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Thursday 23 Nov 2017

संबोधन

 रजनीकांत पाण्डेय ‘व्याकुल’
बेने, आलोङ, वेस्ट शियाड्र
अरुणाचल प्रदेश-791001
मो. 9436631077
संबोधन

संबोधन किसे! और क्यों?
अरे, जब घुप्प अंधेरे की दीवार पर
लिखी इबारत पढ़ लेने की
कुब्बत पैदा कर ही ली है
तो- संबोधित करो
सन्नाटे को
जो चीर दे अंधेरे का सीना
जगा दे प्रकाश को
जो बंद है
सत्ता की हवेली में।
यह उपालंभ और शिकायत का समय नहीं
तरकश से निकालो तीर।
करो प्रहार पत्थर सी हथेली पर
निकलने दो चिंगारी
अंधेरा बड़ा कमजोर होता है
ठिठक जाएगा मद्धिम रोशनी की
लकीर से।
अपने अधिकार के लिए
अभ्यर्थना क्यों?
मांगों अपना हक
अंधेरे में बंद है तुम्हारा
भविष्य,
संबोधित करो उसे
यह समय याचना का नहीं
बल्कि समय है
संघर्ष का,
चीखने का
चिल्लाने का
ज्यादा चुप्पी
ठीक नहीं।