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Tuesday 21 Nov 2017

आलोचना मेरा कर्म क्षेत्र नहीं है : डॉ. विवेकी राय


मुहम्मद हारून रशीद खान

मु. खजुरिया, पोस्ट- पीरनगर, जनपद- गाजीपुर (उ.प्र.)
पिन- 233001,
 मो. 9889453491
सोनवानी (गाजीपुर) जिले के किसान परिवार में सन् 1923 में जन्मे। मिडिल स्कूल (1940) के बाद समूची शिक्षा स्वाध्याय से पूरी की पी.एच.डी. (1970) तक। अध्यापक जीवन प्रारंभिक स्कूल से चलकर स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर के हिन्दी विभाग से सन् 1988 में अवकाश प्राप्त। दैनिक ‘आज’ (वाराणसी) में पहली कहानी ‘पाकिस्तानी’ के बाद उक्त पत्र में सन् 1956 से 1970 तक एक स्थायी साहित्यिक और साप्ताहिक स्तंभ ‘मनबोध मास्टर की डायरी’, लगभग आधी शताब्दी के रचनाकार, जीवन में कविता, कहानी, उपन्यास, ललित निबंध, निबंध, शोध और समीक्षा, संस्मरण आदि की 80 से ऊपर पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पुरस्कृत, अनेक पुस्तकें अप्रकाशित। सन् 1994 में आप का चर्चित उपन्यास ‘मंगल भवन’ और 9 वां ललित निबंध संग्रह ‘उठ जाग मुसाफिर’ प्रकाशित। विविध संस्थानों और राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा विशिष्ट साहित्य सेवाश्रम के लिए पुरस्कृत, सम्मानित। प्रारंभ से ही हिन्दी की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं से रचनात्मक योगदान के क्रम में सतत् जुड़े। विशिष्ट शैलीकार और ग्राम जीवन के समर्पित शिल्पी विवेकी राय जी, डॉ. विवेकी राय मार्ग बड़ीबाग, गाजीपुर (उ.प्र.) स्थित ‘गंवई गंध गुलाब’ नामक कुटी में निवास करते हैं।
प्र.-डॉ. साहब, सांस्कृतिक राजनीतिक विघटन के इस दौर में साहित्य अपनी पहचान कैसे बनाए रख पाएगा?
उ.- यह सत्य है कि बहुत व्यापक रूप में सांस्कृतिक, राजनीतिक विघटन का दौर चल रहा है। इसमें एक सामाजिक दौर को भी जोड़ लेना चाहिए। इन्हीं तिहरे जीवनाधारों को साहित्य अपना विषय बनाकर खड़ा होता है। आज भी खड़ा हो रहा है, लेकिन कष्ट होता है यह देखकर कि उसकी पहचान भी विघटित होकर बेपहचान हो गई है। उसकी परिवर्तनकारी क्षमताएं तथा प्रेरक ऊर्जाएं ठंडी पड़ गई हैं। आपके प्रश्न में उसकी मूलभूत पहचान को सुरक्षित रखने की चिंता निहित है। मेरे विचार से इस प्रश्न का उत्तर साहित्य नहीं, साहित्यकार के परिप्रेक्ष्य में विचारणीय है। बंटा हुआ खण्ड-खण्ड विघटित मानस और बहुआयामी गिरावट वाले दौर के चपेट में उलझा हुआ साहित्यकार क्या करे? समय की धारा में बहे या समय की धारा को उलटे? कभी-कभी यह दावा तो करता है कि धारा को उलटने के संकल्प से लेखनी उठी है, लेकिन कुल मिलाकर कुछ सकारात्मक परिणाम नहीं आता दीख रहा है और जो दीख रहा है वह परिवर्तन तो है मगर अधूरा है। बहुत मुश्किल है आज साहित्यकार के लिए पक्ष और विपक्ष से समन्वित और समबुद्धि से साहित्य सृजन में लगे होना और अपनी आंतरिक ऊर्जा से सही अर्थों में परिवर्तनकारी और प्रेरक आयामों को उतारना। लेकिन हमें निराश नहीं होना चाहिए। समय की परिवर्तनकारी शक्तियां साहित्य को बल प्रदान करेंगी और वह अपनी सही पहचान को लेकर खड़ा हो सकेगी।
प्र.- आज नारी विमर्श और दलित विमर्श की चर्चा है। क्या तथाकथित दलितों की यथार्थपरक और प्रामाणिक रचनाएं मात्र दलित रचनाकार ही रच सकते हैं? आप क्या सोचते हैं?
