Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

महाश्वेता देवी : व्यक्तित्व और रचना दृष्टि

डॉ.ऋचा शास्त्री
T-2/श-हरिश्चन्द्र पाण्डेय,साईं रेजीडेन्सी,opp-BOB,  हरुनगला ,बरेली,243006
मो. 8755192890
भारतीय साहित्य में महाश्वेता देवी एक प्रतीक बन गयी हैं। वे प्रतीक हैं जीवन और साहित्य के जुड़ाव की। अर्थात् उनके साहित्य को उनके जीवन से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। उनकी लेखकीय दिनचर्या उनके जाने-माने जीवन का आख्यान कहना है। जो भी दबे-कुचले लोग उनके जीवन में आए उन्हीं की कहानियाँ उन्होंने रच डालीं। इन कहानियों की दो धाराएँ हैं। एक इतिहास पर आधारित, दूसरी उनके देखे-सुने साम्प्रतिक जीवन पर आधारित। ये दोनों दृष्टियाँ उनमें क्यों पैदा हुईं इसके लिए उनके प्रारम्भिक जीवन की परिस्थितियाँ,उनकी शिक्षा-दीक्षा,उनके पारिवारिक परिवेश,उनके माता-पिता का उन पर पड़ा प्रभाव, फिर उन्होंने अपने आसपास से क्या प्रेरणाएँ ग्रहण कीं,इन सभी स्रोतों पर विचार करना पड़ेगा।
उनका जन्म 1926 ईस्वी में ढाका के एक मध्यवित्तीय परिवार में हुआ था। उनके पिता मनीष घटक बीमा के काम से निरन्तर घूमते रहते थे। उनकी माँ धरित्री देवी को ही घर-परिवार का सारा दायित्व संभालना पड़ता था। पिता और मामा अर्थात् ननिहाल दोनों ही जगह का वातावरण कला, संस्कृति और रचनात्मक दृष्टि से बड़ा ही उर्वर था। उनके पिता मनीष घटक यशस्वी कवि, साहित्यकार और वर्तिका पत्रिका के संपादक थे। वे युवनाश्वर नाम से कहानियाँ तथा आलेख आदि लिखते थे। उनकी माता धरित्री देवी भी लेखिका, अनुवादिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं।
एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा है - मैं उपेक्षित, वंचित बच्चों को पढ़ा रही हूं। उनके सामाजिक कार्य के पीछे इस प्रकार का कोई अहंकार नहीं था। उन्होंने आगे कहा है, माँ में मुझे जो सबसे सुन्दर चीज लगती थी, वह थी उनकी दिनचर्या, जीवन-यापन करने का ढ़ंग। खाना-खाना, इधर-उधर का काम,परिवार संभालना,लिखना-पढऩा करना, इसके साथ ही उन्होंने वंचित बच्चों को पढ़ाना सीख लिया था। चूंकि महाश्वेता देवी का जन्म अपने मामा के यहाँ हुआ था, बचपन भी उनका कुछ समय वहीं बीता था इसलिए उनकी नानी के जीवन का भी उन पर प्रभाव पड़ा था। उन्होंने बताया है कि खाने-पीने के बाद मैंने भी अपनी नानी को बचपन में पड़ोसियों की लड़कियों को पढ़ाते देखा था। प्रारम्भिक गणित की नींव, तैयार करा देती थीं। थोड़ी तैयारी हो जाने के बाद, मेरी दो मौसियाँ थीं, उस समय भी उनका विवाह नहीं हुआ था, उनका काम था, छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों को ले जाकर स्कूल में भर्ती करा आना। उन्होंने आगे बताया है कि नारी शिक्षा के लिए उस समय कई शिक्षा