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Tuesday 21 Nov 2017

सांस्कृतिक अस्तित्व के लोप और विस्थापन के दंश का मुखर बयान -डूब


डॉ. सतीश पांडेय

संपादक -सृजन संदर्भ, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, के. जे. सोमैया कला व वाणिज्य स्वायत्त महाविद्यालय,
विद्याविहार, मुंबई- 400 077
मो. 9820385705
भूमंडलीकरण से जुड़ी विकास योजनाओं के तहत बने बड़े-बड़े बांधों ने जहां विकास की अनेक संभावनाओं को यथार्थ में परिणत करने की उम्मीद जगाई है, वहीं अनेक डूब क्षेत्रों को भी जन्म दिया है। इस डूब की चपेट में आने वाले क्षेत्रों के लोगों को विस्थापित होने की पीड़ा तो झेलनी ही पड़ती है, उनकी पूरी सभ्यता और संस्कृति लुप्त हो जाती है। इसकी पीड़ा अत्यंत ही मार्मिक ढंग से एकांत श्रीवास्तव की लंबी कविता ‘डूब’ में व्यक्त हुई है। कवि मानता है कि डूब गए गांव की केवल दंतकथा शेष रह जाती है। वहाँ के घर, रास्ते, चौपाल और खेत-खलिहान आदि सब जल के नीचे डूब जाते हैं। जो लोग स्वेच्छा से रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से दूर जाते हैं, वे पुन: अपना खोया हुआ गाँव पा जाते हैं किन्तु डूब में खोये गए गाँव को वहाँ के विस्थापित लोग कभी भी नहीं पा सकते। सिर्फ उनकी स्मृति में यह गांव बसा रह जाता है।
    जल एक तरफ जीवन देता है तो कभी-कभी विनाशकारी बन कर वह जीवन को छीन भी लेता है। किन्तु डूब वाले ऐसे गांवों के जलमग्न होने में जल की नहीं बल्कि मनुष्य की मर्जी होती है। जल तो निमित्त मात्र होता है। टिहरी, मणिबेली और हरसूद जैसी सभी जगहों की इस परिणति के मूल में मनुष्य की स्वार्थपरता ही कारणीभूत रही है। इस डूब-क्षेत्र में मनुष्य नहीं बल्कि मेंढक, साँप, घोंघे, घडिय़ाल और जोंक जैसे जल-प्राणी रहते हैं। अपने इस विनाशकारी रूप के कारण जल को पेड़ों की छायाएँ भी डरावनी लगती हैं। वैश्वीकरण और विकास के इस युग में मशीनों की घरघराहट में बांसुरी की तान, ट्रेन की धड़धड़ाहट में पंडुक की आवाज या बाजार के शोर में आदमी की आवाज डूब जाती है। गाँव ही नहीं, वहाँ के देवी देवता और मंदिर भी डूब जाते हैं। इस तरह सब कुछ डूब जाता है पर लोगों का अपने गाँव से जुड़ाव नहीं खत्म होता। इसीलिए वे जनपद के उसी जल में पक्षी बनकर जीवन बिताने की इच्छा रखते हैं। उनका आशावादी मन इस विनाश के बीच भी उम्मीद नहीं छोड़ता। उन्हें जीवन के कुछ लक्षण बचे हुए दिखाई दे जाते हैं-
एक लालटेन जो बच गयी डूबने से / और गिरस्ती का थोड़ा सामान
झिलंगी खटिया, एलुमिनियम की डेकची / बांस की चटाई जिस पर करवट बदलते
बीतती है रात। (धरती अधखिला फूल है, पृष्ठ 122)
चाहे मणिबेली हो या हरसूद, ऐसे डूब क्षेत्रों के लोगों को व्यवस्था द्वारा विकास संबंधी तरह-तरह के सपने दिखाया जाता है लेकिन उस जमीन से गहरा जुड़ाव वहाँ के लोगों को वहाँ से जाने नहीं देता। इसीलिए पुलिस की लाठियां और गोलियां खाकर भी वे उस जमीन को छोडऩा नहीं चाहते। उनकी रगों में पोई के बीज की लालिमा घुल कर विरोध का स्वर बन जाती है। विरोध में उठी हर आवाज मेधा पाटकर बन कर हर चिंगारी को दावानल में तब्दील कर देती है। कवि लोगों के भीतर दहक रही व्यवस्था विरोध की इस आग को शब्द देते हुए कहता है-
देखो चढ़ता हुआ ज्वार/ सुनो, धरती की धुकधुकी      
धक...धक...धक.../ कितनी बढ़ गयी है
लुहार धुकनी से झल रहा है हवा / पज रहे हैं भट्टी में औजार      
गरम लोहा ले रहा आकार । (वही, पृष्ठ 125)
