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Monday 20 Nov 2017

दवा

सूर्यप्रकाश मिश्र
बी-23/42, ए.के. बसंत कटरा
गांधी चौक, खोजवां (दुर्गाकुण्ड)
वाराणसी- 221001
दवा

दादाजी से मिलने
उनके बचपन के मित्र आए हैं
आज अरसे बाद
दादाजी खुलकर हंसे हैं
खिलखिलाएं हैं

उनकी बातों में
खेत-खलिहान
तालाब वाली चुड़ैल, भूतों का मकान
स्कूल की घंटी बजाने वाला हथौड़ा
खट्टे-मीठे आम का टिकोरा
बेरी का पेड़, मीठी रसभरी
बूढ़े मास्टर की कंटीली छड़ी
आसमान छूता हुआ ताड़
गांव के सीवान का मरखहवा सांड़
आज भी छाये हैं

पप्पू ने सोचा
ये लोग जाने कैसे-कैसे
अबूझ जुमले सुना रहे हैं
उन पर खुश हो रहे हैं
और बच्चों की तरह-
तालियां बजा रहे हैं

उसने देखा
दादा के चेहरे पर
कई रंग आ रहे हैं जा रहे हैं
महीनों से बीमार दादाजी
जिन पर दवाएं बेअसर थीं
शायद अवसाद से बाहर आ रहे हैं

साथी

बाबूजी के सारे साथी
एक-एक करके चले गए
वहां पर जहां से
कोई वापस नहीं आता
बस एक बचा है
गांव के सीवान पर खड़ा
बूढ़ा बरगद

बाबूजी रोज सुबह-शाम
उसके पास जाते हैं
उसकी सुनते हैं, अपनी सुनाते हैं
जाते हैं उदास-उदास
पर लौटते हैं तो
मुस्कुराते हैं

किसी और को
बाबूजी से या बूढ़े बरगद से
मिलने की फुरसत नहीं
या कहिए जरूरत नहीं

कल कई मोटरों पर चढक़र
विकास आया था
उसकी बातें सुनकर बरगद उदास था
उसने गम बांटने के लिए
या शायद आखिरी बार
मिलने के लिए
बाबूजी को बुलाया था
बाबूजी मिलकर आए हैं
उनकी निगाहों में रातों के साये हैं
कुछ बोलते नहीं
ये दर्द सहने की तैयारी है
लगता है आखिरी साथी के
बिछडऩे की बारी है