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Tuesday 21 Nov 2017

अपना कमरा

 

राजी सेठ
एम-16, साकेत
नई दिल्ली-110017

अपना कमरा! वाह क्या खूबसूरत ख्याल है। दुनिया ज्यों-ज्यों बड़ी यानि ग्लोबल होती जायेगी तो अपनी छोटी होती हैसियत क्यों नहीं अखरेगी। अपना ठिकाना, अपनी पहचान, अपनी अस्मिता, अपना स्पेस, अपनी निजता के सवाल कौचेंगे ही। जी नहीं, यह मत सोचिये यह दोनों अलग अलग असंबद्ध चीजे हैं। इन दोनों में खूब-खूब गहरा रिश्ता है प्रगति की सीढ़ी दर सीढ़ी चढक़र आया। ये एक ही रस्सी के दो छोर हैं। बीच की लंबाई जरा ज्यादा दिखाई देती है पर है नहीं। दिखाई देता इंसान छोटा है तो क्या हुआ यह दुनिया भी तो छोटे से एटम से बनी कही जाती है।
बड़ी बातों में क्यों जाएँ। बात लेखक के अपने कमरे की हो रही है; लेखक जिसके दिमाग में हर पल उत्पाती हवा घुमड़ती है। इस घुमडऩ को कमरा चाहिए। अपना कमरा। क्या कल्पना है सवाल पूछने वालों की जैसे कि लेखन और कमरा चूड़ी पर चूड़ी बिठाकर रचनारत हो जाने की कोई करामात हो। एक वाकया याद आता है। अरसा पहले एक छोटी सी कहानी (?) लिखी थी। शीर्षक था ‘लेखकगृह में लेखक’(बाद में यह पेंगुइन द्वारा छपे संग्रह में ‘कमबख्त’ नाम से छपी थी)। समाप्त करने के बाद पढ़ी तो लगा यहाँ तो मैं अपना ही मजाक उड़ा रही हूँ। यानि कि......
कहानी में पहाड़ है। लेखकगृह नाम का एकांत कमरा है। घर से अवकाश की भीख मांगकर आई हूँ। आसपास खामोशी, बल्कि सन्नाटा है। पेड़ पौधे, घाटियाँ, ढलानें चतुर्दिक। यानि कि दृश्य-परिदृश्य पूरा और अनुकूल, पर लेखन गोल-अंडा। हाथ पर हाथ रखे बैठी रहती हूँ घंटों, उस जुनून का इंतजार करते जो लिखवाता है। भूत की तरह सर पर सवार हो जाता है तब किसे होश है अभिमंत्रित माने गए कमरे में बैठे होने का। तब याद करती हूँ ‘आमने-सामने’ कहानी किस तरह भीड़ भरे प्लेटफार्म की बेंच पर बैठे लिखी गई थी। ‘एक बड़ी घटना’ बस में बैठे, हाथ में पकड़े अखबार के हाशिए पर। ‘गलत होता पंचतंत्र’ घर बुलाए मेहमानों का इंतजार करते, ‘स्त्री’ कहानी रसोई के प्लेटफार्म पर कागज बिखराए। ऐसे ही कई और ऐड़े-बेड़े मौके। यह मत समझिए कि ये कहानियां नोक-पलक समेत पूरी रचनाएँ थीं। यह आत्मा थी। देह की रचना करनी थी। अभी भी ऐसे ही कितने अधूरे ड्राफ्ट अलमारियों में पटे पड़े है जिनका दिमाग में चलती आंधी में इसी तरह बीजारोपण हुआ था, जो अभी तक अपना कमरा मिलने पर भी, अपनी देह मांगने को तरस रहे हैं।
