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Saturday 25 Nov 2017

चिल्लर-सरीखे दिन

मालिनी गौतम
574, मंगल ज्योत सोसाइटी संतरामपुर-389260 गुजरात
मो. 9427078711
चिल्लर-सरीखे दिन
हाथ में हैं शेष कुछ चिल्लर-सरीखे दिन।
हड़बड़ाती जिन्दगी इक रेल-सी गुजरी चाहतों के स्टेशनों पर चार पल ठहरी
उम्र के खाली कपों में घूंट-से पल-छिन।
कसमसाती ख्वाहिशों ने जब निचोड़ी प्यास ठूँठ वृक्षों पर उगी इक जलतरंगी आस
बेबसी लेकिन चुभोती हर खुशी में पिन।
जेब-खर्चे को मिले थे कुछ उनींदे पल गुल्लकों में रख दिये जो काम आयें कल
कट रही है उस्तरे पर जिन्दगी कमसिन।
मुखपृष्ठों के हुए नहीं
किरदार अभी हम

   मुखपृष्ठों के हुए नहीं किरदार अभी हम
जाल रेशमी धूप बुन रही है खिडक़ी पर सीली इच्छा तोड़ रही दम मन के भीतर खोलें मन की गांठ, नहीं हैं इतने सक्षम ।
दुख के सिल-बट्टे पर पिसते सुख के अवसर अंध कुओं से कैसे फूटें पानी के स्वर लोक-लाज का ओढ़ कफन करते हम मातम ।
कदम-कदम पर अपनों ने ही जाल बिछाये अफवाहों के मौसम में घायल हैं साये चीख-चीखकर हाशिये भी हो गये बेदम ।

ऊँचा एक मचान

एक मधुर संवाद कर रहे धरती और किसान ।
नेह भरे हाथों ने जब माटी के चरण छुए कुछ सपने आँखों में उगकर सुर्ख पलाश हुए गदराये बादल ने बाँधा ऊँचा एक मचान ।

बैलों के घुंघरू खनकाते आशाओं के गीत धरती के सीने से लगकर बीज निभाते प्रीत मेड़ों पर बैठे पंछी भी जाते सुख-दुख जान ।
नयी-नवेली दुल्हन-सी जब धरती हरी हुई खुशियों के दाने खनके आँखें थी भरी हुई अँगड़ाई ले मचल गये जाने कितने अरमान।

रोज आता दिन

आस की गठरी उठाए रोज आता दिन।  
रात के उलझे सिरों को ढूँढता-सा
कुछ जटिल प्रश्नों के उत्तर बूझता-सा नींद को भी राग बैरागी सुनाता दिन ।
हो रही हैं जर्जरित
संवेदनाएँ मौन सदियों ने सहीं
कितनी व्यथाएँ
बीज खुशियों के दुखों में रोप जाता दिन ।
साजिशों की जब फसल उगने लगी हो उत्सवों की लाश भी बिछने लगी हो पत्थरों पर दूब-सा फिर लहलहाता दिन ।

घण्टा बजाओ

वक्त कब से कैद है कब तलक सोओगे तुम अब उठो, घण्टा बजाओ ।
झूठ की इस भीड़ में सच तिरोहित हो गया इस गहन चिंता तले दिन सिमट कर सो गया
सो रहे रक्षक सभी चोर अब मुस्तैद है जागकर इस नींद से अब उठो, घण्टा बजाओ ।
दंश की पीड़ा लिए उम्र पल-पल जागती एक नीली चोट भी मुँह छुपाये भागती
इस सुबकते वक्त में दर्द ही अब वैद है मत डरो इस वैद से अब उठो, घण्टा बजाओ ।