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Wednesday 22 Nov 2017

जाने-अनजाने दु: ख

प्रहलाद अग्रवाल
उज्वल जनरल स्टोर, सुभाष
पार्क  सतना (म.प्र.),
मो. 9827009452
निश्चित रू प से यह एक ऐसा उपन्यास है आधुनिक कथासाहित्य में आप जिसे बिल्कुल अलग-थलग देखेंगे। आज के  सामाजिक-राजनीतिक जीवन में जिस सकारात्मक सोच की बड़ी धूम मची हुई है, जगदीश प्रसाद का चरित्र उसकी साक्षात् प्रतिमूर्ति है। इसके  साथ ही वे वर्तमान जीवन की आपाधापी से बिल्कुल निर्विकार रहने वाले व्यक्ति  हैं। उनके पारिवारिक जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएं उपस्थित होती रहीं, पर वे हर परिस्थिति में अडिग बने रहे। इसी तरह उनके जीवन पथ पर कार्य क्षेत्र में जितनी भी बाधाएं आई उसमें उन्होंने अपनी ईमानदारी से सफ लता प्राप्त की। जीवन के  मार्ग में आने वाले दुखों और सुखों को समान दृष्टि से देखा और उन्हें जीवन का अनिवार्य अंग माना। न सुखों से अभिभूत हुए और न दुखों से विचलित। इसीलिए मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि उपन्यास का शीर्षक ‘जाने अनजाने दुख’ की जगह ‘जाने अनजाने सुख’ भी होता तब भी गलत नहीं होता।
अश्विनी कुमार दुबे का यह दूसरा उपन्यास ‘जाने-अनजाने दु:ख’ एक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार के जगदीश प्रसाद की संपूर्ण यात्रा कथा है- एक सहज यात्रा। जिसमें कई मोड़ और उतार-चढ़ाव हैं, लेकिन कहीं कोई विचलन नहीं। कहीं कैसी भी परिस्थिति में कोई नैराश्य नहीं। कहीं ऐसी बारीक विषाक्त महत्वाकांक्षा नहीं जो जीवन के  निर्माल्य को मलीनता से दूषित कर दे। प्रत्येक परिस्थिति में जीवन को एकरेखीय सरलता से ग्रहण करने वाला ऐसा सहज चरित्र,आपको वर्तमान कथा साहित्य में ढूंढने से भी शायद ही मिले।
अपने माता-पिता की एकमात्र संतान जगदीश प्रसाद भौतिकशास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित करने के उपरांत महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हो जाते हैं और अपने निरंतर समर्पित अध्ययन एवं कर्तव्य परायणता के चलते न केवल गंभीर शोध कार्य करने हेतु अमेरिका में प्रशंसित होते हैं अपितु कु लपति के पद पहुंचने में भी सफ ल होते हैं। अपनी सहज जीवनचर्या के कारण इस मार्ग में उन्हें किसी विशेष बाधा का सामना नहीं करना पड़ता है। जो सामान्य विरोध होते भी हैं वे उनका मुकाबला आसानी से सफलतापूर्वक कर लेते हैं और उन्हें हर बार सफलता हासिल होती है। इस तरह प्रत्यक्ष में यह एक सफल आदमी की जीवन यात्रा कथा है जो अपने सहज संस्कारों के  द्वारा जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।
वे जीवन के बाह्म संग्राम में जितनी सफ लता से विजय पा लेते है, आंतरिक संग्राम उन्हें अपने ही भीतर पराजित होने के  भाव से त्रस्त करता रहता है। वे अपने माता-पिता से अत्यंत अनुराग रखते हैं किंतु उनकी वृद्धावस्था में चाहकर भी उन्हें अपने साथ नहीं रख पाते। पैंतालीस वर्ष के दांपत्य जीवन में अपनी पत्नी के साथ रत्तीभर तालमेल नहीं बैठा पाते। और आजीवन दो विपरीत ध्रुव बने रहते हैं। वे जहां हर परिस्थिति में सहज सामंजस्य बना लेने की कला में पारंगत हैं, वहीं उनकी पत्नी सुमन थोड़ी सी असुविधा में भी तनावग्रस्त हो जाती है। जहां उनके  जीवन का सिद्धांत कर्तव्य के प्रति समर्पित रहना है, वहीं सुमन जीवन में ऐश्वर्य अर्जित करने को ही सबसे बड़ी उपलब्धि मानती है। पर जगदीश इस विषमता में भी दांपत्य में कोई दरार पैदा नहीं होने देते। वे धैर्य और कर्तव्यपरायणता की प्रतिमूर्ति हैं। सहज जीवन पथ पर निरंतर प्रशस्त होते रहना उनकी संस्कार साधना है।
