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Tuesday 21 Nov 2017

मुंह में देशभक्ति

 सुरजीत सिंह
36, रूप नगर प्रथम, हरियाणा
मैरिज लॉन के पीछे,
महेश नगर, जयपुर -302015
मो. 09680409246
वे सुबह-सुबह अचानक मिले, पहले पच्च से दीवार पर पीक थूकी, फिर धप से सीधा प्रश्न दागा, क्या आपके मुंह में देशभक्ति है?
मैं इस अप्रत्याशित अटैकनुमा प्रश्न से हड़बड़ा गया और इस हड़बड़ी में मुंह में तैयार किया टूथपेस्ट का झाग निकल गया।
उन्होंने बड़ी मुश्किल से स्वयं की हंसी जब्त की। जितनी की, उससे ज्यादा निकल ही गई। वे हो हो करते हुए बोले, भाई तुम तो ऐसे हड़बड़ा रहे हो, जैसे सुबह-सुबह किसी इंसान को नहीं, उस टाइप के गो रक्षक को देख लिया हो। मैंने महज इतना सा पूछा है, क्या आपके मुंह में देशभक्ति है।
भाई, देशभक्ति कोई दही है क्या, जो मैं मुंह में जमाकर रखूंगा। मैंने संभलते हुए कहा।
दही ही समझ लो, आजकल फायदा इसी में है, नहीं तो रायता फैलते देर नहीं लगती।
देशभक्ति तो दिल में होनी चाहिए। वह कोई जर्दा, पान, गुटखा, तम्बाकू नहीं कि मुंह में रखा और चबाकर थूक दिया।
नो नो नो, आप गलत कह रहे हैं, थूकना नहीं है, जुगाली करनी है। जिस प्रकार टूथपेस्ट में नमक, वैसे ही मुंह में देशभक्ति! क्या वह आपके मुंह में है?
मैं सच्चा देशभक्त हूं। मुंह में रखने की जरूरत नहीं मुझे। मैंने थोड़ी भुजाएं और सीना तानते हुए स्पष्ट कहा।
वे कुछ मांगने के अंदाज में हाथ बढ़ाते हुए बोले, लाइए प्रमाण दीजिए?
प्रमाण क्या होता है। सच्चा देशभक्त हूं। देश पर भरोसा है, संविधान में है। कानूनों का अक्षरश: पालन करता हूं। चुनी हुई सरकार को मानता हंू। नियम से लाइन में लगता हूं। ईमानदारी से टैक्स अदा करता हूं। रोड पर लेफ्ट साइड चलता हूं। निर्धारित गति से वाहन चलाता हूं। लाइसेंस जेब में रखता हूं। रेड लाइट फॉलो करता हूं। शराब पीकर वाहन नहीं चलाता। सार्वजनिक स्थलों पर पीक नहीं थूकता। धूम्रपान नहीं करता। किसी को गाली नहीं देता। दूसरों के दुख से दुखी होता हूं। संवेदनशील इंसान हूं। हर संभव मदद करता हूं। मां-बहनों की इज्जत करता हूं। पत्नीव्रता हूं। गलत का विरोध करता हूं। अपने चरित्र का खयाल रखता हूं। नैतिकता मेरा आभूषण है। ईमानदार पक्का हंू। मां-बाप श्रद्धेय हैं। गुरू पूज्य। अपना देशप्रेम दिल में रखता हूं। दिन-रात इसका राग नहीं गाता। बताइए और क्या प्रमाण चाहते हैं !
वे हंसने लगे, फिर तो आपको देशभक्ति की लेटेस्ट परिभाषा की जानकारी नहीं है। दिल वाली देशभक्ति कायरों की देशभक्ति है। सच्चे देशभक्त दिल-विल के चक्कर में नहीं पड़ते, इसे सीधा मुंह में रखा करते हैं और निरन्तर जुगाली कर इसकी गंध से दूसरों की देशभक्ति की गंध को सूंघते रहते हैं। मौका लगे, भरपूर कमतरी का अहसास कराते रहते हैं कि वे किस कदर धांसू, जबर देशभक्त हैं। उनका अंग-अंग देशभक्ति से ओत-प्रोत होता है।
यह किस टाइप की देशभक्ति हुई?
देशभक्ति के देशभक्ति होने की इकलौती विशेषता यही है कि इसे अब प्रदर्शित होना पड़ता है। जब तक वह आपके मुंह से प्रदर्शित नहीं हो और हाथ-पैरों से अभिव्यक्त न हो और सामने वाले में दहशत न फैल जाए, तब तक आपकी देशभक्ति संदिग्ध है। आप घोर देशद्रोही डिक्लेयर किए जा सकते हैं। इसके लिए किसी अदालत में मुकदमा चलाने की जरूरत भी नहीं समझी जाती।
मैं सिहर उठा, लेकिन मुंह से कैसे तय होगा कि बंदा सच्चा देशभक्त है ! मतलब इसके कोई अवयव भी तो होने चाहिए?
अवयव हैं ना, डंडे, झंडे, नारे, भीड़, गाली, मारपीट, सर्टिफिकेट, सत्यापन इत्यादि। फिर अब शुचिता, नैतिकता, ईमानदारी, चरित्र, देशप्रेम, देशसेवा, समाजसेवा, जज्बे जैसी चीजों की जरूरत कहां, मात्र एक लक्षण के आधार पर ऑन द स्पॉट किसी की भी देशभक्ति सर्टिफाइड की जा सकती है। चिंतन से ज्यादा, चांटे से ठीक प्रकार से समझाई जा सकती है।
इससे कहां देशभक्ति प्रमाणित होती है? यह तो कोई गुण्डा भी आजमा सकता है।
तो वो भी ऊंचे दर्जे का देशभक्त माना जाएगा। जैसे गांधी जी की तस्वीर के पीछे रिश्वत लेने-देने, छुपाने में कोई हर्ज नहीं, वैसे ही ऊंचा झण्डा टांगने, देशभक्ति नारे लगाने, लाठी लहराने से आपकी बाकी करतूतें क्षम्य हो सकती हैं। और सुनो, जिस देशभक्ति से मां-बहनें तक सिहर उठें, समझ लो देशभक्ति चौबीस कैरेट है। इसे शक फ्री देशभक्ति कहा जा सकता है।
लेकिन देशभक्ति में संस्कार-वंस्कार भी तो कोई चीज होती है कि नहीं?
होती होगी, लेकिन हमें तो कभी लगा नहीं कि किसी को गाली देने का मन हुआ हो और संस्कार बीच में कूद-फांद लिए हों। आजकल संस्कारों की यही खासियत है कि वे गालियों के बीच कभी आड़े नहीं आते। प_े गाली को आता देखकर दाएं-बाएं कूद जाते हैं और रास्ता क्लियर हो जाता है। वैसे भी मोहब्बत, जंग और देशभक्ति में सब कुछ जायज सा मान लिया गया है। यदि देशभक्ति मुंह में ही रहेगी, तो उसे कैसे सेफ मानें, इतनी कोमल चीज दांतों से ही लहूलुहान हो सकती है?
लहूलुहान देशभक्ति अच्छी किस्म की मानी जाती है। देशभक्ति जब तक हिरनी सी दुबकी, मिमियाती, याचना सी करती न महसूस हो, तब तक क्या खाक देशभक्ति हुई।
वे देशभक्ति की नई परिभाषा समझाकर इत्मीनान से मुंह चलाते हुए चले गए। मैं खड़ा नई परिभाषा के आधार पर अपने भीतर देशभक्ति को टटोलता रहा, टूथपेस्ट के झाग बनाता रहा!