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Friday 24 Nov 2017

अजगर करे न चाकरी...


डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया
ए-7, फारचून पार्क, जी-3,
गुलमोहर भोपाल (म.प्र.) 462039,
मो. 9425376413
मेरे दरवाजे पर एक सपेरा आ धमकता है। ‘‘जै भोले, भागवान को आशीष दो नागराज! शंकर जी से सिफारिश करो कि भक्त का भण्डार भरे, परिवार बढ़े, धन-दौलत, जस बढ़े, दिन दूना रात चौगुना बढ़े। जै भोले; लाओ बच्चा। सर्पराज की कुछ सेवा हो...। ये रुपया-पैसा, कपड़ा-लत्ता, आटा-दाल। बस इस बार तो एक कुरता चाहिए। जाओ महाकाल! भक्त को आशीर्वाद दो।’’ और वह अपने गले में पड़े भारी-भरकम अजगर को मेरे दरवाजे पर पटक देता है। बच्चों-औरतों की भीड़ लग जाती है। बाबा का प्रवचन जारी है। और अजगर निस्पन्द चुपचाप पड़ा है। श्वांस लेने और हिलने-डुलने से उसके जिन्दा होने का आभास मिलता है। सपेरा उस पर हाथ फेरता है। कभी मुंह का हिस्सा हाथ में लेता है। पिटारी के पास एक कटोरा, एक झोली पड़ी है। मानो नागराज और सपेरे की घर-गृहस्थी बिखरी हो। अजगर न हुआ सपेरे की आंतें हो गई जो बाहर फूलती-पिचकती हुई भूख-गरीबी और अभाव का इजहार कर रही हों। साथ ही भूखे रहकर भी आशीष देने की भारतीय संस्कृति का निर्वाह कर रही हों।
मैं सपेरे को गौर से देखता हूं- काला गठा शरीर। सिर पर लाल गमछे की पगड़ी, जांघों तक सिमटी धोती। शेष शरीर निर्वस्त्र। काले शरीर पर दो कंजी आंखे निरंतर चलती हुई। कानों पर लटकते हुए कुंडल। पगड़ी के नीचे कान पर खोंसा हुआ बीड़ी का ठूंठ। गले में रूद्राक्ष की माला। छाती पर लटकती हरे कांच की गुरिया। माथे पर लाल सिंदूर और राख का तिलक। मूंछें-दाढ़ी। अधेड़ उम्र। अजगर पर जिन्दगी टिकाए समाज को आशीर्वाद बांटकर दाल-रोटी, कुर्ता भगवान शंकर के लिए मांग रहा है। जो शंकर कृपालु और संसार का मालिक तथा दाता है, उसने सपेरे के द्वारा अजगर को भेजकर भगवान भक्त से दाल-रोटी और धोती मंगाई है। बदले में आशीर्वाद भेजा है। सबका दाता भगवान भक्त के पास नहीं आया। स्वयं दाल-रोटी का प्रबंध नहीं कर सकता। इन दो जीवों को इसके लिए नियुक्त कर रखा है। ये भक्त के माध्यम से भगवान की दाल-रोटी का प्रबंध कर रहे हैं। कैसी अजीब बात है! कैसा शानदार दर्शन है! कितना कर्मठ जीवन है हमारे भगवान का!
मैं अजगर को देखता हूं। मोटा-चौड़ा, बड़ी-बड़ी चित्तियों वाला। पेट का हिस्सा मोटा और बड़ा। मुंह छोटा। लाल चित्तियों के कारण भयावह लगने वाला। मैं सपेरे से पूछता हूं- इसे क्यों लिए हो? क्या इसके बिना तुम स्वयं दाल-रोटी की व्यवस्था नहीं कर सकते? वह बोलता है- कैसी बात करते हो भागवान! यह तो सतयुग की चीज है। हजारों साल से भगवान शिव की सेवा में है। धरती इसी के माथे पर टिकी है। हमारे-तुम्हारे जीवन का यही आधार है। यह नहीं तो कुछ नहीं। जो इसे एक देता है वह हजारों पाता है। ‘‘इसकी उमर क्या होगी बाबा?’’ मैंने पूछा। उसने बेहिचक कहा- ‘‘यही कोई हजार साल। इसके तो मूंछें निकल आई थीं, फिर झर गई। लो डिबिया में इसकी मूंछे देखो। अजगर की मूंछें पांच सौ वर्ष में निकलती हैं। जब तक इसकी मूंछें मेरी डिबिया में हैं तब तक यह मेरा है। मेरे साथ है। मूंछें गई - तो अजगर भी गया। मूंछें पाते ही यह मुझे समाप्त कर देगा। क्योंकि लीलना इसकी प्रकृति है।’’ मैंने डिबिया में मूंछें देखीं। बाल के दो-तीन टुकड़े थे। मैंने पूछा- ‘‘यह अजगर तुम्हें कब मिला? क्या तुम्हारी भी उमर इतनी ही है?- वह हंसा ‘‘आप तो मजाक करते हैं। यह तो हमें बाप-दादों से मिलता आ रहा है। मेरे पास पिछले चालीस साल से है। हम इसे खिलाते हैं, यह हमें खिलाता है।’’ और आप दोनों मिलकर भगवान की दाल-रोटी चलाते हैं। मैंने व्यंग्य से जोड़ा। बाबा ने कहा- ‘‘भगवान ने सबको बनाया है बच्चा। सब एक-दूसरे से जुड़े हैं।’’