 उनका बेटा मेधावी है। उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर वह अपने पिता के मार्ग और इच्छा केविरुद्ध अमेरिका प्रस्थान करता है, जहां वह अकल्पनीय समृद्धि अर्जित कर अपनी मनमर्जी से अमेरिकी कन्या से विवाह कर लेता है। जगदीश प्रसाद उसके इस नापसंद कृत्य को भी सहज स्वीकार कर लेते हें, किंतु उसका यह विवाह सफ ल नहीं होता। इसके  बाद वह दूसरा विवाह भी वहीं करता है और उसकी परिणिति भी अंतत: पहले विवाह की भांति होती है।
उनकी बेटी भी परिवार की इच्छा के विरु द्ध प्रेम विवाह करती है। यहां भी असहमत होते जगदीश प्रसाद उसके मार्ग में कोई बाधा खड़ी नहीं करते अपितु यथासंभव सहयोग ही करते हैं। अपने भाई की अपेक्षा कम प्रतिभाशाली होते हुए भी वह अपने जीवन में सहज व्यावहारिकता के कारण सिर्फ अपने दांपत्य जीवन को ही बचाए नहीं रखती अपितु अपने पति के परिवार में पूर्ण सामंजस्य स्थापित कर लेती है। अपने पति को वह सहज जीवन में स्थापित ही नहीं अपितु खुद भी अपने वकील श्वसुर के सहयोग से एक सफ ल वकील बनने में सफलता प्राप्त कर लेती है। जगदीश प्रसाद सत्तर वर्ष की उम्र में पद से सेवानिवृत्त होते हैं तब वे और अधिक पदलिप्सा के जंजाल में न फंस कर अपने गांव जा कर पर्यावरण सुधार एवं शोध संस्थान की स्थापना करते हैं और शेष जीवन वहीं गुजारने का निर्णय लेते हैं। उनके  साथ उनकी पत्नी गांव चलना स्वीकार नहीं करती। परंतु शहर से गांव प्रस्थान करते समय उन्हें मोबाइल पर अपने बेटे का सुखद संदेश अवश्य प्राप्त होता है कि उनका बेटा हमेशा के लिए अमेरिका छोडक़र भारत आ रहा है और अब वह यहीं रहकर मानव हित के  लिए शोध कार्य में संलग्न होना चाहता है। इस समाचार से न के वल जगदीश प्रसाद प्रसन्न होते हैं अपितु उनकी पत्नी सुमन भी अपने जीवन में एक सुखद अनुभूति का आभास करती है और उसे ऐसा लगता है कि वह अपने जीवन में कुछ श्रेष्ठ और बेहतर कर पाने में सफ ल होगी।
पाठक के मन में एक भाव अवश्य उपस्थित होता है कि क्या आज जीवन इतना सहज और परिस्थितियां इतनी निर्मल है कि व्यक्ति  सहजता से जीवन पथ पर चलते हुए भौतिक सफलताएं प्राप्त करता रहे। विश्वविद्यालय में जिस ईमानदार सहजता से जगदीश प्रसाद कु लपति का पद प्राप्त कर लेते हैं, क्या व्यावहारिक जीवन में वैसा होना संभव है।
कु लपति का पद तो दूर की बात है, सामान्य पदोन्नतियों के  लिए भी जिस प्रकार जोड़-तोड़, प्रशासनिक-राजनीतिक उठा-पटक का बाजार गर्म है, वहां यह एक महान आदर्श स्थिति ही दिखलाई देती है। इस तरह जगदीश प्रसाद का चरित्र वर्तमान यथार्थवादी स्थितियों के विपरीत एक आदर्शवादी चरित्र ही स्थापित होता है जिसे इस तरह ग्रहण किया जा सकता है कि परिस्थितियां कितनी भी दुरूह और अंधकारमय क्यों न हो व्यक्ति को अपनी सहजता का परित्याग कभी नहीं करना चाहिए। इसलिए कि अंतत: जीवन में सच्चाई की ही जीत होती है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी खासियत इसकी सहज स्वाभाविक चमत्कारविहीन भाषा है। अत्यंत रोचक शैली में लेखक ने सहज जीवनचर्या को प्रस्तुत कर दिया है। इसमें सामान्य लोकजीवन के बोलचाल के शब्दों के  सहज प्रयोग खिल उठते हैं- बहू के प्रति सास के  ये शब्द विगत जीवन की पारदर्शिता को जैसे आलोकित कर देते हैं-‘तेरे कपड़े, बाबूजी के कपड़े, मैं अक्सर धोती हूं किनहीं? बहू भी घर की बिटिया है। उसके कपड़े धोने से मेरे हाथ थोड़े ही घुर जाएंगे।’
