Monthly Magzine
Friday 24 Nov 2017

छत्तीसगढ़ी महागाथा: तुँहर जाए ले गींयांॅ

संजीव तिवारी
सूर्योदय नगर, खण्डेलवाल कालोनी, दुर्ग (छ.ग.)
संपादक: गुरतुर गोठ डॉट कॉम (छत्तीसगढ़ी भाषा की वेब पत्रिका)
छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन में तेजी के साथ छत्तीसगढ़ी में अब लगातार उपन्यास लिखे जा रहे हैं। ज्ञात छत्तीसगढ़ी उपन्यासों की संख्या अब तीस को छू चुकी है। राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद से छत्तीसगढ़ी साहित्य की खोज-परख में भी तेजी आई है।  इसी क्रम में कोरबा के वरिष्ठ साहित्यकार कामेश्वर पाण्डेय जी द्वारा रचित छत्तीसगढ़ी महागाथा ’तुँहर जाए ले गींयाँ’ को पढऩे का अवसर मुझे प्राप्त मुझे प्राप्त हुआ। वर्तमान छत्तीसगढ़ के गाँवो में व्याप्त समस्याओं, वहाँ के रहवासियों की परेशानियों एवं गाँवों से प्रतिवर्ष हो रहे पलायन की पीड़ा का चित्रण इस उपन्यास में किया गया है। आधुनिक समय में भी जमींदारों के द्वारा गाँवों में कमजोरों पर किए जा रहे अत्याचार को भी इस उपन्यास में दर्शाया गया है। इस अत्याचार और शोषण के विरुद्ध उठ खड़े होने वाले पात्रों ने उपन्यास को गति दी है। विकास के नाम पर अंधाधुंध खनिज दोहन से बढ़ते पर्यावरणीय खतरे के प्रति आगाह करता यह उपन्यास नव छत्तीसगढ़ के उत्स का संदेश लेकर आया है।
उपन्यास की भूमिका के पहले पैरे पर डा. विनय कुमार पाठक ने उपन्यास के संबंध में जो कुछ कहा है उसके बाद कुछ और बातें कहने को शेष नहीं रह जाती, फिर भी एक पाठक के रुप में इस उपन्यास को पढऩे पर हुई अनुभूति को बांटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हूं। हो सकता है कि उपन्यास पर लिखते हुए आगे के पैराग्राफों में स्वयंभू आलोचक होने की गलतफहमी भी मानस के किसी कोने में दुबकी हो। किन्तु उपन्यास को पढ़ते हुए जलेबी खाने सा उल्लास मन में रहा है, सो उसे आप सब को बांट रहा हँू।
नये-नवेले इस प्रदेश में जिस तेजी से औद्योगीकरण हुआ है और इस रत्नगर्भा धरती के दोहन के लिए नैतिक-अनैतिक प्रयास हुए हैं वह किसी से छुपा नहीं है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव छत्तीसगढ़ के गाँवों पर पड़ा है। किसानों की भूमि जबरिया भूमि अधिग्रहण के द्वारा छीनी जा रही है। बची-खुची धरती अंधाधुंध औद्योगीकरण और खनिजों के दोहन से निकले धूल और जहरीली गाद से पट चुकी है या प्रदूषित हो रही है। पर्यावरण का भयावह खतरा चारों तरफ  नजर आ रहा है, किन्तु उसकी परवाह किए बिना षड्यंत्र के तहत गाँव खाली कराए जा रहे हैं, कृषि जमीनों में उद्योग लगाए जा रहे हैं। उपन्यासकार ने इस उपन्यास में अन्य सामयिक समस्याओं के साथ ही पर्यावरण के इसी बढ़ते खतरे की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित कराया है।
