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Friday 24 Nov 2017

गोर्की और प्रेमचन्द

 

 भगवान स्वरूप कटियार

bhagwanswaroopktr7@gmail.com


रुस के महान जनवादी लेखक मैक्सिम गोर्की और भारत के जनसरोकारों के महान यथार्थवादी लेखक प्रेमचन्द समकालीन थे। दोनों अपने -अपने  देश, काल, समाज और समय का लेखकीय प्रतिनिधित्व कर रहे थे। दोनों जनसरोकारों और बदलाव के लेखक थे और उनके पात्र समाज का वह वर्ग था जिनकी आवाज को हमेशा दबाया गया। सच कहें तो ये दोनों महान लेखक अपने समय के हाशिये के लोगों की आवाज बन कर सामने आये और उस लेखन की दुनिया में यह एक क्रान्तिकारी शुरुआत थी खास कर भारतीय परिप्रेक्ष्य में। रूस में तो लियो टालस्टाय इस मुहिम की अगुवाई पहले कर चुके थे पर भारत में किसानों, अछूतों, स्त्रियों, मजदूरों को कहानियों और उपन्यासों का पात्र बनाने की एक नयी शुरुआत थी। इसीलिए बहुत समय तक प्रेमचन्द का भारत की लेखकीय दुनिया ने संज्ञान ही नहीं लिया। आलोचकों ने कमोबेश प्रेमचन्द के साथ कबीर जैसा ही सलूक किया। पर कबीर और प्रेमचंद को नकारने वालों को उनके पाठकों ने नकार दिया। प्रेमचंद और गोर्की की न तो कोई पारस्परिक तुलना की जा सकती है और न ही उन के बीच कोई साम्य स्थापित किया जा सकता है और न ही उसका कोई औचित्य ही है, क्योंकि दोनों की ऐतिहासिक परिस्थितियों  और सामाजिक परिवेश में भारी अंतर था। पर दोनों बेहद सजग, सचेत और संवेदनशील लेखक अपने-अपने देश के समय-समाज की विद्रूपताओं को उघाड़ रहे थे और क्रूर सच्चाई को समय के धरातल पर रखने का दुस्साहस कर रहे थे। इस प्रकार वे दोनों ही साहित्य का एक नया सौंदर्यशास्त्र रच रहे थे और साथ ही बदलाव के साहित्य का घोषणापत्र भी लिख रहे थे।
     प्रेमचन्द को भारत का गोर्की कहा जाता है। दोनों महान लेखक आमजन के दर्द और उनकी मुक्ति के प्रवक्ता थे। मैक्सिम गोर्की का जन्म 28 मार्च 1868 को वोल्गा के तटवर्ती नीज्नी नोव्गोरोद में, एक निम्न मध्यमवर्गीय बढ़ई परिवार में हुआ था। उसी तरह मुंशी प्रेमचन्द का भी जन्म 31 जुलाई 1880 को गंगा के तटवर्ती बनारस शहर से सटे लमही गांव के एक निम्न मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ था। प्रेमचंद गोर्की से 12 वर्ष छोटे थे पर दोनों का निधन एक ही वर्ष 1936 में हुआ। गोर्की सोवियत संघ लेखक संघ के प्रथम अध्यक्ष थे और उसी तरह प्रेमचन्द भारतीय प्रगतिशील लेखकसंघ के प्रथम अध्यक्ष थे। यह साम्यता दोनों को एक साथ खड़ा करती है।  1 जून 1936 को गोर्की का निधन हुआ और सारी दुनिया में शोक सभाएं हुईं, उन्हीं दिनों मुंशी प्रेमचन्द स्वयं बहुत बीमार होते हुए भी दैनिक आज के बनारस कार्यालय में आयोजित शोक सभा में शामिल हुए और कहा कि गोर्की के मरने से मुझे बहुत दु:ख हुआ और मुझे लग रहा है कि उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है, और कुछ दिनों बाद उसी वर्ष 1936 में ही मात्र 56 वर्ष की आयु में भारत के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। दोनों में एक साम्य और था कि दोनों जितने बड़े लिख्खाड़ थे उतने ही बढ़े पढ़ाकू भी