निकेतन खुल गए थे। अपनी माँ की शिक्षा-दीक्षा के बारे में उन्होंने बताया, मेरी माँ खुद किसी स्कूल में पढऩे नहीं गयीं। किन्तु, उन्होंने परिश्रम करके खूब पढऩा-लिखना सीख लिया था। दूसरों को पढऩा-लिखना सिखाना वे अपना कर्तव्य मानती थीं। उनकी माँ को पुस्तकों से अगाध प्रेम था। उन्होंने पांचाली काव्यों के अलावा बंकिम, रवीन्द्र, शरत के सारे उपन्यास पढ़ डाले थे। वे अंग्रेजी भी जानती थीं और जैसे-तैसे बोल भी लेती थीं। उन्होंने अंग्रेजी से बाङ्ला में पर्ल बक के उपन्यास का अनुवाद भी किया था। पर्ल बक के बारे में उन्होंने एक घटना की चर्चा करते हुए बताया है, मेरे बड़े मामा शचीन चौधुरी इकोनोमिक एण्ड पॉलिटिकल वीकली के संस्थापक संपादक थे। उन्होंने एक बार महाश्वेता देवी की माँ से कहा कि चीनी उपन्यासकार पर्ल बक बम्बई आयी हुई हैं, तुम उनसे मिल जाओ। तो उनकी माँ पर्ल बक से मिलने बम्बई गयी थीं। माँ उनसे मिल आयीं, आगे महाश्वेता देवी ने बताया कि खूब धारावाहिक अंग्रेजी नहीं बोल पाती थीं। किन्तु,उन्होंने शुद्ध अंग्रेजी में बात की थी। पर्ल बक अवाक् होकर कहने लगीं,ओ तुमने इतना सब पढ़ रखा है? मां, इस पर बोलीं, मैंने आपकी ये-ये पुस्तकें पढ़ी हैं। आपकी एक पुस्तक का अनुवाद भी किया है। यह अनुवाद वसुमती में धारावाहिक निकला भी है।
महाश्वेता देवी की शिक्षा-दीक्षा ने उनके व्यक्तित्व के तंतुओं का निर्माण किया और उनके लेखकीय जीवन को दिशा दी। प्रारम्भिक शिक्षा मेदिनीपुर (मिदनापुर) के ईडेन मांटेसरी स्कूल और मिदनापुर मिशन स्कूल में। स्कूली शिक्षा शान्तिनिकेतन (1936-38), फिर बेलतला हाईस्कूल (1939-1942) में, जहां से उन्होंने मैट्रिक पास किया। आशुतोष कॉलेज कलकत्ता से आई.ए. (1944), शान्तिनिकेतन से बी.ए.(ऑनर्स) अंग्रेजी में(1946)। 1946 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम.ए.(अंग्रेजी) में दाखिला पर निजी कारणों से पढ़ाई छोडऩी पड़ी। अंतत: 1963 में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.। ये तथ्य डॉ. माहेश्वर ने अपने आलेख में उद्धृत किये हैं किन्तु, महाश्वेता देवी के जीवन और उनकी व्यक्ति सत्ता पर सर्वाधिक प्रभाव शान्तिनिकेतन में बिताए दिनों का पड़ा है। उन्होंने स्वयं बताया है, मुझे दस बरस की उम्र में ही बाबा ने शान्तिनिकेतन में भर्ती करा दिया था। कारण, बाबा आज यहां, कल वहाँ। शान्तिनिकेतन में उस वक्त छोटे बच्चों के लिए कक्षा 3 से क्लास शुरू ही हुए थे। मुझे कक्षा 1 में भर्ती कराया गया था। 