उपन्यास की भाषा मेरी जानी पहचानी है। खाल्हे राज में बोली जाने वाली यह छत्तीसगढ़ी मैदानी छत्तीसगढ़ी से ज्यादा मधुर है एवं मुझे बेहद प्रिय है। उपन्यास में भाषा के प्रयोग में अंग्रेजी व अन्य दूसरी भाषाओं के शब्दों के प्रयोग से छत्तीसगढ़ी और जीवंत, सरल एवं बोधगम्य हो गई है। उपन्यास में देशज ठेठ शब्दों के प्रयोग ने नागरी छत्तीसगढ़ी के शब्द सामथ्र्य को बढ़ाया है। कामेश्वर भाई ने कई ऐसे ठेठ शब्दों का प्रयोग किया है जिनके अर्थ के लिए आम छत्तीसगढ़ी भाषा-भाषी को भी बगलें झांकना पड़ जाए। कुछ शब्द देखें- रम्पपई पेड़, घीकुडिय़ा, कगरियाना, पधराए, अकरखन, बेरा ओहरत, बकठी बहुरिया, नेंगुर, दहिंगला, पपरेल गाछ, पतघबड़ा, कर-नर, गमेरय, बिझुक्के-बिझुक्का, बुधियार, अतमैती आदि। उपन्यास में मुहावरों, लोकोक्तियों एवं कहावतों का भी प्रयोग रुचिकर लगा जिनमेें-बिटौना के बादर छा गईस, आन के खँाड़ा आन के फरी खेदू नाचय बोइर तरी, दँादर डउकी माँदर कस पेट लइका होवइस त हँसिया कस बेंठ आदि।
उपन्यास में प्रतीकों और घटनाक्रमों को विश्लेषित करने का ढंग निराला है। उपन्यासकार ने प्रतीकों, बिम्बों और भाषा के माध्यम से सिद्धहस्त चित्रकार की तरह चित्र खींचा है। कुछ उदाहरण देखिए-...गंगाराम मन के कुकरी घर ले अपन चिंयाँ मन ला लेके कोरकिर-कोरकिर निकलिस अउ ओमन ल गली ल छुवा के फेर घुसर गइस। ओखर आँट म बइठे सेरु केकती मन ला देख के गुर्राए बर मूँ बनाइस, लेकिन फेर अपन विचार ल तियाग के अपन हँफराई उपर चेत करिस। ओहू ल तो गरमी ल पार पाए बर परथे। यह मात्र कल्पना नहीं है, अनुभव का चित्रण है। इसी प्रकार ...औखरहा आभा-बोली मन ओकर कान मं मछेव कस भन्नावत रथे। यह वही लिख सकेगा जिसने मधुमक्खियों को भनभनाते सुना होगा। कोसा कीड़ा और केकती के जीवन पर पृष्ट 344 में भी उपन्यासकार ने बहुत मार्मिक व भावनात्मक स्थिति का उल्लेख किया है।
उपन्यासकार नें उपन्यास में चुटीले व्यंग्य का भी प्रयोग किया है जो कहीं गुदगुदाता है तो कहीं अंतस तक भेदता है, देखें ...मस्टर रोल मं भूत-परेत तक मन के नाव चढ़थे। सरकार के बाप नइ पुरोए सकै। और ...लेकिन सरकार ल बाबा गुरू घासीदास के जैत-खाम ल कुतुब मीनार ले ऊँच बनवाए बर परते तो हे, भले एमा बोट के खोट हे, लेकिन हावै तो न। और  ..बंजर म भटके-गँवाए सुरेन कभू सोचे नइ रहिस एक दिन ए जंगले हर गँवा जाही।
उपन्यास में खण्ड-खण्ड कहानियां आगे बढ़ती है और संवेदना का एक सम्मिलित रूप उभर कर सामने आता है। लगभग दो दर्जन पात्रों के साथ आगे बढ़ती कहानी में उपन्यासकार ने सभी पात्रों का चरित्र-चित्रण बहुत सहज व सरल रुप से प्रस्तुत किया है। संवादों के सहारे पात्रों के व्यक्तित्व को स्पष्ट भी किया है। उपन्यास में बड़े कका, सिउ परसाद, चुनिया, होरी, लहाराम, पैसहा आदि के चरित्रों का व्यक्तित्व स्वयं बोलता है। कहानी में नाटकीयता, रोचकता, पात्रों की भावनाओं की अभिव्यक्ति चुटीले व प्रभावकारी संवाद उपन्यास को रोचक बनाते हैं। उपन्यास ‘तँुहर जाए ले गींयाँ’ छत्तीसगढ़ के एक गाँव की कहानी है। इसमें बड़े कका के नायकत्व में विभिन्न कहानियाँ उनके इर्द-गिर्द घूमती है। गाँव में पैसहा ठाकुर (बिसाल), उसके बेटे राजा, घनश्याम, बल्लू और छुट्टन का अत्याचार है।
