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Tuesday 21 Nov 2017

हिन्दी का मैदान विशाल है


डॉ. आरसु

पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग
कालिकट विश्वविद्यालय
साकेत-चेलेंबर्रा (पो) मलप्पुरम्
 (जिला) केरल-673634,
मो. 09847762021

‘रामचरित मानस और रेलवे गाइड-हिन्दी में ये दो ही किताबें हैं’’  केरल के एक साहित्यकार ने हिन्दी के बारे में हंसी-मजाक करते हुए यह बात कही थी। कुछ सालों पहले इस साहित्यकार से मेरी मुलाकात हुई थी। हमारे वार्तालाप का विषय अलग था। शिक्षा और संस्कृति पर केन्द्रित संवाद में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कही थीं। परोक्ष रूप से मैंने यह भी पूछा था कि क्या आपको हिन्दी आती है। तब उन्होंने अपनी निस्सहायता प्रकट की। हमारा वार्तालाप घंटों तक चला। वे आधुनिक विज्ञान के बड़े विद्वान थे। मलयालम में वैज्ञानिक साहित्य को समृद्ध बनाने में भास्करन नायर ने बड़ी भूमिका भी निभाई थी। मलयालम में निबंध और आलोचना उनके प्रिय विषय थे। तो भी हिन्दी पर उनकी यह टिप्पणी बहुत हास्यास्पद है। उनकी इस टिप्पणी पर सोचते समय बर्टेंड रसेल की एक राय मुझे याद आती है। एक प्रसंग में अरस्तु ने कहा था कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को कम दांत है। रसेल ने इसके लिए औचित्य पर करारा व्यंग्य किया था। इसकी प्रामाणिक जानकारी मिलने के लिए कम से कम श्रीमती अरस्तु का मुंह खोलकर दांत की गिनती करते तो यह गलती न आती। हिन्दी साहित्य को खोखला कहना भी इस प्रकार का एक निरीक्षण लगता है। हिन्दी की जानकारी के साथ उनको बात करनी थी।
गांधीजी के नेतृत्व में हुए राष्ट्रीय आंदोलन के कई लक्ष्य थे। भाषाई एकता स्थापित करना भी उनका ध्येय था। 1918 में मद्रास में हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना हुई थी। तब से दक्षिण के लोग उत्तर की भाषा हिन्दी सीखने लगे थे। उत्तर भारत के कुछ प्रदेश की भाषा के रूप में हिन्दी को तब दक्षिण के लोग सोचने लगे थे। हिन्दी का भाषा विज्ञान पढ़ते समय उसके क्षेत्रों का पता चला था। हिन्दी से जुड़ी बोलियों के बारे में डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने स्पष्ट संकेत दिए थे। अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी, मालवी, छत्तीसगढ़ी और अन्य कई बोलियों की चर्चा उधर हुई थी। हिन्दी को अलग-थलग करने के उद्देश्य से उन्होंने यह संकेत नहीं दिया था। विदेशी भाषाविद् डॉ. जी.ए. ग्रियर्सन ने भारत की भाषाओं का वर्गीकरण किया था। उन्होंने भारत की भाषाओं को अलग-अलग परिवारों में जगह दी थी। हमारे बीच एकता नहीं है यह बताना उनका मकसद नहीं था। किन्तु आज हर बोली को भाषा स्थापित कर कुछ लोग हिन्दी को कमजोर करते हैं।