1936 से लेकर 1938 तक मैं वहाँ पढ़ी थी। ये दो वर्ष उनके जीवन में कितने महत्वपूर्ण रहे हैं और किस तरह इस कालावधि ने उनके जीवन पर कितना गहरा प्रभाव डाला है, इस सन्दर्भ में उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया है कि शान्तिनिकेतन का रहना मेरे जीवन में आशा से भी अधिक महत्वपूर्ण है। उस समय रवीन्द्रनाथ जीवित थे, तब शान्तिनिकेतन दूसरे प्रकार का था। शान्तिनिकेतन के उन पर पड़े प्रभाव के बारे में उन्होंने कहा है, मैं तो कहती हूँ मैंने जो पाया है,कर्म प्रवणता और चलते रहने की शिक्षा, वह शान्तिनिकेतन में ही पायी है। हम लोगों से यह करो, वह करो ऐसा तो कहा नहीं जाता था। भोर में सिंह सदन में घंटा बज जाता था, हम जानते थे, यह भोर बेला का घंटा है, तत्क्षण उठ बैठते थे, उसके बाद वाले घंटे पर तैयार हो जाने का दौर शुरू हो जाता था। इसी तरह से पूरी दिनचर्या चला करती थी। किसी से कुछ कहना नहीं पड़ता था। आसन लेकर सीधे आश्रम में जाना पड़ता था। इस प्रभाव के निष्कर्ष स्वरूप उन्होंने कहा है, वहां मैंने जो कुछ सीखा था,वह था ठीक समय पर तैयार होना होगा,ठीक समय पर क्लास में जाना होगा,इसके बाद यह काम करना होगा अर्थात् निरन्तर कर्म-प्रवण रहना होगा। निरन्तर कर्मशील। शान्तिनिकेतन का यह प्रभाव उनके जीवन में हमेशा विद्यमान रहा। इसी ने उनके कर्म-जीवन और सृजन को निरन्तरता दी है।
शान्तिनिकेतन के केन्द्र में थे रवीन्द्रनाथ। वही उसके प्राण पुरुष थे। महाश्वेता देवी पर इनका प्रभाव क्या पड़ा इसका उन्होंने अपनी आत्मकथा तथा अन्य कई जगह उल्लेख किया है। शान्तिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ स्वयं क्लास लेते थे। महाश्वेता देवी ने कहा है, मैं तो कुछ समझती नहीं थी। रवीन्द्रनाथ से कह दिया था, तुमने इतना क्यों लिखा है? मैं तो इतनी पुस्तकें पढ़ नहीं पाती हूं।
जीवन में कर्मशील रहने के अलावा उन पर शान्तिनिकेतन के जो अन्य प्रभाव पड़े वे हैं- सौन्दर्य और सुरुचि का विकास, प्रकृति का सानिध्य, अखिल भारतीय दृष्टि का अंकुरण और बाङ्ला ही नहीं देश की सभी भाषाएं अपनी भाषाएँ हैं, इस विशाल भाषायी संवेदना का विकास।
उन्होंने अपनी आत्मकथा के एक अंश में लिखा है, सन् 1936 में मैं शान्तिनिकेतन में चौथी कक्षा में भर्ती हुई। शान्तिनिकेतन में पहला और प्रचंड विस्मय मैं कभी नहीं भूल सकती। उद्वेलित हो उठना। आखिर, मैंने ऐसा क्या देख लिया? स्वयं से प्रश्न करते हुए महाश्वेता देवी ने लिखा है- वहाँ निर्मित श्री भवन, कला भवन, रसोई घर के सामने चैती, सिंह सदन, मंदिर, पुराना गेस्ट हाउस, उत्तरायण के बीच में खड़ा उदयन, कोणार्क, श्यामली (आंधी में ढह जाने के बाद, जिसे दुबारा बनाया गया है), उदीची- हर भवन की अपरूप निर्माण-शैली। इसके पहले महाश्वेता देवी ने जिला, शहर, उपनगर, गंज वगैरह देखे थे। सरकारी भवन, कोठियां देखी थीं। उनकी निर्माण-शैली एकरस, सौन्दर्य-विहीन थी। शान्तिनिकेतन में ऐसी बात नहीं थी। वहां सभी भवन इस कदर खूबसूरत थे कि अनायास ही कहा जा सकता था-जा पहुँचे हैं किसी नये, निराले देश में। वहाँ के कपड़े, झोले, विस्तर के बेड कवर, दरवाजों के पर्दे सभी पर एक सौन्दर्य की छाप थी।