यहां ‘घुर’ शब्द का प्रयोग कथा रस को अकल्पनीय सौंदर्य प्रदान करता है। इसी तरह ‘गर्रा जाना’, ‘बतंगड़ नहीं बनाना’ आदि शब्दों का भी परिस्थिति अनुसार सहज प्रयोग रचना के सौंदर्य को बढ़ाने में सहायक होता है।
आज जब वर्तमान जीवन में हर कदम पर आपाधापी है, वहां जगदीश प्रसाद का चरित्र एक अकल्पनीय आदर्श चरित्र है जिन्हें सिनेमा संगीत की जगह शास्त्रीय संगीत में रस मिलता है। क्रिकेट की जगह जिनकी रुचि हॉकी के खेल में है। जिन्हें सिनेमा देखने में विशेष रूचि नहीं, परंतु जब देखते भी हैं तो सिनेमा हॉल में जाकर। टीवी या डीवीडी में सिनेमा देखना उन्हें पसंद नहीं। इस तरह हम देखते हैं कि जगदीश प्रसाद का चरित्र आज के सामान्य फ्रे म में नहीं अटका और उसका सफल निर्वाह कर ले जाना ही लेखकीय सफ लता है। हम यह कह सकते हैं कि आज की बाजारवादी संस्कृति में इस तरह के चरित्र का निर्माण एक प्रतिस्थापना है। इसीलिए अपने बेटे को अमेरिका जाकर अपार वैभव और सफलता प्राप्त करने की जगह हिन्दुस्तान में ही रहकर काम करने की सलाह देने वाला वह व्यक्ति शायद ही रु चिकर प्रतीत हो जो यह कहे कि पैसे तो बहुत लोग कमाते हैं, ज्ञान कमाने वाले लोग बहुत कम होते हैं।
पैसा कमा लिया, खा लिया और सो गए, इसके अलावा भी जीवन में ‘कुछ’ है। इस ‘कुछ’ की तलाश में ही जीवन का रस है। घोर गरीबी में भी सुख के अवसरों को उमंगपूर्वक जी लेना ही भारतीय जीवनशैली है। सुख के जाने कितने अवसर आते हैं और बिना सुख दिए यों ही गुजर जाते हैं। दुख हमेशा हमारे सामने पहाड़ की तरह खड़े रहते हैं। इसलिए अब पैसा है, समृद्धि है, सुविधाएं हैं, पर सुख शायद कहीं नहीं है। दरअसल सुख के पक्षियों को दुख के दाने देकर पालना हम भूलते जा रहे हैं। यह इस उपन्यास का निष्कर्ष है।
यह वह विरल उपन्यास है जिसमें बिना कहे भौतिकवादी उपभोक्ता संस्कृति की घोर आलोचना की गई है। लेखक यह कठोरतापूर्व मानता है कि जीवन में शॉर्ट कट से काम नहीं चलता। कभी-कभी यह जरू र लगता है कि उनकी बातें सैद्धांतिक अधिक हैं, व्यावहारिक बहुत कम। वे मानते हैं कि पति-पत्नी को अच्छा मित्र होना चाहिए। उन्हें अपने सुख-दुख आपस में बांट लेना चाहिए। परंतु वे ऐसा कर नहीं पाते। यह आज के समय की शायद सबसे बड़ी विसंगति है कि हम सारी दुनिया को सुधारने के लिए तो निकल पड़ते हैं किंतु अपने ही परिवार में अजनबी बने रह जाते हैं। जगदीश प्रसाद की भी यही स्थिति है। वे अपने छोटे से परिवार को जिसमें पत्नी और एक बेटा और एक बेटी मात्र ही है, अपने रास्ते पर चलने की छूट जरू र देते हैं, भले ही मजबूरी में लेकिन उसका पथ प्रशस्त करने के दायित्व में किसी सार्थक भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाते।
लेखक अपने इस उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र जगदीश प्रसाद के द्वारा यह कहना चाहता है कि भौतिक सुख प्राप्त कर लेना ही जीवन की उपलब्धि नहीं है। जब तक सहज संतोष और सार्थकता का एहसास हासिल नहीं होता, मनुष्यता के  लिए कुछ कर पाने की अनुभूति अर्जित नहीं होती तब तक जीवन में दुखों का ही साया हमेशा वर्तमान रहता है। बड़ी से बड़ी सफ लता भी सुख की अनुभूति नहीं दे पाती इसलिए जीवन में दुखों से मुक्ति पाने का एक ही उपाय है, समष्टि के साहचर्य के  आनंद में डूब जाना। जीवन का आनंद मात्र अपने बारे में सोचकर कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस भावना के पक्ष-विपक्ष में अपना मत निर्धारित कर ही आप इस का मूल्यांकन कर सकते हैं। इसलिए कि लेखक की अवधारणा सुस्पष्ट है कि जीवन सिर्फ अपने स्वार्थों की प्रतिपूर्ति के लिए नहीं होता।