उपन्यास का आरंभ पलायन कर गए मजदूर भगेला के गाँव आने के वाकये से होता है। भगेला और गाँव के मजदूर मुरादाबाद के ईंट भ_े में कमाने खाने जाते हैं और ईंट-भ_ा का मालिक व उनके गुर्गे उन्हें बंधुवा बना लेते हैं। वहां से भगेला भाग कर गाँव आता है, बड़े कका और सिउ परसाद भगेला की मदद करते हैं और जांजगीर के किसोर भाई की संस्था के स्वयंसेवक होरी के प्रयास से सभी मजदूर छूट कर गाँव के लिए रेल से निकल पड़ते हैं। उनके आने की खुशी में गाँव में रामायण का कार्यक्रम रखा जाता है जिसमें गाँव के सभी लोग भेद-भाव, जात-पांत भूलकर एक साथ भोजन करते हैं।
इन घटनाओं के बीच पैसहा ठाकुर की  बेटी की प्रेम गाथा भी आकार लेती है। केकती गाँव के ही गरीब मजदूर कौशल से प्यार करती है, उसके प्यार के रास्ते में उसके भाई रोड़े अटकाते है और कौशल को प्रताडि़त करते हैं। पैसहा परिवार के जुल्म से कौशल को गाँव छोडऱ भागना पड़ता है और वह कमाने-खाने काश्मीर चला जाता है। वहाँ उसके प्रेम के डोर को पत्रों के माध्यम से केकती की सहेली सुकवारा कायम रखती है। सुकवारा गाँव की स्वयंसिद्धा महिला है, वह दुर्गा महिला मण्डल की अध्यक्षा है और गाँव के कोसा पालन केन्द्र में मण्डल की महिलाओं के साथ काम करती है। सुकवारा के पति भी कौशल के साथ काश्मीर में काम करता है। उसी के सहारे कौशल की पाती केकती तक पहुंचती है।
उपन्यास में कथा-उपकथा रोचकता को बढ़ाती है और कथानक आगे बढ़ता है। बड़े कका के घर रह रही चुनिया बड़े कका के नौकर लहाराम की पुत्री है। चुनिया विधवा है, लहाराम उसके दुख को देखकर उसे ससुराल से अपने घर ले आता है किन्तु लहाराम की दूसरी पत्नी चुनिया को दुख देती है। गाँव में फैले पैसहा के बेटों का आतंक और चुनिया के दुख को देखते हुए लहाराम बड़े कका से अनुरोध करता है और बड़ी काकी चुनिया को अपने घर ले आती है। चुनिया अपने सारे दुखों को भूलकर वृद्ध कका-काकी की सेवा करती है। बड़े कका का परिवार चुनिया को सामाजिक सुरक्षा ही नहीं, वरन उसे अपने घर की बेटी बनाकर रखते हैं। उपन्यास का बंधुवा मजदूरों का मुक्तिदूत होरी भी विधूर है, चुनिया की आँखें उससे दो-चार होती हैं और उन दोनों की स्वीकृति से कथा के बीच में ही वे वैवाहिक जीवन में बंध जाते  हैं।  
कथा में बड़े कका का पुत्र सुरेन, जो शहर में नौकरी करता है अपने मित्र संदीप भट्टाचार्य के  साथ गाँव आता हैं। महानगर में पले बढ़े संदीप भट्टाचार्य को गाँव का यह माहौल अटपटा लगता है, वे दोनो गाँव के बदलते हालातों से दो चार होते हैं। सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार गाँव में बद्रीनाथ-केदारनाथ से बड़े कका के घर पातीराम पंडा व उसका भतीजा मन्नू भी आता है और कुछ दिन रुक कर गाँव में घूम कर दान-दक्षिणा प्राप्त करता है। पातीराम के साथ आए मन्नू की कुदृष्टि का चुनिया बेखौफ जवाब देती है तो एक और परित्यक्ता लडक़ी फंस जाती है। बात आगे बढ़ती उससे पहले ही लडक़ी को भूत चढऩे का वाकया होता है और मन्नू के मन में घर कर गए भय से लडक़ी बच जाती है।