 मैं उसकी बात पर विचार करता हूं। हर एक का पेट दूसरे से जुड़ा है। मतलब यह कि अजगर पेट चला रहा है बिना कुछ किये हुए। तभी तो कहा गया है कि- ‘‘अजगर करे न चाकरी।’’ लगता है कि सपेरे के अजगर ने इस कहावत को धूल चटा दी। चाकरी तो वह कर रहा है। यदि हजार साल की बात झूठ भी हो तो भी कई सालों से सपेरे की गिरफ्त में तो वह है ही। सपेरा कहता है कि अजगर बड़े-बड़े जानवरों को सांस से खींचकर लील लेता है। मतलब यह है कि छोटा सांप सिर्फ काटता है और अजगर जैसा बड़ा सांप सीधे लीलता है। धर्म में, समाज में, राजनीति में, शासन में, नौकरी में, शिक्षा में अजगर श्रेणी के अनेक लोग हैं। अजगर केवल लेटा रहता है और भूख लगने पर लीलता है क्योंकि उसे चाकरी नहीं करनी है। चाकरी तो तौहीनी है। जैसे बड़े घर के रईस बेटे, वैसे ही अजगर। सांप की तरह जब छोटे थे तो काटते थे, जब अजगर की तरह बड़े हो गए तो लीलने लगे। लेकिन वाह रे पेट की लीला! पापी पेट के लिए प्राणी क्या-क्या नहीं करता। हनुमान का वंशज बंदर मदारी के इशारे पर पेट के लिए नाचता है। कटोरी पकडक़र पेट दिखाकर मदारी के लिए भगवान के नाम पर भीख मांगता है। ससुराली स्वांग दिखाता है। जंगल के बड़े-बड़े जीवों को लीलने वाला अजगर सपेरे की पिटारी में बंद है। उसके बार-बार कौंचने पर मुंह फैलाकर सिर्फ आशीष देने का नाटकीय उपक्रम करके कभी-कभी फुसकारता भर है। सपेरा फुसकार को बहुत खतरनाक बताता है। पर पेट के लिए आटा-दाल देने वाले को यही फुसकार आशीष बन जाती है। क्या यह चाकरी नहीं है? एकदम चाकरी है। जंगल में बड़े-बड़े पेड़ों को अपनी जकडऩ में हिलाने वाला, पहाड़ों को रौंदने वाला, जीवों को आतंकित करने वाला इस पिद्दी से सपेरे का कुछ नहीं बिगाड़ पाता क्योंकि उसने अजगर की कमजोरी पकड़ ली है। कमजोरी है पेट। पेट के लिए वह सपेरे के इशारे पर हिलता-डुलता है। पिटारी में बंद होता है। अपने पेट के लिए। सपेरे का भी पेट चला रहा है। सर्वशक्तिमान भगवान शंकर की दाल-रोटी का प्रबंध कर रहा है। असल में यह सपेरा ही शंकर है। अजगर इसी की दाल-रोटी है।
‘अजगर क्या खाता है’ मैं पूछता हूं। वह कहता है- सब खाता है। हवा से लेकर जानवर तक। जो भक्त खिलाता है वही खाता है। इसे इनकार नहीं है। हां, इनकार करने पर भक्त को भी खा लेता है। बड़ा संत है। लेकिन गुस्सा हो जाए तो महंत से भी खंूखार और खतरनाक है। मैं कांप जाता हूं।
मैं देख रहा हूं चारों ओर अजगर हैं। अजगर ही अजगर। नेता, अभिनेता, साधू, साहित्यकार, व्यापारी, अधिकारी, गुण्डे-पण्डे सभी अजगर हैं। नाना प्रकार के, विविध रंग-रूप और स्वभाव के अजगर। बड़े-बड़े पेट लिए ठाठ से देश-दुनिया को लील रहे हैं। बदले में अभय दान देते हैं। आज धरती इन्हीं पर टिकी है। करना-धरना कुछ नहीं, फिर भी जिन्दगी मौज से चल रही है। मलाल है कि कोई उंगली उठा दे। पद, प्रतिष्ठा, व्यवस्था, सम्पत्ति, मठ-मंदिर, तीर्थ, यज्ञ सब इन्हीं के पास हैं। नेता कुर्सी को और इंजीनियर भवनों-पुलों और बांधों को उदरस्थ कर रहे हैं। व्यापारी और पूंजीवाद देश के श्रमिकों-किसानों को हजम कर रहे हैं। अधिकारी फाइलों का भोग लगा रहे हैं, साहित्यकार और कलाकार संवेदनाओं के नाश्तों में जुटे हैं। जो जितना बड़ा अजगर है, वह उतना ही हजम कर रहा है।