भारतीय संदर्भ में हिन्दी की भूमिका विशाल और विराट बन रही है। इतना ही नहीं आज वैश्विक स्तर पर हिन्दी को बड़ी स्वीकृति मिल रही है। भाषा की विशालता और विराटता को समझने की चेतना भी आज आवश्यक है। केवल संविधान के प्रावधानों के सहारे भाषा का विकास नहीं होगा। जनचेतना को जगाना ही भाषा के विकास की आरंभिक शर्त है। सांस्कृति उत्कर्ष को बढ़ावा देना भाषा का धर्म है। उर्वर भावनाएं मानव के मन में उर्मिल होती रहती हैं। उनको अभिव्यक्ति मिलती है। तब साहित्य का विकास होगा। हर रचना मूलत: एक भाषा की उपज है। वह निजी सम्पत्ति है। लेकिन उसको हमेशा-हमेशा के लिए उस भाषा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। अन्य भाषा-भाषियों की समझ में आने के लिए भी मार्ग ढूंढना होगा। उसको सार्वजनिक सार्वभौमिक और सार्वकालिक बनाने का एक रास्ता अनुवाद है। हिन्दी का साहित्य विकसित होना है तो अन्य भाषाओं से उसका सम्पर्क बढ़ाना है। इसके लिए अन्य भाषा भाषियों के स्नेह सद्भाव और सहयोग मिलना अनिवार्य है।
यह धारणा आज आमूलचूल बदल गई है कि हिन्दी मात्र उत्तर भारत के कुछ राज्यों की भाषा है। हिन्दीतर भाषियों ने हिन्दी सीखी है। इसके कई सद्परिणाम निकल रहे हैं। याने हिन्दी का मैदान विशाल बन रहा है। प्रभाव क्षेत्र और कार्यक्षेत्र बढ़ रहे हैं। हिन्दी के क्षेत्र विस्तार और कार्य विस्तार की दिशा में आज बहुत अधिक काम चल रहा है। आगे भी इसके लिए कदम उठाना हमारी जिम्मेदारी होगी।
कई हिन्दीतर भाषियों ने हिन्दी सीखी है। राष्ट्रानुराग के दौर में यह शुरू हुआ था। अध्ययन की भाषा बाद में अभिव्यक्ति की भाषा बनी तो हिन्दी की भाव सम्पदा बढ़ गई। दक्षिण भारत के लेखक भी हिन्दी में लिखने लगे। लेकिन हिन्दी भाषी क्षेत्रों के पाठकों ने क्या दक्षिण के लेखकों  की हिन्दी कृतियों तो वांछित महत्व दिया है? क्या साहित्य के इतिहास में उनका उल्लेख किया है? इस विषय पर गंभीर सोच-विचार की जरूरत है। राजेंद्र यादव ने हंस के एक लेख में बताया कि हिन्दीतर भाषी लेखक आज तक हिंदी लेखकों के टक्कर की सृजनात्मक कृतियां अभी तक दे नहीं पाए हैं। इस पर हिन्दीतर भाषी लेखक असहमत और असंतुष्ट हैं। मूल्यांकन में साहित्यिक मापदंड अलग-अलग नहीं होंगे। साहित्यिक अंगीकार मिलने के लिए कृपापात्र बनना विवेक संगत नहीं होगा। रांगेय राधव, प्रभाकर माचवे और मुक्तिबोध हिन्दीतर भाषी थे। मोहन राकेश, भीष्म साहनी जैसे वरिष्ठ लेखक भी इसी श्रेणी में आते हैं।
एक मलयालम भाषी हिन्दी लेखक का विचार है कि अहिंदीभाषी छाप लगाकर उन्हें अलग करना ठीक नहीं है. यह उनकी कृतियों का अवमूल्यन है। यह विचार पूर्णत: सही नहीं लगता। अहिंदीभाषी लेखकों के लिए संस्थापित पुरस्कार स्वीकार करने समय ये लोग अलग रवैया रखते हैं और हीनता ग्रंथि का शिकार होकर दावा रखना ठीक नहीं लगता। दावा, वादा और दलील कुछ भी हो सकते हैं।
हिन्दीतर भाषियों के हिन्दी लेखन के लिए जरिए कुछ नई दिशाएं खुल गई हैं। तुलनात्मक अध्ययन की आरंभिक अवस्था आज की तुलना में काफी भिन्न थी। हिन्दी के कवियों की तुलना हिन्दी भाषी आलोचकों ने हिन्दी कवियों से ही की थी। लाला भगवानदीन ने इसकी शुरूआत की थी। बिहारी और देव, देव और घनानंद-तुलना के कुछ आधार थे। मीरा और महादेवी की तुलना की भी गई थी। विदेशी लेखकों से हिन्दी लेखकों की तुलना हुई थी। शचीरानी गुर्टू ने प्रेमचंद और गोर्की शीर्षक किताब लिखी थी। पंत की तुलना कीट्स से हुई थी। आगे चलकर दक्षिण भारत के साहित्यकारों से हिन्दी साहित्यकारों की तुलना होने लगी। ‘मरलि मण्णिक’ और ‘गोदान’, ‘दो सेर धान’ और ‘गोदान’, ‘कबीर’ और ‘तिरुवल्लुर’, ‘तुलसी’ और ‘तुंचन’ जैसी कृतियां प्रकाशित हुई।