उ.- उत्तर आधुनिकता ने दो अच्छी चीजें दी, नारी विमर्श और दलित विमर्श। इस पर चर्चाओं का अम्बार लग गया है, लेकिन मेरा अपना विचार है कि नारी विमर्श एक फैशनेबुल मनोरंजन जैसा हो गया है और दलित को दलित ही सही रूप में रेखांकित कर सकता है सामान्य रूप से सुनने में तो यह बात बहुत अच्छी लगती है, लेकिन क्या सचमुच दलित ही यथार्थ रूप में दलित के ऊपर साहित्य रच सकता है? आजकल हर जगह टांग अड़ाने वाली एक वस्तु बीच में आ गई है, उसका नाम है राजनीति। यह राजनीति सामान्यत: दलित को पीछे करके स्वयं आगे हो जाती है। साहित्य तो बनता है मगर क्या वह निराला की कविता ‘वह तोड़ती पत्थर’ या ‘भिक्षुक’ की तरह चाबुक का काम करता है? अथवा क्या आधुनिक दलित विमर्श के संदर्भों पर आधारित महात्मा गांधी अथवा स्वामी विवेकानंद के विचारों की भांति परिवर्तनकारी चेतना की आंधी चलाने वाला सिद्ध होता है? अदलित लोगों ने भी दलित की पीड़ा, यंत्रणा, संत्रास और उत्पीडऩ वाली समस्या को बहुत डूबकर गहराई से प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया है। उसे पक्षपाती चश्मे से क्यों देखा जाए? सत्यानाशी है यह पक्षपात जो सृजन क्षेत्र में दलित अदलित लेखक को अलग करता है।
प्र.- क्या आप ऐसा कुछ मानते हैं कि आज की कहानी और तकरीबन चार दशक पूर्व की कहानी में अंतर है। कथ्य से गांव की पीड़ा गायब है। आज की कहानी फैशन के तौर पर उबाऊ कहानी नहीं होती जा रही है?
उ.- आपका प्रश्न कह रहा है कि समय बदलने के साथ कहानी बदल गई है और आज की कहानी में बहुत गिरावट आई है तथा उसके भीतर से गांव की पीड़ा गायब है। यह बात सही भी हो सकती है और गलत भी। समय बदलने के साथ-साथ कथ्य और शिल्प बदल ही जाता है। समय की मांग पर कभी आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानी की मांग थी, समय बदला, स्वराज्य हुआ तो कहानी का केन्द्रीय विषय गांव हो गया। बदलते समय की विभिन्न घटनाओं के बाद समकालीन कहानी के नाम पर कहानी ठहर गई और जब समकालीन समय गिरावट का दौर है तो संभव है किसी को कहानियों में गिरावट लगे। समकालीन समय नगरों, महानगरों का है। गांवों का भी शहरीकरण हो रहा है, तो कहानी क्या करे? कहानीकार क्या करे? फिर कहानीकारों की भीड़ है। उसमें कुछ बहुत अच्छे कहानीकार भी हैं। मुख्यत: महिला कहानीकारों की कलम इस विधा में बहुत सधी हुई प्रतीत हो रही है। इसलिए कहानी के विषय में कुछ निर्णायक बात नहीं कही जा सकती है। वैसे तो पूरे सृजन परिदृश्य पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगा है वह समाज जीवन के लिए संजीवनी जैसा सिद्ध नहीं हो रहा है तो फिर एक कहानी को ही क्यों कोसे?
प्र.- आपने कई विधाओं में लेखन किया है। अपनी सबसे प्रिय व महत्वपूर्ण विधा किसे और क्यों मानते हैं?