बचपन याद आता है। मेरे जीवन में सिलसिलेवार लेखन प्रकाशन तो देर से -जीवन के उत्तरार्ध में- शुरू हुआ, पर किताबें चाटने, कविताएं, छोटी छोटी कहानियां रचने, डायरी लिखने, उद्धरण जमा करने की धुन तो एक तरह से पैदायशी ही थी। कहीं कोई कोना मिला नहीं कि दूसरों की आंखों से गायब होकर बैठ गए। ढूँढाई हो रही है, डांट फटकार पड़ रही है, आवाजें तेजतर होती जा रही हैं, कोई असर नहीं। लिखी जाती इबारतों के बीच में छूट जाने का डर....  जान बूझकर ओढ़ी हुई अक्षम्य ढिठाई। डांट फटकार जब असह्य होने लगती तो अधबीच उठना ही पड़ता। क्रम टूट गया लगता। तब एक तरकीब खोज निकाली थी। यह तरकीब अपने सबसे नजदीकी रिश्तेदार जैसी लगी थी। पढ़ी जाती किताब या लिखे जाते पन्नों को जहाँ का तहाँ, वैसे का वैसा खुला, पसरा हुआ छोड़ दो, बंद मत करो, समेटो संभालो मत, पास रखा कोई ढेला, पत्थर, ज्योमेट्री बाक्स या अन्य कोई आलतू-फालतू चीज उसपर रख दो ताकि वापिस आकर दीदार करने पर वह निरंतरता जैसी लगे। डांट फटकार का असर फीका पडऩे लगे। ऐसा लगे कि हम तो सदा से यहीं बैठे थे, वैसे ही लैस होकर, आगे चलने की तैयारी में। इन तरकीबों ने खूब काम दिया-लिया, अपना कमरा जैसी चीज़ कभी याद ही नहीं आई। गायबी कोने, सीढिय़ों के नीचे के अंधियारे, सबके सो चुकने के बाद सुनसान मिलती दोपहरियां, छत के बनेरे, अंगड़े-खंगड़े फैंके जाने वाले कोने ढूंढे जाते रहे। वैसे भी सगे-सम्बन्धियों, भाई-बहनों से भरे संयुक्त परिवार में कमरों की छांट-बांट का सवाल कहाँ उठता था। स्कूली बच्चों की हैसियत अपनी अपनी खाट भर होती थी। वहीं सारा पसारा। जाड़ों के दिनों में हर कोई रजाई में गुड़ी-मुड़ी कापियां किताबें फैलाकर बैठता। गर्मी के दिनों में कभी हाथ का पंखा झलते, कभी टेबलफैन की हवा खाते, काम आगे बढ़ता। दृश्य कुछ ऐसा होता - एक ही कमरे में, अपनी अपनी खाटों पर गुड़ी-मुड़ी बैठी कई गठरियां।
याद आ रहा है एक बार क्लास-टीचर ने (शायद आठवें या नवें में थी) ‘अपनी पसंद का कमरा’ नुमा एक लेख लिखने को दिया था तो किस बेशर्मी से सर पर ताज पहन लिया था। लिखा था- खुली छत हो, कई कोनों वाला, कांच की दीवारों से बना एक कमरा हो। बरसात पड़ रही हो। पानी की लकीरें कांच पर फिसल रही हों। मैं कमरे के बीचोंबीच आराम कुर्सी पर बैठी कोई किताब पढ़ रही होऊं... व्यवधान के बिना। आज सोच रही हूँ शायद वह मेरा अचेतन था, इस बीच लंबे गुजर चुके समय में अपनी कल्पना के विश्रामस्थलों की पड़ताल करता।
तब तक वह एक रूमानी विचार था। कल्पना का विलास, जिसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं। यथार्थ तो वही था- खाटों पर गठरियाँ बनकर बैठना। स्कूल का काम निपटाना; फिर चंद्रकांता संतति और भूतनाथ जैसी वर्जित किताबों को पाठ्यक्रम की पुस्तकों में छिपाछिपाकर पढऩा।