फिर प्रकृति के साथ एकात्मता का पाठ भी उन्होंने वहीं पढ़ा। उन्होंने लिखा है, रवीन्द्रनाथ शान्तिनिकेतन के जरिये किन-किन भावनाओं और विचारों को मूर्त करना चाहते थे, उनके दिमाग में शिक्षण का कौन-सा रूप आकार ले रहा था- यह वहाँ जाकर ही जाना जा सकता है। मैंने वहां, शिशु विभाग की छात्रा के तौर पर कदम रखा था। शान्तिनिकेतन पहुंचकर मैं अपने जूते उतार देती थी। सर्दी, गर्मी के मौसम में मैं सिर्फ छुट्टियों के दिनों में ही जूते पहनती थी। वैसे सुबह से शाम तक नंगे पाँव घूमती फिरती थी। लाल मिट्टी की सडक़ों पर हर ओर उछलती, कूदती, दौड़ती रहती थी। वहाँ कम-से-कम कोई रोक-टोक नहीं थी। बड़े ही सहज भाव से रवीन्द्रनाथ के पास पहुंच जाती थी और सभ्य, शरीफ ढंग से उन्हें प्रणाम करती थी। फिर उन्होंने आगे लिखा है कि किस तरह रवीन्द्रनाथ उन्हें हाथ के इशारे से बुलाकर शान्त होकर, चुपचाप बैठने को कहते थे और स्वयं निश्चल देह समाधिस्थ हो जाते थे। उन्होंने लिखा है, ऐसा लगता मानो उस प्रचंड तपिश, धधकते हुए सूरज और उबलती हुई गर्मी के साथ मिलकर वह मनुष्य एकाकार हो गया हो। उस वक्त वे प्रकृति के साथ, बिल्कुल एकात्म हो जाते थे। बिल्कुल इसी तरह उदयन के कमरे में भी वे निश्चल, समाधिस्थ नजर आते थे। उत्सव के दिनों में बाहर चलती हुई बयार मंदिर के पीछे पहाड़ों पर खड़े पेड़ों की झूमती फुनगियों पर उनका नर्तन, आकाश का समुन्दर चीरकर तैरते हुए काले मेघ- ये तमाम नजारे महाश्वेता जी को आज भी याद आते हैं जिन्होंने उनमें प्रकृति के प्रति प्रेम, आदिवासियों के सुख-दु:ख के साथ लगाव पैदा किया है और पुष्ट किया है उनका सौन्दर्य बोध। महाश्वेता देवी में अखिल भारतीय दृष्टिकोण का विकास कैसे हुआ, कैसे वे अपने को आज अखिल भारतीय लेखिका कहती हैं सिर्फ बाङ्ला लेखिका ही नहीं, इसके मूल में शान्तिनिकेतन में बिताए उनके दिन हैं। उन दिनों को याद करते हुए उन्होंने लिखा है, हमारी क्लास में मौजूद थे बीरेन बरुआ (आसाम से), पद्मा मन सुखानी, गुलाब श्रीवास्तव (बिहार से),जॉली बरुआ (आसाम), पद्मा (सिंधी), गुल चाँदी रानी भी हमारी क्लास में पढ़ती थी। उत्तर पंजाब से आयी थी अमीना आया। जया अप्पासामी कलाभवन में पढ़ती थी। बेहद लम्बा कद। बेहद दुबली-पतली। बेहद गुणवन्त ये लोग संगीत भवन और कलाभवन में रहती थीं। इस तरह बहुतेरी लड़कियाँ अपने-अपने क्षेत्र में दक्ष थीं। ये सभी लड़कियाँ मिलजुल कर श्री भवन में ही रहती थीं। वहाँ जया दी (चेन्नई), कुट्टी दी (चेन्नई), लीला एण्ड्रूस (दक्षिण भारत), राजेश्वरी वासुदेव (बाद में दत्त), विष्णु अगसारिया (गुजरात), भगवानी ईरानी (सिंधी),मृणालिनी स्वामिनाथन (साराभाई), सुनील मोहिनी (सिंधू),अमीना वगैरह अनगिनत गुजराती लड़कियां। हिमालय से आयीं थीं गौरा दी यानी गौरा पंत अर्थात् शिवानी।
