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Wednesday 22 Nov 2017

शिक्षा का डावांडोल वर्तमान


अमिय बिन्दु
8बी/2, एन.पी.एल. कॉलोनी
न्यू राजेन्द्र नगर,
नई दिल्ली-110060
मो. 9311841337
शिक्षा का मानव जीवन के लिए उद्देश्य क्या है, क्या शिक्षा केवल नौकरी के लिए है या फिर जीवन में भी शिक्षा का कुछ और महत्व है, इन प्रश्नों पर ढेरों बातें सुनने को मिल सकती हैं, लेकिन जब हम जीविका के संघर्ष में उतरते हैं, तो शिक्षा की बातें धरी रह जाती हैं। इन प्रश्नों पर स्वयं शिक्षा ग्रहण करने वाले भी बात करना व्यर्थ समझते हैं। ऐसे ही न जाने कितने महीन, मगर •ाहीन प्रश्नों से रूबरू कराती है पुस्तक-‘शिक्षा-कुशिक्षा’ । इसमें शिक्षा से संबंधित ऐसे ढेरों प्रश्नों को वरिष्ठ लेखक एवं चिंतक प्रेमपाल शर्मा ने उठाया है।
मनुष्य की अद्वितीयता उसकी विचार क्षमता और भाषा में निहित है। यह अद्वितीयता उसके संस्कार और संस्कृति में भी निहित है। संस्कृति का सीधा संबंध शिक्षा से है। प्राचीन भारतीय संस्कृति में शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात जब मनुष्य सामाजिक जीवन में प्रवेश करता था, तभी उसका जन्म माना जाता था। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में समय के साथ बहुत-सी जटिलताएं आती गईं और वह जीवन की बजाय जीविका से जुड़ती गई। शिक्षा के उद्देश्यों में से चरित्र निर्माण की बात धीरे-धीरे रिसती गई और उसी का नतीजा है कि आज शिक्षित-से-शिक्षित व्यक्ति भी बड़ी आसानी से भ्रष्टाचार या असामाजिक गतिविधियों में लिप्त हो जाता है।
पुस्तक में संग्रहित कुल बत्तीस लेखों में प्रेमपाल जी एक तरह से भारतीय शिक्षा के हर पहलू को छूते नजर आए हैं। उनकी महीन न•ार से माता-पिता की आकांक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालयों में व्याप्त अव्यवस्था तक कुछ भी नहीं बच पाया। शिक्षा के चलते श्रम के प्रति गिरते सम्मान से प्रेमपाल जी बहुत व्यथित और चिंतित दिखते हैं। कई लेखों में किसी-न-किसी बहाने उन्होंने इस पर अपनी लेखनी चलाई है। ‘काम की शिक्षा’ लेख में उन्होंने इसका बहुत व्यावहारिक पहलू दिखलाया है, जिससे हमारा रोजाना साबका पड़ता है। हमारे समाज के लिए चिंतनीय विषय है कि स्नातक करने वाला छात्र अपने सक्रिय जीवन के पन्द्रह बीस उत्कृष्ट बरस इलाहाबाद, दिल्ली, बंगलौर, हैदराबाद, कोलकाता जैसे जगहों पर तैयारी करते हुए जाया कर देने के लिए तैयार रहता है, लेकिन उतना ही समय देकर अपना कोई कारोबार, घरेलू व्यापार या खेती में हाथ नहीं बंटाना चाहता।
बड़े और प्रतिष्ठित व्यावसायियों के ऐसे न जाने कितने बच्चे मिल जाएंगे जो पिता के साथ कारोबार में लगने की बजाय पैसे के बल पर ही एमबीए या ऐसी किसी पढ़ाई करते हुए बरसों महानगरों में मामूली तनख्वाहों पर बिता देते हैं। इसमें केवल बच्चों के बाहर रहने की जिद या इच्छा ही शामिल नहीं रहती, बल्कि बहुत से मामलों में तो माता-पिता खुद अपने बच्चों को काम में लगाने की बजाय शिक्षा और नौकरी के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ‘पापा के कहने पर’, ‘डिग्री का प्रोजेक्ट’, ‘चश्मेवाली पीढ़ी’, ‘ममता की क्रूरता’, ‘जी.के. की किताब’, ‘छात्र और छुट्टियां’ और ‘सांस्कृतिक विलाप’ जैसे लेखों में उन्होंने इस समस्या की ओर संकेत किया है, जिसमें बच्चों को भविष्य और जीवन के लिए तैयार करने की बजाय हमारा समाज देखादेखी और स्टेट्स जैसे बकवासों के चक्कर में अपने बच्चों पर ही अनावश्यक दबाव डालता है।
इसी तरह जीवन के मूल्यों की उपयोगिता और शिक्षा से उसके रिसते जाने पर भी कई लेख हैं। ‘आस्था की शिक्षा’, ‘शिक्षा-कुशिक्षा’, ‘शिक्षा के मूल्य’, ‘झूठ की शिक्षा’, ‘शिक्षा का धर्म’, ‘दीवार पर लटके मूल्य’ और ‘समाज में रहने की शिक्षा’ जैसे लेख विभिन्न तरीकों से शिक्षा में मूल्यों की बात उठाते हैं। साधारण सी बात है कि जिन मूल्यों के जीवन में होने की आकांक्षा हम करते हैं, उन मूल्यों को हम खुद अपने जीवन में नहीं अपनाते हैं। अब इस बात को विकृति की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि बहुत सामान्य बात मानी जाती है। सच बोलने वालों को और काम के लिए लाइनों में लगे लोगों को लोग दया और व्यंग्य की दृष्टि से देखते हैं।