मूल कथा क्रम में पैसहा गाँव में सदियों से निस्तार हेतु प्रयुक्त रास्ते को कांटे से घिरवा देता है, क्योंकि वह रास्ता राजस्व अभिलेख में उनके नाम पर होता है। यहीं से गाँव वालों  का विरोध आकार लेता है। रास्ते को घिरवाना पैसहा व उसके चमचों की चाल होती है। पैसहा चाहता कि गाँव में डायमंड कोल वॉशरी खुले जिसके लिए गाँव वाले बावा डिपरा की जमीन कोल वॉशरी को स्वेच्छा से दे दें। पैसहा कोल वॉशरी में ठेेके और अपने ट्रकों को काम मिलने से अपने लाभ की सोच रहा है। उसे गाँव के किसानों या पर्यावरण से कोई लेना-देना नहीं है। वह चाहता है कि गाँव वाले अपनी जमीन कोल वॉशरी को दे दें तो वह गाँव के निस्तारी रास्ते को खोल देगा। पैसहा के इस काम में सहयोग गाँव का सरपंच बजरंग, पांड़े और कोल वॉशरी का मैनेजर चौहान साहब आदि करते हैं। रास्ता खोलने हेतु गाँव में पंचायत बुलाई जाती है। पैसहा अपनी शर्त रखता है, मकुंदा और गाँव के दूसरे लोग इसका विरोध करते हैं। खास कर वे जिनकी जमीन बावा डिपरा में है। पैसहा के बेटे प्रतिरोध को दबाना चाहते हैं। इसी क्रम में लालदास की पैसहा के बेटों से पंचायत के बीच में ही लड़ाई हो जाती है। राजा कट्टा निकाल लेता है और चलाने ही वाला होता है कि बरसों से दबे-कुचले दलित जाति के अपंग पंचराम के शरीर में अचानक बल का संचार होता है और वह राजा की कलाई में डंडे से भरपूर वार करता है। अनहोनी टल जाती है। पंचायत बिना फैसले के उठ जाती है। लड़ाई की आग गाँव में धीरे-धीरे सुलगने लगती है। पैसहा की जिजीविषा और उसके बेटों के आतंक में कोई कमी नहीं आती। राजा के द्वारा गाँव की बहू-बेटियों के बलात्कार के कई किस्से हरफों में उभरते हैं और शोषितों की आवाज दमन के डंडों में दब जाती है। गाँव के बहू-बेटियों की जुबान में टीस बाहर निकलने के लिए छटपटाती है, किन्तु लोक-लाज व दबंगई के कारण दबी रहती है।
राजा ना केवल गाँव की इज्जत से खेलता है, बल्कि अपने दुश्मनों को भी रास्ते से हटाने में गुरेज नहीं करता। पंचराम की हत्या करता है और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के बावजूद उस पर कोई आंच नहीं आती। ऐसी ही घटना का शिकार पूर्व में गोरे पंडित भी हो चुका होता है। दोनों की हत्या को आत्महत्या सिद्ध कर दिया जाता है। ऐसे ही दिनों में जब राजा के हवस का शिकार हुई बेदिन के पति को दमन की पीड़ा सहन नहीं होती तो वह हिम्मत बांधकर पैसहा को ललकार उठता है। बढ़ते उम्र के कारण पैसहा क्रोध में उसे मारने दौड़ता है, किन्तु पांव में पत्थर लगने से गिर जाता है। ललकारने वालों के सर पर बेवजह संकट आ जाता है, किन्तु किसी तरह पैसहा को उसके घर पहुंचाया जाता है। वहां से अस्पताल। लाखों खर्च करने पर भी पैसहा ठीक नहीं होता और अशक्त होकर बिस्तर पर पड़ जाता है। बेटे मनमानी करने लगते हैं और गाँव को नियंत्रित न कर पाने का दुख पैसहा सालता है। अंतिम समय में वह प्रायश्चित करने का जुगत करता है।