विस्थापितों को पुनर्वास देना आसान नहीं होता क्योंकि विस्थापन वहाँ के लोगों का तो हो सकता है किन्तु उन लोगों की स्मृतियों में बसी वहाँ की ‘पके धान की खुशबू’, ‘दीवार पर थापे गए कंडे के सूखे हुए निशान’, ‘पुरखों के पावों से बने रास्ते’, ‘झड़ गए फूलों की सुगंध में मंडराती तितलियां’ आदि को कैसे पुनर्वास दिया जा सकता है। अत: कवि इन बड़े बांधों की आवश्यकता पर ही प्रश्नचिन्ह उठाता है-
नदियों की आग नहीं होती / पर तुमने लगाई नदियों से
हमारी बस्तियों में आग / अभी तक तो नहीं थे बड़े बांध  
फिर भी जी रहा था यह देश / पी रहा था पानी
सींच रहा था अपने पौधों को/ जो बन ही जाते थे एक दिन पेड़। (वही, पृष्ठ 126)
कवि इन बड़े बांधों के लिए विश्व बैंक से लिए गए ऋणों के औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न  खड़ा करता है जिसके ब्याज से कई- कई पीढिय़ाँ भी उऋण नहीं हो पाएँगी। अत: वह पाताल की ओर ले जाती हुई विकास की नीतियों को खारिज करने का पक्ष- समर्थन करता है-
खारिज करो विश्व बैंक को,  /     ऋण को, विकास- नीति को
जनहित में परिवर्तन जिसे स्वीकार नहीं  /     तुम दे नहीं सकते मुआवजा
दे नहीं सकते पुनर्वास / तो बंद करो विस्थापन
विकास है यह आधुनिक/  या विनाश आदिवासियों का ।  (वही, पृष्ठ 126)
कवि मानता है कि विकास की इस आँधी ने समाज में निरंतर विषमताओं को जन्म दिया है अत: यह विकास नहीं बल्कि मनुष्यता और सत्ता के उन्माद की लड़ाई है। उसके अनुसार सत्ता ने अपने मद में आकर एक आँख की हिफाजत में दूसरी आँख फोड़ देने या एक हाथ की चिंता में दूसरे हाथ को तोडऩे का पूरा प्रबंध कर रखा है। कवि इससे अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कहता है-
गति के लिए चाहिए दोनों पाँव  / दृश्य के लिए चाहिए दोनों आँखें
कर्म के लिए चाहिए दोनों हाथ  / देखो कि देश का एक हिस्सा
कुचलता है दूसरे हिस्से को / जैसे साम्राज्यवाद ने कुचला उपनिवेशों को । (वही, पृष्ठ 127)  
विकास के नाम पर आदिवासियों की बस्ती के साथ- साथ जंगल, पहाड़ और नदियों का दुरुपयोग करते हुए उन्हें विनाश के मुँह में झोंक देना और इसके आधार पर संभ्रांत जन को सुविधाएं मुहैया कराना इस विकास तंत्र की असलियत है। किन्तु अब आदिवासी समाज भी सीधे संघर्ष के लिए संकल्पित हो रहा है। इसीलिए वह चुनौती देते हुए कहता है-
बंद करो राज्य तंत्र और विकास तंत्र के अत्याचार /  कि विष में बुझे हैं हमारे भी तीर
अपमानित है मनुष्यता / सम्मानित मनुष्यों के संसार में। (वही, पृष्ठ 127)
आदिवासी समाज को पता है कि सरकार द्वारा एक कुशल सेल्समैन की तरह बांध के पक्ष में वातावरण निर्मित किया जाता है और मनुष्यता को भूल कर दरिंदगी की सारी सीमाएं लांघते हुए देश को जोडऩे वाली नदी को तलवार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह देश को अमीर और गरीब के दो खेमों में बांट दिया जाता है। यह छल-कपट आदिवासी समाज को कम समझ में आता है क्योंकि उनका मन गंगोत्री के जल सा निष्कलुष होता है। पुलिस, ट्रक, बुल्डोजर उनके मन में दहशत पैदा करते हैं लेकिन वे सीधे-सादे आदिवासी व्यवस्था के इस छल को नहीं समझ पाते। इस लंबी कविता का बीज शब्द है ‘अपनी धरती से प्यार’ और केंद्रीय विधान है- ‘स्मृति भी आंख बन जाती है / जब अंधेरा हो घना / और जाना हो आगे’। ‘डूब’ में जलमग्न हुए गांवों के पास से नाव पर गुजरते हुए स्मृति की आँखों से सब कुछ दिखाई देता है। इसमें डोडके के पीले फूलों के साथ साथ बबूल के फूल, घाघर चिरई के पंजों के निशान के साथ साथ कुलेश्वर महादेव का मंदिर है तो महानदी के घाट पर तीन पत्थरों के चूल्हे पर पकता भात, सुस्ताते बैल और बैलगाड़ी, साड़ी का झुलना बांध कर बच्चे को लोरी सुनाती माँ और शकुंतला की मुंदरी की तरह किसी का चढ़ाया हुआ सिक्का आदि सब साफ दिखाई देता है। यह सब इसलिए दिखाई देता है कि इस धरती से लोग प्यार करते हैं। यह प्यार ही पृथ्वी का वसंत है-