सपेरे से अजगर की प्रकृति के बारे में सुनकर मैं चिंतित हूं। आखिर अजगर का नामकरण कैसे हुआ होगा। नाम के साथ रूप-रंग, प्रकृति-स्वभाव भी जुड़ा होता है। शब्दकोशों में अजगर का भले ही कोई और अर्थ हो। मुझे अपनी दृष्टि ज्यादा सार्थक लगती है। क्योंकि नाम ही में रहस्य छिपा होता है। मैं नाम की व्याख्या करता हूं। लगता है कि नाम सार्थक है: अ माने आदमी और ज माने जायदाद। गर माने गला या गले में रखने वाला अर्थात् उदरस्थ करने वाला। आदमी और जायदाद सभी को गले में उदरस्थ करने वाले ही अजगर हैं। सामाजिक अजगरों की पकड़ भी आदमियों और जायदादों में इसी प्रकार की है। ये अजगर स्वयं उदरस्थ करते हैं और कभी अपने भागवान भक्तों को खटखटाकर अपने भगवानों की दाल-रोटी की व्यवस्था करते हैं। एक बार इस चक्कर में फंसे तो फिर अजगर की तरह ही सपेरे की पिटारी से बंध जाते हैं। पेट की पिटारी से कठिन मालिक की पिटारी होती है। अपने पेट से छूटो तो मालिक के पेट की पिटारी नहीं छोड़ती। मैं बाबा से कहता हूं कि इसे छोडक़र कुछ काम धंधा करो। समाज में सम्मानित जीवन जीने का उपक्रम करो। वह करम पर हाथ पटककर कहता है- आप ठीक कहते हैं। लेकिन अब हम ऐसे फंसे हैं कि न मैं अजगर को छोड़ सकता हूं और न अजगर मुझे। हम एक-दूसरे के बिना जिन्दा नहीं रह सकते। पहले तो हम दोनों ही एक-दूसरे को नष्ट कर देंगे। यदि इससे बचे तो दुनिया के जीव-जन्तु हमें जिन्दा न छोड़ेंगे। हम एक-दूसरे के मित्र होकर भी परस्पर शत्रु हैं। पेट के लिए एक हैं। पेट से बंधे हैं। पेट का बंधन छूटा है कि हमारा विनाश हुआ। इसलिए हम बंधे हैं भोले भगवान के नाम पर। दाल-रोटी एकत्र कर रहे हैं। आशीर्वाद बांट रहे हैं।
मैंने देखा कि अजगर सपेरे की ओर पलटा और सपेरा सतर्क हुआ। मैंने पूछा- क्यों, क्या बात है? उसने कहा कि जरा-सी असावधानी में यह मुझे अपनी पकड़ में ले सकता है और मेरी हड्डियां चूर-चूर कर सकता है। मैं इसकी पकड़ से बचता हूं। अभी यह मेरी पकड़ में है। इसकी पकड़ मेरे हाथ में है। मैंने मंत्र से इसका मुंह बांध रखा है। मंत्र ढीला हो जाए तो यह चूकेगा नहीं। मैं हैरत में हूं। इतना खतरनाक शत्रु लेकर आदमी ही दाल-रोटी का व्यवसाय कर सकता है। अजगर से भी अधिक खतरनाक जीव-आदमी। तभी तो सपेरा अजगर से चाकरी करवा रहा है। दाल-रोटी अजगर कमाता है और सपेरा खाता है। नाम भगवान का लगाता है। यही है वर्तमान पूंजीवादी दर्शन। जब तक अजगर पेट के मंत्र से बंधा है, सपेरा भगवान के नाम पर खा रहा है। जिस दिन पेट के मंत्र से मुक्त होकर अजगर सपेरे को पकड़ में ले लेगा उस दिन सपेरे की कर्महीन रोटी की लीला समाप्त हो जावेगी।
मैं बाबा और शिव के प्रतिनिधि को प्रणाम कर कुछ पैसे देता हूं। सोचने लगता हूं कि अजगर को भी जब सपेरा जैसा उस्ताद मिल जाए तो पेट के लिए चाकरी करनी ही पड़ती है। इसीलिए यह अजगर चाकरी करने के लिए विवश हैं। उसकी मूंछें सपेरे की डिबिया में है। मंत्र और मूंछ से बंधा होने पर भी अजगर से सपेरा सतर्क है। दोनों का साथ दाल-रोटी का है, विश्वास और मित्रता का नहीं।