उ.- यह सत्य है कि मैंने एक नाटक छोडक़र सभी विधाओं में कलम चलाई है,लेकिन यह कहना बहुत कठिन है कि मुझे अपनी कौन-सी विधा प्रिय लगती है? जिस समय मुझे जिस विषय पर लिखना है उस विषय के अनुरूप कलम से स्वयं ही विधा कढ़ जाती है। सोच-समझ करके काढ़ता तब प्रिय या महत्वपूर्ण का प्रश्न उठता। समय और समाज के बहुत विस्तृत फलक को लेकर अगर मैं रचना करने बैठता हूं तो वह स्वयं में उपन्यास बन जाता है। यदि कोई छोटी सी घटना भीतर कुरेदती है तो उसका चित्रण रसात्मकता, संवेदनीयता और आत्मीयता अथवा व्यंग्य विनोद के योग से रिपोर्ताज बन जाता है या ललित निबंध बन जाता है। सम्पूर्ण रूप से मन को रमाकर उसे अंतिम रूप देता हूं। इस प्रकार मुझे तो यह लगता है मेरे लिए अपनी सभी विधाएं प्रिय और महत्वपूर्ण हैं।
प्र.- आलोचना भी आपका कर्मक्षेत्र रहा है। आपने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों ही आलोचनाएं लिखी है। सैद्धांतिक आलोचना में आपकी मौालिकता क्या है?
उ.- आलोचना मेरा कर्मक्षेत्र नहीं है। कुछ आलोचनाएं लिखी गई हैं, लेकिन मैं आलोचक नहीं हूं। शौक पुस्तक पढऩे का है, पढ़ी गई किताब यदि बहुत पसंद आती तो मैं निश्चित रूप से अपनी पसंदगी को लिख देता हूं। बस यही विश्लेषण मेरा लक्ष्य होता है कि इस कृति में क्या-क्या है जो आकर्षित करता है, जो समाज सापेक्ष है, जिसमें कुछ मानवीय सरोकारों के संदेश हैं तथा जिसका शिल्प संतुलित, समन्वित और समायोजित है। इसीलिए आलोचक मानकर मेरे ऊपर दोषारोपण होता है कि ये केवल लेखकों की प्रशंसा करते हैं। मैं अवश्य ही कुशल अक्षर पुरुषों की खुलकर प्रशंसा करता हूं, मगर वह प्रशंसा ऐसी नहीं होती है कि मेरे परिचितों की या मित्रों की ही हो, अथवा मेरी विचारधारा वाले की हो। अधिकांश लोग तो ऐसे हैं जिनसे परिचय तो क्या आज तक मैंने देखा भी नहीं है। लेकिन उनकी कृति यदि पसंद पड़ी तो ढेर सारे पृष्ठ रंग गए हैं। सैद्धांतिक आलोचना मेरे क्षेत्र से बाहर थी किसी कृति की पसंदगी और फिर उस पर व्यावहारिक आलोचना, बस यही मेरा क्षेत्र है।
प्र.- आलोचना को एक रूखी विधा माना जाता है, लेकिन आपकी आलोचना में तार्किकता और बौद्धिकता का अद्भुत मेल रहता है। यह समन्वय कैसे संभव होता है?
उ.- प्रिय हारून, फिर आपने मेरी आलोचना पर प्रश्न किया है। आपको मेरी आलोचना में तार्किकता का बौद्धिकता समन्वय मिलता है तो यों समझिए कि उसका उत्तर भी मेरे ऊपर वाले उत्तर में हो गया है, क्योंकि मेरा ध्यान पूरी तरह से पुस्तक पर और उसके कथ्य शिल्प पर होता है। किसी तरह की खींचतान न कर केवल उसकी अंतरंग अभिव्यक्ति शक्ति का उद्घाटन करता है, जो मेरी ही तरह अन्य पाठकों को भी अनुरंजित, प्रेरित और उद्बुद्ध करती होगी।
प्र.- आलोचक विचारधारा को अपनी आलोचना का सिद्धांत बनाते हैं। आपने किस विचारधारा को आधार बनाया है?