अपना कहने जैसा कमरा पहली बार मिला, जब मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में स्नातक कोर्स के लिए होस्टल में रहने गई। शाहजहांपुर, जहां मेरे पिता देश-विभाजन के बाद आकर बसे थे, ऐसी सुविधा से विहीन था, अत: लखनऊ जाना पड़ा। वहाँ भी ‘अपना कमरा’ जैसा होने की अलग से कोई अनुभूति नहीं थी। एक कमरा अर्थात एक आवास, एक जरुरत, एक अनिवार्यता। एक कमरे में दो-दो छात्र। अलग-अलग आदतें, अलग-अलग विषय, अलग-अलग कार्यपद्धति, अलग-अलग पढऩे का समय। मैं देर रात तक पढ़ती थी, उसे तडक़े उठकर पडऩे की आदत थी। नींद दोनों तरह से बाधित होती थी। हॉस्टल की वार्डेन रात के 12 बजे कमरों से जुड़े गलियारों में चक्कर लगाया करती। 12 बजे बत्ती गुल कर देने के आदेश का पालन की पड़ताल करने। मैं मन ही मन उनकी गश्त पूरी हो जाने का इन्तजार करती। उनकी पदचाप परे चले जाने पर टेबललैंप पर कपड़ा डालकर रौशनी मद्धम करके फिर से पढऩे बैठती। ढाई-तीन बजे सोने से पहले अपनी साथिन को सचेत करती, पढऩे बैठने के लिए जगाती।
तब भी कमरे के ‘अपना’ होने का कोई अहसास नहीं था। अपना शब्द ‘अपना’ नहीं था। सोचने बैठूं तो लगता है निजता, व्यक्तिमत्ता, अस्मिता की जोरदार मांग, आधुनिकता की बढ़त की देन है। धीरे धीरे मनुष्य इतना शक्तिशाली होता गया है कि प्रकृति और ब्रह्माण्ड तक पर विजय पाने की सोचने लगा है। तिसपर ग्लोबल संस्कृति का विस्तार। मिटती सरहदें। पूरमपूर विमर्शों में तब्दील होती हाशिए की समस्याएं...। वर्जीनिया वुल्फ मेरी पसंदीदा लेखक हैं। उनकी पुस्तक ‘ए रूम ऑफ वन्स ओन’ कई बार पढ़ी है। सिमोन को भी पढ़ा है। वे तहरीरें मुझे मात्र सचेतता जगाने के ही दस्तावेज नहीं लगते, उन शब्दों के नीचे उतनी ही पीड़ा और वंचना सिसकती लगती है। यों सजगता जगाने के लिए वे अहसास जरुरी हैं। वंचना का बोध व्यक्ति (स्त्री) को अवरुद्ध करता है।
अंतत: अपना कमरा मिला। मियां की सरकारी नौकरी में देशभर, मुख्यत: तो गुजरात (सूरत, अहमदाबाद, बड़ोदा) में घूमते-घामते। रिटायरमेंट के बाद अंतिम पड़ाव दिल्ली चुना गया। बसना दिल्ली में तय हुआ तो वहाँ मकान भी बनना ही था। मकान के बनने में ‘अपना कमरा’ पा लेने की आशा मन में हिलोर लेने लगी। कल्पना सजीली होती गई। लेखन प्रकाशन तो अहमदाबाद रहते ही शुरू हो चुका था। श्रमशीलता बेशक अपनी रहने को थी पर कमरा जरुर मिला। बड़ी सी मेज कुर्सी, दराज, पुस्तकें, सजे रैक, टेबललैंप, दरी, फोन, कागजों के रिम, कलमदान, पेन, बालपेन, पेपरवेट  सब कुछ... इतना कुछ; पर इन सबके चलते क्या लेखन संभव हुआ? क्या छपी किताबों की संख्या बढ़ी? क्या छूटी हुई कहानियों के तार पकड़े गए? चेतना के अथाह जल में से कुछ हरियाए पत्ते स्वत: तैर कर आए?
