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Tuesday 16 Oct 2018

बाढ़: दो कविताएँ

यश मालवीय
ए-111 मेहंदौरी कालोनी
इलाहाबाद-211004 (उ.प्र.)

बाढ़: दो कविताएँ   
गली मोहल्ले नाव चल रही

गली मोहल्ले नाव चल रही   
सूने पड़े मदरसे
घर में घुसा बाढ़ का पानी
जमकर बादल बरसे
ठंडा-ठंडा चूल्हा-चौका
आँगन लहरे नदिया
छज्जे-छज्जे डोले, कैसे
जान बचाये रधिया?
पानी वाले साँप, काढ़ते हैं फन
इधर-उधर से
नई बहुरिया डरी
ससुर को खींच किया कमरे में
मरा हुआ कुत्ता बहकर
आ गया बीच कमरे में
लगा काँपने बूढ़ा बरगद भी
अनजाने डर से
हंडा और परात तैरते
गुमी फूल की थाली
लोटा बटुई कलछुल डूबे
डूबी बिल्ली काली
खाट हुई कागज की कश्ती
छूट गई बिस्तर से
नाव का पानी निकाला जा रहा है
वक्त को जैसे खँगाला जा रहा है
नाव का पानी निकाला जा रहा है
दिन महीने पर्व
कितने बरस डूबे
गाँव डूबे,
मन्दिरों के कलश डूबे
बहुत ऊँचे उड़े एरोप्लेन से
देखिये पैकेट उछाला जा रहा है
ये व्यवस्था
भला करने पर तुली है
बाढ़ राहत शिविर में
बोतल खुली है
भूख के सँग बह रहे चूल्हे-सिलिन्डर
रोटियों का वहम पला जा रहा है
पेड़ गरदन तक धँसे हैं
पर खड़े हैं
है नई विपदा,
पुराने आँकड़े हैं

टोपियाँ हैं, फ्लैशगन हैं, कैमरे हैं
कढ़ी बासी है, उबाला जा रहा है

हाथ में पानी लिये
तलवार नंगी
बस लुभातीं
योजनाएँ हैं तिरंगी

घुट रही सी चीख है मन में, गले में
होंठ का ताला उछाला जा रहा है