अनुवाद एक नया अध्ययन क्षेत्र बन गया। अनुवाद सिद्धांत पर हिन्दीतर भाषियों ने स्वतंत्र कृतियां लिखीं। डॉ. जी. गोपीनाथ का नाम भी इस विधा में स्मरणीय है। मलयालम भाषी अनुवादकों के अनुवाद चिंतन को उजागर करने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने एक किताब लिखी है। ‘अनुवाद अनुभव और अवदान’ इस विधा की कृति है।
अनुवाद की प्रक्रिया में हिन्दी दो प्रकार से भूमिका निभाती है। एक मुख्य कड़ी के रूप में है। कश्मीरी से एक कृति हिन्दी में आती है तो फिर हिन्दी को सेतु भाषा (स्नद्बद्यह्लद्गह्म् रुड्डठ्ठद्दह्वड्डद्दद्ग)बनाकर वह कृति मलयालम, तमिल, कन्नड़, तेलगु तथा अन्यान्य भाषाओं में भी प्रवाहित हो जाती है। खुद जुडऩे तथा दूसरों को भी जुड़वाने की क्षमता हिन्दी रखती है। यों भारतीय साहित्य की मुख्य कड़ी के रूप में हिन्दी की भूमिका कारगर बनती है। इतना ही नहीं, हिन्दीतर भाषी लेखकों की मौलिक कृतियां हिन्दी में आती हैं। तब विभिन्न प्रदेशों की सांस्कृतिक, भौगोलिक, धार्मिक खूबियां अनावृत्त होने लगती है। कई नदियां बह-बहकर समुद्र में विलीन हो जाती है। इसी प्रकार विभिन्न प्रदेशों की सांस्कृतिक झलक की कृतियां हिन्दी के महासमुद्र में विलीन हो जाती है।
हिन्दी आज भारत के बाहर के कई राष्ट्रों में पहुंच गई है। इस ढंग से अंतरराष्ट्रीय स्तर की भाषा के रूप में वह विकसित हो रही है। विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन भारत के बाहर कई राष्ट्रों में हुआ है। रूसी भाषी डॉ. चेलिशव और प्योत्र बारानिकोव की मौलिक कृतियां हिन्दी में मिलती हैं। तोमोको किकुचि जापानी भाषी हिन्दी लेखिका हंै। महादेवी वर्मा की विश्वदृष्टि पढ़ते समय हमें पता लगेगा कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए हिन्दी किस ढंग से उनकी मदद कर सकती है। इंग्लैंड, अमरीका, फ्रांस जैसे राष्ट्रों में भी हिन्दी को बढ़ावा मिल रहा है। उधर के लेखकों की मौलिक कृतियां आज हिन्दी में आ रही हैं। बेल्जियम से आए फादर कामिल बुल्के की देन अतुलनीय है।
हिन्दी में विज्ञान-प्रौद्योगिकी-तकनीकी विषयों पर केन्द्रित कृतियां भी आज लिखी जा रही हैं। सूचना क्रांति के युग में केवल भावना प्रधान साहित्य से काम निभा नहीं पाएंगे। वैज्ञानिक तकनीकी आयोग की स्थापना करके हिन्दी को समृद्ध करने की योजना भारत सरकार ने बनाई है। राज्य स्तर पर भाषा संस्थान का गठन करके प्रांतीय सरकारें इस दिशा में बहुमूल्य सेवाएं कर रही हैं। निज भाषा उन्नति की संकल्पना को यथार्थ बनाने के लिए आज मात्र साहित्यकारों की कोशिश काफी नहीं है। अभियंता, डॉक्टर, राजनयिक, विधि विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, भौतिक विज्ञान, जीवन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, मनोविज्ञान, वाणिज्य के विशेषज्ञों के साथ भाषा शास्त्रियों का संबंध जुड़ जाना है। इकतरफा विकास से भाषायी स्वावलंबन यथार्थ नहीं बन जाएगा।