रवीन्द्रनाथ ने 1901 में ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना की थी। प्राचीन तपोवनों के आदर्श पर। विद्यार्थी जब इस आश्रम में पढऩे आते थे तो वे लोग प्रकृति की गोद में होते थे। वे अनजाने में ही प्रकृति का पाठ सीख लेते थे। यह शिक्षा पद्धति नितांत भारतीय थी। लेकिन उनका आदर्श यह भी था कि तपोवन का रिश्ता समूची दुनिया से जुड़ा हो। इस प्रकार महाश्वेता देवी के व्यक्तित्व में जो सर्वभारतीय दृष्टिकोण है, अरण्य और अरण्यवासियों के प्रति उनकी जो प्रीति है, उसकी प्रेरणा और संस्कार उन्हें शान्तिनिकेतन में बिताए जीवन से मिले।
पुस्तकों के प्रति प्रेम उन्हें विरासत में मिला था अपनी माँ, पिता मनीष घटक और मामा शंख चौधुरी से। शान्तिनिकेतन में आकर उनका यह शौक परवान चढ़ा उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, किताबें पढऩे के मामले में भी मैं ऐसी ही हूँ। बाङ्ला में प्राचीन युग से बीसवीं शती के पांचवें दशक तक की किताबें पढ़ीं, उसी हद तक अंग्रेजी किताबें और उनके अनुवाद पढ़े। इसके अलावा अन्यान्य भाषाओं के साहित्य का जिस हद तक अध्ययन किया,उसी हद तक शिकार, वन और जीव-संरक्षण जगत् पर लिखी गयी किताबें भी पढ़ डालीं। उसी हद तक जासूसी उपन्यास और भूतों के किस्सों, कहानियों से अपना दिमाग भरा है। मैं ऐसी ही हूँ। अपनी मर्जी मुताबिक चलने वाली इन्सान। अतिशयता की हद तक। अतिशयता की इसी प्रवृत्ति ने उन्हें जोखिम लेने, और लेखन के क्षेत्र में नया अनुसन्धान करने को प्रेरित किया, इसी प्रवृत्ति ने उन्हें जीविका के रूप में नौकरी छोडक़र लेखन को अपनाने की प्रेरणा दी। रवीन्द्रनाथ के संबंध में उन्होंने दो महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया है एक प्रकृति से सिर्फ ग्रहण करने का स्वभाव, दूसरे नये-नये सृजन की प्रेरणा। उन्होंने लिखा है, मेरा विश्वास है कि चाहे जाड़े का मौसम हो या गर्मी का या बरसात का, वे जो यूं प्रकृति में तल्लीन होकर बैठे रहते, दरअसल वे प्रकृति ग्रहण करते थे। सिर्फ और सिर्फ आत्मसात करते थे।  सन् 1936-38 के दौरान उन्हें जितना देखा वे नये-नये सृजन की प्रेरणा में तन्मय नजर आए। शान्तिनिकेतन से जैसे उन्हें जातिभेद, प्रान्त भेद से ऊपर उठकर पूरा भारत एक है, इस प्रकार की अखिल भारतीय दृष्टि मिली थी। उसी प्रकार संकीर्णता से ऊपर उठकर सभी भाषाओं का प्राण सुर एक ही है, यह संस्कार भी मिला था। उन्होंने लिखा है बाङ्ला भाषा को महत्व देने के लिए 1939-40 में कलकत्ता की सडक़ों, गलियों, राहों, दुकान-पाट के नाम परिचय बाङ्ला में दिये जाएँ, ऐसा आन्दोलन मेरी दृष्टि में पड़ा था। रवीन्द्रनाथ ऐसे विभेद और संकीर्णता के नितांत विरोधी