थे। गोर्की और प्रेमचंद दोनों लियो टोलस्टाय से बहुत प्रभावित थे और उनके कथन कि लेखक और साहित्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे मनुष्य को जिन्दगी और संसार से प्रेम करने के लिए बाध्य करे, को ही दोनों ने अपने लेखन का ध्येय बनाया। गोर्की के उपन्यासों जैसे मेरा बचपन, जीवन की राहों पर, मेरे विश्वविद्यालय एवं रूस के आर-पार में उनके जीवन की घटनाओं के विवरण मिल जाते हैं पर प्रेमचन्द ने अपने बारे ऐसा कुछ नहीं लिखा। हाँ ले देकर जीवन सार नाम से संक्षिप्त जीवनी लिखी थी जो उनके बारे कम उनके आसपास के बारे में ज्यादा थी। प्रेमचंद ने लिखा कि मेरा जीवन समतल सपाट मैदान है जिसमें कहीं-कहीं गड्ढे तो हैं पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का कोई स्थान नहीं है। उनका यह कथन उनकी चरित्रगत विनम्रता दर्शाता है। यह सही है कि उनका जीवन गोर्की की तरह विविध घटनापूर्ण नहीं था पर उतार-चढ़ाव, अभावों और आर्थिक तंगी तथा सदैव बीमार रहने के कडुए अनुभव प्रेमचन्द के जीवन में भी कम नहीं थे। भले ही प्रेमचंद ने अपना विस्तृत जीवन वृत्तांत न लिखा हो पर उनकी कहानियों जैसे होली की छुट्टी, रामलीला, ईदगाह, कजाकी, सौतेली माँ, गुल्ली डंडा, ढपोरशंख, बड़े भाई साहब, प्रेरणा, रसिक सम्पादक, लाल फीता, मृत्यु के पीछे आदि और इसी प्रकार उपन्यासों गोदान, गबन, रंगभूमि, कर्मभूमि और निर्मला में उनके जीवन की झलक देखने को मिलती है। उनके द्वारा लिखे गये ढेरों पत्रों, लेखों, समालोचनाओं में उनका जीवन झांकता दिखाई देता है। उनके बेटे अमृत राय द्वारा लिखी किताब कलम का सिपाही और उनकी पत्नी शिवरानी देवी द्वारा लिखी किताब प्रेमचन्द घर में, में प्रेमचन्द का विस्तृत जीवन वृत्तांत देखने को मिलता है। मंगलसूत्र उनका आखिरी आत्मकथ्यात्मक उपन्यास था जो पूरा न हो सका।
  गोर्की का साहित्यिक जीवन 1892 से प्रारम्भ हुआ और 1932 में जब उनकी गणना दुनिया के महानतम लेखकों में होने लगी थी तब उनकी चालीसवीं वर्षगांठ मनाई गयी थी। उसी समय उनके जन्म स्थान नीज्नी नोव्गोरोद का नाम गोर्की रखा गया और गोर्की विश्व संस्थान की स्थापना हुई और इसी साल मास्को की एक प्रमुख सडक़ का नाम गोर्की के नाम से रखा गया। इसके बाद वे बीमार रहने लगे और 68 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। 1905 का वर्ष गोर्की और पूरे रूस के लिए ऐतिहासिक घटनाक्रम की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था। जारशाही के खिलाफ  रूस की जनता का एक बड़ा प्रतिरोध प्रदर्शन पूरे देश में हुआ जिसमें तमाम निहत्थे और निर्दोष लोग मारे गये। गोर्की इस क्रान्तिकारी पहलकदमी के अगुआ लोगों में थे। गोर्की ने क्षुब्ध होकर रुसी जनता की ओर से जार के नाम एक पत्र लिखा जिसके लिए गोर्की को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी रिहाई के लिए न सिर्फ रूस बल्कि दुनिया भर में मेहनतकश जनता और बुध्दिजीवियों की ओर से मांग उठी और जारशाही को उन्हें रिहा करना पड़ा। वर्ष 1905 के मध्य वे बोल्शेविक पार्टी के विधिवत सदस्य बने और पूरी तरह माक्र्सवादियों के साथ जुड़ गये। उन्होंने बोल्शेविक पार्टी के अखबारों नया जीवन, संघर्ष के प्रकाशन में अहम भूमिका निभाई। राजनीतिक गतिविधियों में जोश खरोश से भाग लेने के साथ-साथ उन्होंने सूर्य पुत्र और बर्बर जैसे महत्वपूर्ण नाटक लिखे जिनका पूरे देश भर मंचन किया गया। इसी वर्ष रूस में सशस्त्र विद्रोह हुआ और उस समय गोर्की मास्को में थे। उनकी गिरफ्तारी होना पक्का था जिससे बचने के लिए वे मित्रों के आग्रह पर रूस छोड़ कर स्वीडन और डेनमार्क होते हुए जर्मनी पहुंचे जहां से वे स्विट्जरलैंड और पेरिस गये और फिर अमेरिका चले गये। अमेरिका में गोर्की का बुध्दिजीवियों और लेखकों ने जोरदार स्वागत किया गया। इस यात्रा का मकसद गिरफ्तारी से बचने से ज्यादा जारशाही के खिलाफ विदेशों में जनमत तैयार करना था जहां से जार को विदेशी कर्ज मिलता था। यहीं रह कर उन्होंने अपनी अमर कृति माँ की रचना की और पूंजीवाद का भंडाफोड़ करने वाली स्वर्ण राक्षस की रचना की। वर्ष 1906 में गोर्की अमेरिका से लौटे और इटली के काप्री द्वीप में रहने लगे। वर्ष 1907 में लेनिन ने गोर्की को लन्दन में होने वाली सामाजिक जनवादियों की पांचवी कांग्रेस में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। वैसे वर्ष 1905 में पीटर्सबर्ग में गोर्की की लेनिन से मुलाकात हो चुकी थी। गोर्की लेनिन की तर्कपूर्ण भाषण शैली से बहुत प्रभावित थे। वर्ष 1908 में लेनिन कोप्री द्वीप में गोर्की के साथ कुछ दिन रहे जहां उन्होंने लेनिन के साथ अपने विदेश प्रवास के अनुभव साझा किये और लेनिन ने उन्हें इन अनुभवों को लिपिबध्द करने के लिए प्रेरित किया। जिसके कारण उनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ मेरा बचपन, मेरे विश्नविद्यालय, जीवन की राहों पर का सृजन हो सका। गोर्की का सम्पूर्ण लेखन उनके जीवन संघर्ष यात्रा है जिसमें विचार फूलों की तरह महकते मिलते हैं।
       दोनों लेखकों के सामने एक सवाल था क्या वे दुनिया के दु:ख दर्दों के प्रति आंखे मूंदे रहें। क्या अपना एक स्वप्न संसार बना कर उसमें विचरते रहें या फिर निजी जीवन की सीमा में बंधे रहें। दोनों का उत्तर था नहीं, नहीं, नहीं। इन दोनों महान लेखकों ने दुनिया को बदलने के लिए अपने को झोंक दिया। दुनिया भी बदली और लेखकीय परम्पराएँ भी बदली। मुंशी प्रेमचंद के बाद कहानी और उपन्यासों में राजा रानी की जगह किसान मजदूर के रूप में होरी, धनिया, गोबर और सूरदास जैसे चरित्रों ने जगह ली। गोर्की ने प्रेमचन्द को पढ़ा था कि नहीं यह नहीं पता पर प्रेमचन्द ने गोर्की को पढ़ा था इसमें कोई शक नहीं और वे रुसी क्रान्ति से बेहद प्रभावित थे। वे अपने लेख महाजनी सभ्यता में लिखते हैं - धन्य है वह सभ्यता जो मालदारी और निजी सम्पत्ति को खत्म कर रही है और जल्द या देर से दुनिया इसका अनुसरण करेगी। हाँ महाजनी सभ्यता के गुर्गे अपनी शक्ति भर उसका विरोध करेंगे पर जो सच है वह तो एक दिन होकर रहेगा। गोर्की और प्रेमचन्द अपने समय के योध्दा थे जो अपने समय की विद््रूपताओं से लड़ते लड़ते अमर हो गये और हम सबके लिए नये सपनों का एक विराट संसार सौंप गये जिसको समृद्ध करना हम सबकी जिम्मेदारी है।