दिल्ली जैसे जंगल की रिहायश का गुणगान करने बैठे तो रोजनामचा लिखते महीनों लग जायेंगे। ‘नगर-रसायन’ कहानी लिख लेने के बाद मन में कुछ शांति तो हुई पर कितने दिन। फिर वही बेढंगी चाल। गृहस्थी कही जाने वाली एक मात्र एक इकाई के अस्तर तक को टेरते, बेलिहाज दस्तक देते 120 काम। संयुक्त परिवार। आगतों के ढूह। एक का सामान चढ़ाओ, दूसरे का उतारो। हर किसी के, किसी न किसी काम की नाल दिल्ली में दबी है। दिल्ली जैसे नगर में अपना मकान अपना वाहन, अपने हित सेवादारों की जुगाड़ आप पर कितने कहर ढा सकती है उसे आंख फाड़ फाडक़र देखा। कविताएं कुछ लिखीं भी तो कैसी भू-चारी- कविता के बीचोंबीच अखबार वाला / फिर धोबी / फिर सब्जी का ठेला / फिर एक ट्रिन/ फिर एक टन्न / इसी तरह / बुनी जाती रही जीवन के बयान की धुन / बांचने बैठा जो,तल्लीन / जानेगा क्या / कितनी दूरियाँ दबोच कर / सतरों के बीच से / उगाया गया था / कोई एक वृक्ष।
स्थितियों की मार कि कमरा उपेक्षित होता गया। प्रार्थनाएं, सघन होती गईं- हे ईश्वर! लेखनशालाओं को कहीं भी ठौर देना, घरों में स्थापित न करना, जहाँ की छोटी से छोटी आहट भी मन में परिचित की प्रतिगूंज बन, आपके दिमाग के क्षेत्रफल को बेदर्दी से हथिया लेती है, आपको अकेला नहीं छोड़ती। लिखने लगने से, वैसे भी अपने से अपनी अपेक्षाओं और बाहर से आती मांगों के चलते, चिंताओं का भूत पहले ही आपके मन पर काबिज हो चुका होता है। उन दबावों-तनावों के बीच कभी उस कृपादानी कमरे का रुख करना भी पड़े तो घूरने लगती है - मेज पर खुली पड़ी, घूरती, धूल खाती, आधी-अधूरी तहरीरें, बिखरी किताबें, अनुत्तरित पत्र पत्रिकाएं, अखबार, ढेरों कूड़ा कबाड़, मन को ललकारती संतों की वाणी - अपने को खाली करो, व्यर्थता से न भरो। ज्ञान का पानी खाली अंजुरी में ही ठहर सकता है, टीलों पर नहीं टिकता। धक्का तब भी लगता है जब उद्वेलन के ऐन नोकीले क्षण आपके वहाँ जा पहुँचने पर घर का कोई स्कूली बच्चा या कामकाजी सदस्य, आपकी क्रिटिकल चीज़ें सरकाकर वहाँ पहले से विराजमान मिलता है। जैसे वह उसी का कमरा, उसी का सबकुछ।
तभी तो सालों साल लायब्रेरियों के चक्कर लगते रहे। कालोनी के पार्कों में खाली बेंचें ढूँढी गयी। पहाड़ों पर अतिथिगृहों लेखकगृहों की तलाश शुरू हुई। समय की नब्ज पकड़ रखने की चिंता में अड़ोसियों-पड़ोसियों, मददगारों से मुंह फेर व्यवहार चलता रहा। नींद बोझिल आँखों के बावजूद सबके सोने का इंतजार हावी रहा। अत: और कुछ तो हुआ न हुआ अपने कमरे से नाता टूटता गया। यहाँ-वहाँ खोजे हुए ठिकानों में मन अटका रहा, अंतत: जमता गया। अपेक्षाओं के ताले टूट जाने पर एकाग्रता निरंतरता भी संभव होने लगी। लेखन उसरने लगा। तब फिर चित्त में दूसरी इबारत लिखी जाने लगी कि यह खूबी कमरे की नहीं, अपरिचित जन-समूह के बीच एकांत एकाग्र, अनुभूति को पा लेने की है। आसपास के माहौल से बेगाना हो पाने की है। हर पल क्रुद्ध, क्षुब्ध मन की चंगुल से छूटकर चेतना के व्योम में दाखिल हो जाने की है। तब फिर कमरा... किसका कमरा?.... किसी का भी कमरा।