पैसहा के बेटे डायमण्ड कोल वॉशरी को अपने आतंक से विस्तार देते हैं। राजा की अय्याशी बढ़ती जाती है। एक दिन तालाब में अकेले नहाती बेदिन पर फिर उसकी नीयत डोल जाती है। वह बेदिन का पीछा करते उसके घर तक आ जाता है और उसे घर में अकेली पाकर उसका बलात्कार करने पर उतारु होता है। उसी समय ताक में बैठे बेदिन का पति उसे मार डालता है। राजा को मारने के बाद वह उत्साह के साथ गाँव में इसका ऐलान करता है व जुलूस के साथ थाने जाकर सरेंडर करता है। बड़े कका और सिउ परसाद के संयुक्त प्रयास से गाँव धीरे-धीरे जागने लगता है। कोल वॉशरी के विस्तार एवं पैसहा के बेटों के दमन का विरोध करना गाँव वाले सीखने लगते हैं। किन्तु पैसहा जैसे लोगों की स्वार्थपरक कूटनीतिक चालों के कारण कोतवाली और ओपन कोल माइंस का दंश गाँव वालों को झेलना पड़ता है। जनसुनवाई में जनता विरोध में सर उठाती है, किन्तु प्रशासन कोल वॉशरी को विकास मानते हुए जमीनों को लीलना चाहता है।
बड़े कका और सिउ परसाद उपन्यास में कुरीतियों को सहजता से दूर करने की शिक्षा देते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। कुष्ठ रोग, जादू-टोना, भूत-प्रेत आदि के संबंध में व्याप्त अंधविश्वास की वे वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए जनता के मन से उसका भय दूर करते हैं। अपने प्रेमी की बाट जोहती केकती सपने में देखती है कि उसका प्रेमी कौशल अनंतनाग में राजमिस्त्री का काम करते हुए ऊपर से गिर जाता है और मर जाता है। उसका स्वप्न वास्तव में सत्य होता है। अनंतनाग में कौशल आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो जाता है। प्रेमी की मौत की खबर से केकती पागल हो जाती है। कथा के अंत में कौशल खाइस पान अध्याय में महागाथा की वेदना फूटती है। केकती पान ठेले पर अपने प्रेमी के पसंद का पान मांगती है। पान खाकर वह हंसती है, उसकी हंसी गांव में गूंजती है।
बड़े कका के घर में बच्चों व पर्यावरण रक्षा का व्रत खम्हरछठ की पूजा का आयोजन हो रहा है, कथा कही जा रही है। पर्यावरण बचाने गांव वाले अब उठ खड़े होंगे इसी आशा में गाथा समाप्त होती है। उपन्यास में बंधुआ मजदुरी के समय एक बच्ची के बलात्कार की कहानी और उस अबोध बच्ची के गर्भवती होने की कहानी, होरी के बंधुआ मजदूरी से भागने का वाकया, भोजन भट्टों की कहानी, कुष्ठ होने पर समाज को बोकरा-भात देने की परंपरा का विरोध, भूत चढऩे-उतरने का चित्रण, सांप काटने पर परिवहन की समस्या के कारण लोगों की मौत का वाकया, बेटा-बहू द्वारा दूध में बबूल के बीज पीस कर मिलाने और रोकने पर अपमानित हो जाने के कारण ग्वाले का वैरागी हो जाना आदि घटनाओं का संवेदनात्मक चित्रण उपन्यासकार नें किया है।
यह उपन्यास सचमुच में अपनी सम्पूर्णता के साथ प्रस्तुत हुआ है। लेखक का इसे महागाथा कहना, पढऩे से पहले अटपटा लग रहा था। किन्तु इसे पढ़ते हुए कथाओं की लयात्मकता और घटनाओं के प्रवाह से एक रागिनी फूटती हुई महसूस होती है। यही रागिनी इसे स्वयमेव महागाथा सिद्ध करती है। छत्तीसगढ़ी भाषा में इतनी उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करने के लिय भाई कामेश्वर पाण्डेय जी को बहुत-बहुत धन्यवाद।