थे। उन्होंने लिखा है, हम तो अपने जमाने में बाङ्ला, सिंधी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, सिंहली, बिहारी, चीनी, जापानी भाषा  मिलजुल कर साथ-साथ पढ़ते थे। शिक्षा का माध्यम ही था बाङ्ला। हमें कोई असुविधा नहीं होती थी। उन्होंने आगे अपने उदार दृष्टिकोण का परिचय देते हुए लिखा है, यह जो समूची दुनिया में एक ही जाति है और वह है इन्सान की जाति यह सच्चाई बचपन में हम अपने रोजमर्रा के सबक में ही सीख लेते थे। मुझे अमीर-गरीब का मामला खास समझ में नहीं आता था। अपने विद्यार्थी जीवन में मैंने देखा है कि मणिपुर राजा की दुहिता विनोदनी भी हमारे साथ ही रहती थी और पढ़ती-लिखती थी। हमारे साथ कूचविहार की भी दो राजकुमारियाँ पढ़ा करती थीं। इला और कमला कला भवन में निजाम वंश की भी दो राजकुमारियाँ पढ़ा करती थीं। उन दिनों आर्थिक, सामाजिक स्थिति की विभिन्नता के बारे में किसी का ख्याल तक नहीं होता था। इसी का नाम है, रवीन्द्रनाथ के जीवन काल का शान्तिनिकेतन।
 महाश्वेता देवी का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। उन्होंने दो बार विवाह किया। एक बार बंगाल के विख्यात रंगकर्मी और नाटककार विजन भट्टाचार्य से(1947) और दूसरी बार लेखक असित गुप्त से। दूसरे विवाह को उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल मानी। विजन भट्टाचार्य से उन्हें एक संतान हुई नवारुण भट्टाचार्य, जो स्वयं एक लेखक थे। विजन भट्टाचार्य कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाइमर थे। उनकी विचारधारा ने महाश्वेता देवी की जीवन दृष्टि और उनकी रचनाओं के पीछे छिपे दृष्टिकोण को प्रभावित किया। एक तरह से दबे-कुचले, शोषित आदिवासियों के प्रति उनमें जो सहानुभूति है उसके पीछे कुछ-कुछ प्रगतिशील विचारधारा का हाथ है।
 परिवार का खर्चा चलाने और जीवकोपार्जन के लिए उन्हें रंग, साबुन का चूरा बिक्री करने से लेकर ट्यूशन करने और अमेरिका को बंदर सप्लाई करने का टेंडर भरने की असफल कोशिश जैसे तरह-तरह के काम करने पड़े। उन्होंने कुछ दिनों (1948-49) पद्मपुकुर स्कूल की प्रात:कालीन पाली और बाद में रमेश मित्र बालिका विद्यालय में एक वर्ष अस्थायी रूप से शिक्षण का काम किया। 1949-50 में केन्द्र सरकार के पोस्टल ऑडिट में उच्च श्रेणी की लिपिक हो गयी। यहाँ से कम्युनिस्ट होने के संदेह में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। फिर उन्होंने दस वर्ष तक विजयगढ़ के ज्योतिष राय कॉलेज में अंग्रेजी का अध्यापन किया। 1984 में शिक्षा कार्य से अवकाश लेकर स्वतंत्र लेखन को ही अपनी जीविका का लक्ष्य बनाया। 1956 में उनकी पहली पुस्तकाकार रचना झाँसी की रानी प्रकाशित हुई। उन्हें इससे बड़ी ख्याति मिली और इसके प्रकाशन के बाद उन्होंने तय किया कि मैं लेखिका ही बनूँगी और यही होगा मेरे जीवन का मुख्य कार्य।