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आज नए प्रकार का परिवर्तन लागू किया जा रहा है। पाठ्यक्रम में भाषा और साहित्य को जगह न देने की सोच प्रबल बन रही है। मानविकी विषयों को पाठ्यक्रम से हटाने की साजिश चल रही है। परंपरागत विषय तथा नई शताब्दी विषयों के रूप में वर्गीकृत करके पहले को छोडऩे का निर्णय कुछ ‘शिक्षाविद्’ अपनाते हैं। पर्यावरण की जानकारी देनी है। मानवाधिकारों की शिक्षा देनी है। इसके लिए भाषा के लिए निर्धारित घंटों की कटौती करनी है। यही उनका सुझाव है। साहित्य हमेशा मानवीय अधिकारों की हिमायत और वकालत करता आया है। शोषण, अत्याचार, दमन और उत्पीडऩ के शिकार बनने वालों को न्याय दिलाना साहित्यकार की कामना है। न्यायवंचितों के पक्ष में खड़े होकर जनचेतना को प्रबुद्ध बनाना साहित्यकार का बुनियादी धर्म है। संविधान के प्रावधान से ज्यादा प्रेरणा साहित्यकारों के उद्गारों में प्रस्फुटित होती है। हिन्दी में इसको रेखांकित करने वाली कई कृतियां अनेक विधाओं में मिल जाती हैं। इस परिस्थिति में मानवाधिकार और पर्यावरण पढ़ाने के लिए भाषा-साहित्य के अध्ययन अध्यापन को बंद करना विवेक संगत सुधार नहीं है। हिन्दी के पास इस प्रकार का समृद्ध साहित्य है। इस ढंग की कृतियों से हमारे साहित्य को अधिक टिकाऊ बनाना भी समय की सख्त मांग है। साहित्यकार मानवीयता की वकालत के साथ-साथ विश्व की तमाम चेतन-अचेतन वस्तुओं की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। क्रौंच पक्षी का क्रंदन भी उसके अंत:करण को झकझोर डालता है। जिजीविषा और सर्वात्मवाद के स्वर को मुखरित करने वाली कृतियां भाषा की गौरव गरिमा को बढ़ाती है। बर्बरता को साहित्यकार बर्दाश्त नहीं कर पाएगा?
हिन्दी के सशक्तीकरण का दायित्व आज कई प्रकार के और प्रदेश के लोग निभा रहे हैं। आरंभ में वह एक सीमित प्रदेश की भाषा रही थी। लेकिन धीरे-धीरे उसका विकास अन्य प्रदेशों में हुआ। दूसरे राज्यों और राष्ट्रों की जनता ने उनको आत्मसात कर लिया। इस आत्मसातीकरण की प्रक्रिया में उसकी स्फूर्ति और चेतना बढ़ती गई, बलवती बनती गई। गांधी जी, टैगोर, विनोबा और सुभाषचंद्र बोस की मातृभाषा हिन्दी नहींथी, लेकिन वे उसके समर्थक और संरक्षक बने। दसवीं-ग्यारहवींसदी से हिन्दी का विकास हो रहा है। कई अमर साहित्यकारों की अनश्वर कृतियां हिन्दी को मिली हैं। तीर्थयात्रियों, भक्तों और साधकों ने इस भाषा से हृदय संपर्क रखा है। भक्ति, शिक्षा, संस्कृति, दर्शन, वाणिज्य, व्यवसाय, विज्ञान, प्रशासन और प्रौद्योगिकी  से हिन्दी जुड़ी है। आज भारतीय भाषाओं से उसका स्नेह संपर्क बढ़ गया है। इतना ही नहीं, विश्वमंच पर भी हिन्दी विराजमान है। भाषा की रक्षा पोषण करना हमारा दायित्व है। दीवार का धर्म आवागमन को रोकना है। दरवाजे का धर्म आवागमन को सुगम और सुचारू बनाना है। हिन्दी को हम दरवाजा मानकर आगे बढ़ेंगे। वह बहता नीर है। सुगंध फूल की सम्पत्ति है। लेकिन हवा  बहते समय सुगंध सब कहीं फैलती है। तब फूल को खुशी का महसूस होगी। अन्य राज्यों-राष्ट्रों के लोगों के सद्भाव मिलने के कारण हिन्दी का क्षितिज विकसित हो रहा है। उसका मैदान विशाल बन रहा है।