाश्वेता देवी की सामाजिक चेतना इतनी प्रखर थी कि वे समय से आगे चलती थी। मणिपुर में जब विद्रोह हुआ था तब बहुतों ने उस विषयवस्तु को भुनाया किन्तु एकमात्र महाश्वेताजी ही ऐसी थीं कि उस विद्रोह से पांच-छ: वर्ष पूर्व ही अपने लेखों में इसका स्पष्ट संकेत कर दिया था।
महाश्वेता देवी के देहावसान पर किसी ने कहा ‘आज बंगला साहित्य का मातृ-वियोग हो गया’, लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। वे मिट्टी से इस कदर जुड़ी थी कि अनुवाद के माध्यम से लोग उन्हें, चाहे वे किसी भाषाभाषी के क्यों न हो, अपने नदीक ही पाते रहे। सभी पाठकों को लगता- ‘अरे! यह तो अपनी जन्मभूमि कथा है।’ उनकी मुख्य कृतियां- हजार चुरासी की मां, रूदाली, तीतुमीर, आऊटकास्ट, संघर्ष, अग्निगर्भ, द्रौपदी, अरण्येर अधिकार, झांसी की रानी, गल्फ समग्र हैं। वह स्वयं तब एक इतिहास थी, जिन्होंने समाज के बदलाव को चाहा, स्वीकारा। वे कभी यश-सम्मान की अपेक्षा नहीं की, मानदेयक पुरस्कार स्वयं धन्य हुए जो उन्हें दिए गए- मैग्सेसे पुरस्कार- (1997), पद्मविभूषण (2006), बंग विभूषण (2011), साहित्य एकादमी आदि एक लम्बी श्रृंखला है।
उसके देहावसान से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। विभिन्न राजनेता, अभिनेता, साहित्यिक सभी ने उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त किया किन्तु एक लेखक की मृत्यु नहीं होती, यह उनका पुनर्जन्म है, महाश्वेता देवी थीं-रहेंगी।