प्रेमपाल जी ने संस्थागत कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया है। शिक्षकों की कमी, शिक्षकों का गैर-व्यावसायिक न•ारिया और उनकी अयोग्यता उत्तर भारत के लिए गहरी समस्या है। हर आने वाली सरकार इन क्षेत्रों में सुधारों का वायदा करती है, लेकिन सत्ता में आते ही वह अधिकतर अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने में लग जाती है। शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन भी अपनी विचारधारा को थोपने या प्रसार को ध्यान में रखकर किया जाता है। इन परिवर्तनों से विद्यार्थियों या समाज के लाभ की बात नहीं देखी जाती। आजकल शिक्षा व्यवस्था को लेकर देश में बहुत विषम स्थिति बनी हुई है। राज्य सरकारों और केन्द्रीय सरकार में शिक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर भी सहमति नहीं दिख रही है।
शिक्षा के साथ ही पुस्तक में भाषा के प्रश्नों को भी उठाया गया है। त्रिभाषा का समर्थन करते हुए भारतीय भाषाओं के विकास का मुद्दा उठाना कहीं कमतर नहीं है। ‘भाषा का भविष्य’, ‘भाषा का कहर’, ‘स्कूल में हिन्दी’, ‘हिन्दी में कुछ-कुछ’, ‘हिन्दी की फिक्र’, ‘कर्नाटक में कन्नड़’ और ‘संस्कृत-जर्मन विवाद’ जैसे लेखों में भाषा के प्रश्नों पर कुछ बातें कही गई हैं। इसी तरह किशोरों और बच्चों में विज्ञान के प्रति घटती रुचि और आमजन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी की ओर भी कुछ लेखों में इशारा मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी भारत जैसे विविधतापूर्ण और विशाल देश के लिए चिंताजनक है। कई बार तो हमें महसूस ही नहीं होता कि हम विज्ञान की 21वीं सदी में जी रहे हैं। अभी हाल में झारखण्ड में पूरे गांव ने सामूहिक रूप से मिलकर सात महिलाओं को डायन बताकर उनकी हत्या करवा दी। मीडिया में सनसनीखेज बनाते हुए भी वैज्ञानिकता का तकाजा देने की बजाय एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे। ऐसे मुद्दों पर तो आंसू बहाना भी कितना कम लगता है।
दरअसल, ये बातें किसी किताब में नहीं सिखाई जातीं। जिस तरह से बचपन से हमारे मन में अंधविश्वासों के प्रति डर भर दिए जाते हैं, उन्हें बाहर निकालने का कोई प्रयास ही नहीं किया जाता। इसे मामूली मानकर छोड़ दिया जाता है जो धीरे-धीरे हमें तर्क की जगह विश्वास और खोजी दृष्टि की जगह आस्था की ओर बढ़ा देता है। इन प्रश्नों पर विचार करते हुए पुस्तक में जितने लेख हैं, वे नाकाफी हैं। वैसे पुस्तक इस मायने में भी निराश करती है कि इसमें मात्र प्रश्न उठाए गए हैं। उन स्थितियों को बदलने के लिए किसी प्रयास का उल्लेख नहीं है। केवल यह कहकर निकल जाना कि उत्तर भारत में साहित्य और भाषा का सम्मान नहीं होता, जबकि बंगाल में साहित्य और संस्कृति को अधिक तवज्जो दी जाती है, से काम नहीं बनता। लेकिन यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि प्रश्न उठाए गए हैं। इस बात पर बहस की जा सकती है कि प्रश्न उठाना ही लेखक का काम है या फिर उसका समाधान सुझाना, लेकिन यदि समाधान लेकर आया जाता तो पाठकों को ज्यादा खुशी होती।
समाज में लोग दिग्भ्रमित हैं कि आखिर क्या करें? ‘चश्मेवाली पीढ़ी’ और दूसरे लेखों में लेखक स्वयं स्वीकार करता है कि उसके बच्चों को भी चश्मा लग चुका है तथा वे भी हिन्दी की बजाय अंग्रेजी पर ज्यादा ध्यान देते हैं, तो आखिर सामान्य जनता अपना समाधान कहां से खोज सकेगी? भाषा के नाम पर राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञ भी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजते हैं। बुद्धिजीवी समाज भी अपने बच्चों को अच्छे अंग्रेजी स्कूलों में भेजता है। खुद सरकारी स्कूलों से तनख्वाह लेकर परिवार चलाने वाले भी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजते हैं, तो साधारण जनता से किस आधार पर अपेक्षा की जा सकती है कि वह हिन्दी का ढिंढोरा पीटती रहे। पुस्तक पढ़ते हुए कई बार मन में उबाल आ जाता है, तो कई बार तो कोफ़्त होने लगती है कि क्या हम अंग्रेजों द्वारा निर्धारित कर दिए गए जंजाल से कभी बाहर नहीं आ सकेंगे? मानसिक गुलामी कम होने के बरक्स लगातार उसकी जंजीरें कसती जा रही हैं। अब तो बाजार भी इतना आक्रामक हो चुका है कि बैठक से लेकर बेडरूम तक ही नहीं, बल्कि हमारी पसंद, नापसंद और विचारों तक को प्रभावित करने लगा है। ऐसे में एकमात्र रोशनी हमें शिक्षा में ही नर आती है। हमें नए नस्ल के बच्चों की जरूरत है, जो हमारी पुरानी मान्यताओं, अंधविश्वासों और जरूरत पड़े तो मूल्यों को भी दरकिनार कर नए मानवीय समाज की रचना करें।