‘कदंब के फूलने से वसंत नहीं आता / धरती को चाहने से आता है
कोयल के गाने से आम नहीं मौरते / प्रेम की इच्छा से मौरते हैं’।
अपनी धरती से अटूट प्रेम रखने वाले आदिवासी आज सभ्यता के वृत्त से बाहर भले ही माने जाते हों लेकिन वे अपनी धरती को भरपूर चाहते हैं। महान सभ्यता की बड़ी कथा में उनकी जगह बहुत छोटी है लेकिन उनके दुख छोटे नहीं हैं। फिर भी उनमें सारा आकाश नाप लेने का साहस और इच्छाशक्ति है- ‘लेकिन वे छोटे पाँव हैं / जो लंबी यात्रा पर निकल पड़ते हैं / छोटे पंख सारा आकाश नाप लेते है।’ सब कुछ नष्ट हो जाने पर भी वे हार मानने को तैयार नहीं होते-
पर अब तो नष्ट सब कुछ / हाय, जलमग्न वह संसार
खत्म उसकी माया, जादू उसका खत्म / लेकिन हारेंगे नहीं / हमें लडऩा होगा
कि फिर न हो कोई गाँव मणिबेली/  फिर न हो हरसूद। (वही, पृ. 133)
कवि इसे मनुष्यता और सत्ता के उन्माद की लड़ाई मानता है जिसके लिए समय का लोहा तप रहा है और भट्टी में औजार पक रहे हैं। कवि का यह भी मानना है कि सताये हुए आदमी की ललकार से सारा संसार हिल जाता है और उसमें यह शक्ति आती है सिर्फ अपनी जमीन से प्रेम करने के कारण-    घायल साँप / और सताये हुए आदमी से ज्यादा खतरनाक
और कुछ नहीं इस संसार में कि साहस सिर्फ संघर्ष से नहीं आता / उस प्यार से भी आता है
जो हम इस धरती से करते हैं । (वही, पृष्ठ 134)
यह समय इतना कठिन एवं अन्यायपूर्ण है कि अंधेरा खत्म ही नहीं हो रहा। लेकिन इस अंधेरे के बीच कुछ दूसरी आहटें भी सुनाई देती हैं। मसलन- जंजीरों के टूटने की आवाजें, गरम लोहे पर पड़ते घन की आवाजें, कपाट के खुलने और धरती के करवट बदलने की आवाजें। इन्हीं आवाजों के बीच जलपांखी की आवाज़ भी सुनाई देती है जो अपनी जमीन से कट जाने की टीस बन कर उसके व्यग्र और दुख भरे हृदय से उठती है-
हमें भी अब कभी मिलेगा नहीं / जल मग्न हमारा प्रांत / हम भी इस जल के ऊपर उड़ते रहेंगे
भटकते रहेंगे जन्म-जन्मांतर तक/ जल पांखियों की तरह
सन्नाटे की छाती में सुराख करती / उठेगी हमारी पुकार
और बदले में कभी सुनाई नहीं देगी/ कोई आवाज लेकिन प्यार महकता रहेगा सब दिन / जो हम इस धरती से करते हैं।
(वही, पृष्ठ 134-135)
इस तरह वैश्वीकरण के तहत विकास की प्रक्रिया जहां सम्पन्न वर्ग को सुविधाएं मुहैया कराने के लिए आवश्यक प्रतीत होती है, वहीं अपनी धरती से प्रेम करने वाले आदिवासियों के विनाश का वह कारण भी बन जाती है। यह तथाकथित विकास प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा प्रश्न तो है ही, इसके अंतर्गत विस्थापन, पुनर्वास और वैश्वीकरण तथा पूंजीवादी षड्यंत्र के तहत वर्गीय विभाजन आदि तमाम ऐसे संदर्भ भी इससे जुड़े हैं जो समकालीन कवियों की चिंता का विषय रहे हैं। इन कवियों ने पर्यावरण की रक्षा के लिए चुनौती बन जाने वाले ऐसे सभी तत्वों के प्रति विरोध का स्वर प्रकट किया है तथा प्रकृति और पर्यावरण के साथ मानव जीवन का संतुलन बनाए रखने में ही विकास के नए मॉडल की सार्थकता मानी है।