महाश्वेता देवी और
उनकी रचना दृष्टि-
 महाश्वेता देवी के व्यक्तित्व के दो रूप हैं। एक तो है उनके लेखकीय जीवन का रूप और दूसरा है उनका सामाजिक कार्यकर्ता का रूप। आदिवासियों के काम में वे इतनी तल्लीन रहती थीं कि लेखन के लिए कैसे समय निकाल पाती होंगी,यह सोचकर अचरज होता है। कभी-कभी उनका सामाजिक कार्यकर्ता का ही रूप प्रमुख लगता है किन्तु, जब उनकी रचनाओं की संख्या पर दृष्टि जाती है तब लगता है लेखकीय जीवन ही उनका प्रधान था। दरअसल जो उनका कर्मक्षेत्र रहा वही उनकी रचनाओं का प्रेरणा क्षेत्र भी बना। वे अपनी रचनाओं के विषय, पात्र वहीं से लेती थीं। लेकिन जो महत्वपूर्ण बात है वह यह कि उनकी रचना-दृष्टि का केन्द्र बिन्दु शब्द और कर्म को एक कर लेने की क्षमता में निहित है। उनका जो सामाजिक(शोषितों, वंचितों के लिए काम करना) जीवन है वही उनके शब्दों (कृतियों) में मुखरित हुआ और उनकी जो रचनाएँ हैं वह उनके सामाजिक कार्यों के दौरान प्राप्त अनुभूतियों से जीवन्त है। इसीलिए उनकी रचना-दृष्टि में कोई विभाजन, अलगाव नहीं है। इस दृष्टि से उनके शब्द और कर्म दोनों एक-दूसरे में घुलमिल गये हैं। महाश्वेता देवी के रचनाकर्म की इसी अभिन्नता को देखकर डॉ.माहेश्वर ने एक लेख में लिखा है- शब्द अपने आप में केवल ध्वनि हैं। शब्दों को सार्थक बनाता है कर्म। कर्म के बिना शब्द, छूँछी गोलियों की तरह हैं जो लक्ष्य वेध नहीं कर सकती, सिर्फ आवाज कर सकती है। आगे उनका कहना है, जिन थोड़े से शब्द-शिल्पियों ने शब्द और कर्म की अनन्यता को, अद्वैत को जीने की शर्त बना रखा है, उनमें बाङ्ला की अप्रतिम लेखिका महाश्वेता देवी अगली पाँत में आती हैं। वे आरामकुर्सी की लेखिका नहीं हैं ,जीवन की कीचड़-माटी में आपादमस्तक नहायी हुई रचनाकार हैं। इसीलिए उनकी रचनाओं में जीवन की इतनी तीखी और विचलित कर देने वाली गंध है कि पाठक तड़प कर रह जाता है और जीवन-जगत् के बारे में उसका नज़रिया एक नई रोशनी में नहा उठता है। डॉ. माहेश्वर के इन शब्दों के साथ कौन असहमत होगा कि महाश्वेता देवी के लिए लेखन, यश और धनोपार्जन का साधन नहीं था, उनकी आस्था और उनके जीवन-संघर्षों के लिए जरूरी और कारगर औजार था। इसलिए वे सिर्फ शब्दों का अंबार नहीं लगातीं, सामाजिक कार्यों, विशेषकर आदिवासियों, सर्वहारा और स्त्रियों की समस्याओं को लेकर रचनात्मक कार्यों और आन्दोलनों में जी-जान से जुटी रहतीं। लेखन के लिए उन्हें समय कम मिल पाता है इस संबंध में उन्होंने अपने कहानी संग्रह पंचाशटि गल्पो(1996) की भूमिका में लिखा है, बाहर के कामों के लिए कितनी भी भाग-दौड़ क्यों न करूँ, लेखन के लिए समय निकाल ही लेती थी। रचनाएँ सिर पर सवार हो जातीं। सवेरे लिखने बैठती तो रात में डेढ़-दो बजे तक लिखती ही रहती।