उ.- यह लीजिए फिर एक प्रश्न आलोचना पर ही आया। संभवत: मेरी आलोचनाएं आपको बहुत पसंद हैं। वैसे तो मैं जीवन में आरंभ से ही गांधीवादी रहा और अब भी कुछ नये प्रभावों के साथ वही हूं, लेकिन रचनाओं में सम्पूर्ण रूप से गांधीवाद उतर पाता है या नहीं यह मैं नहीं कह सकता। वास्तव में मेरी रचनाएं आधुनिककाल की प्रचलित विविध विचारधाराओं में से किसी एक को लेकर आगे करके नहीं चलती है। विचारधारा जैसी चीज रचना बन जाने के बाद उसमें झलक सकती है। कोई निश्चित नाम लेना जरूरी हो तो उसे गांधीवाद ही कहिये।
प्र.- क्या आज ‘गोदान’ को एक पॉलिटिकल क्रिटिक के तौर पर पढ़े जाने की जरूरत है?
उ.- ‘गोदान’ भारतीय जमीन का महाकाव्य है। उसे साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से ही पढ़ा जाना उचित है। राजनीतिक दृष्टि से उसे पढऩा और उसका आकलन करना उचित नहीं होगा। औपनिवेशिक व्यवस्था का समय शोषण, उत्पीडऩ, गरीबी और पिछड़ेपन का था। ऐसे कठिन काल में भी भारतीय औसत किसान अपनी संस्कृति की जमीन पर खड़े रहने का आग्रही ही था। उधर समय के धक्के से, समाज की टूटन से संस्कृति की जमीन दरक रही थी। इसी दरकने की पीड़ा ‘गोदान’ है और इस ‘गोदान’ शब्द में ही वह समूचा तीखा चुभता हुआ व्यंग्य निहित है जो उस जमीन के दरकने को संवेदित करता है। होरी के किसान जीवन की संस्कृति एक गाय में केन्द्रीयभूत हो गई थी। गाय द्वार पर आयी और चली गई तो फिर नहीं आयी। उसकी गंभीर चोटिल अभिलाषा लिए वह मर गया। तो फिर उसके नाम जैसे ‘गोदान’ होता है जो एक भारी व्यंग्य है। यह व्यंग्य और ‘जहरीला’ तब हो जाता है जब ‘गो’ अर्थात् गाय का दान, घर की कुल पूंजी परम्परागत पंडित को देकर सम्पन्न होता है। तो देखने के लिए या पढऩे के लिए इसे राजनीतिक रंग में ढालकर पढ़ा जा सकता है, लेकिन ऐसा होना पर ‘गोदान’ की अंतरंग समस्याएं ओझल हो जाएगी। इसीलिए अच्छा है इसे राजनीतिक रंग न दिया जाए। कोई संस्कृति कैसे धीरे-धीरे विकृति में परिणति होती है यह विचारणीय विषय है और कोई मर्यादावादी समाज कितना किस प्रकार विकृत सामाजिक संस्थाओं में पिसकर विनष्ट होता है, यह सब विचारणीय है। यही उत्तेजना ‘गोदान’ के पाठक के भीतर होती है।
प्र.- ‘बबूल’ कृषक जीवन का महाकाव्य है। क्या आप इसे अपना सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मानते हैं?
उ.- आपकी दृष्टि में ‘बबूल’ कृषक जीवन का महाकाव्य है, लेकिन मुझे तो कभी-कभी लगता है वह दलित जीवन का एक शोकगीत है जिसमें कहीं उल्लास के चित्र भी हैं तो उनके भीतर कोई गहरी वेदना कहीं न कहीं से झलक मारती है। प्रथम उपन्यास- सृष्टि होने के कारण उसमें अवश्य ही सृजन-ऊर्जा का उछाल है, मगर जहां तक सर्वश्रेष्ठ मानने का सवाल है, निर्णय कठिन है। मुझे अपने सभी उपन्यास बस उपन्यास लगते हैं जो अपनी पूरी मानसिक संतुष्टि के साथ लिखे गए हैं और पूर्ण हुए हैं। श्रेष्ठता वगैरह का निर्णय तो पाठक और समालोचक करें। लेखक क्यों इसमें पड़े?