ऐसे में अपना कमरा न होने-पाने की जकडऩ से राहत जरूर हुई पर इन घुमंतु लेखनशालाओं में दिन का ढलना उतनी ही बड़ी उदासी का सबब बनता गया। दिन समाप्ति के साथ ही बोरिया बिस्तर समेटना पड़ता। फाइलें (चलता हुआ काम) बंद करनी पड़तीं - बचपन की आदतों का असर कि फाइलें बंद करते ही लगता कि निरंतरता, उपलब्ध एकाग्रता भंग होती जा रही है। अगले दिन अपने सभी आदि-इत्यादि के साथ इन इबारतों से नया रिश्ता बनाना पड़ेगा। कौन जाने सधे न सधे। कमरे में धुआं भर जाने से जैसी घुटन होती है, कुछ-कुछ वैसा भय, वैसी अरक्षा, जिसके चलते वैसी बचाव भरी आत्मरक्षा। खंडित भीतरी एकाग्रता। इन्हीं एहसासों में डूबते-उतरते कई रचनाएँ लिखी गईं पर मुझे लगा नहीं कि लिखी गईं। किताबें छपीं पर मुझे लगा कि अभी तो अस्तित्व से मात्र छिलके भर उतारे गए हैं अंतस्तत्व तो वैसे का वैसा है। वहाँ तक पहुंचना अभी बाकी है। निजी में वृहत्त का दर्शन बाकी है। यह अनुभूति अभी तक मेरे साथ-साथ चलती है। पीड़ा देती है। साहित्यिक जगत में स्वीकृति पा लेने का सुख भीतर नहीं व्याप्ता।
अनुमान नहीं था इस कमरा-कांड (व्यथा-कथा) का एक अध्याय अभी बाकी है। शायद अज्ञात को भेजी जाती प्रार्थनाएं सुनी गई हैं। शिमला में स्थित, ‘भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान’ में दो साल की आवासीय फेलोशिप। अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहे नगर शिमला की सबसे ऊंची चोटी पर सज्जित ‘वाईसरीगल लॉज’ जिसे हमारे सम्मानित शिक्षाविद् राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णनन ने, स्वयं न रहकर शैक्षिक समुदाय को सौंप दिया था। स्वर्गीय वातावरण सहित उन्हें एक अनुपम भेंट।
कल्पना में तो था कि लखनऊ विश्वविद्यालय के हॉस्टल जैसा कोई एक कमरा मिलेगा पर जो मिला वह तो अकल्पित था; ऐसे जैसे अंधे को दो आँखें। पढऩे-लिखने के लिये बहुत बड़ा फर्निश्ड खुशनुमा कमरा और रहने के लिए दृश्य-दानी परिवेश में स्थित एक कॉटेज। दो कमरों, बैठक, रसोई, दालान, बाथरूम सहित एक पूरमपूर कॉटेज; पूरे फर्निचर और सेवादारों सहित, सबकुछ।
संकट तो अब था। काटेज पा लेने का अर्थ था नोन-तेल, दूध-दही, दाल-दलिए में फिर से साने जाने को विवश हाथ। गृह-पोषक व्यवस्था की सुविधाओं-विलक्षताओं के अम्बार। पहाड़ों पर मिली ऐसी बेमोल कॉटेज की सूचना भर से आने-विराजने, भाग्य आजमाने को लालायित बैठे आगतों की चापलूसी सनी धमकियाँ। घबरा कर मैंने कॉटेज छोड़ दी। प्रशासन के हवाले कर दी। मुझे नहीं चाहिए था साम्राज्य। रहने-खाने के लिए मैंने अध्ययन-कक्ष के निकटतर एक कमरा चुन लिया। सांझी रसोई (कॉमन मेस) के पके-पकाए भोजन में शिरकत। जो भी दिया-बनाया जाता हो उसका बेहिचक स्वीकार। वही मेरी पूर्ति वही मेरी परितृप्ति।
अध्ययन-कक्ष का मामला थोडा टेढ़ा था। प्रशासन के विधि-विधान के चलते इतने विशाल, हर दृष्टि से लैस, सुविधा-संपन्न, फर्निश्ड, सुसज्जित कमरे को दो अध्येताओं के बीच बांटे जाना था, पर मिली-मिलाई कॉटेज का अपनी इच्छा से परित्याग कर देने के कारण मुझे अपना अकेला कमरा मिला। दे दिया गया पूरी तरह अपना, अबांट। दीवारों के पुरानेपन के बावजूद उस स्वर्गीय माहौल के बीच बिलकुल अपना, निजी एकांत।
कहूँ कि वे दिन मेरे लिए अमोल, अनिर्वच, अनुपम, असाधारण थे-जीवन की भटकन के रेगिस्तान में एक मरुद्यान (ओएसिस) की तरह, तो अतिकथन नहीं होगा। पहली बार जाना अपना कमरा- लेखक का कमरा, उर्वर माहौल क्या होता है। पहली बार जाना कि मन के अतल में, सालों से गुमसुम बैठे पत्थर भी पत्तों की तरह सतह पर तैर आने को उतावले हो सकते हैं। पहली बार जाना कि कैसे एक जलजला सा आता है और आसन्न वर्तमान की मिट्टी को उलीचकर नीचे की नमी को उपरली परत पर बिछा जाता है। वह एक दिव्य अनुभूति थी। घोर एकांत में अनेकांत की विह्वलता से भरी- उन्मुख, उत्फल्ल, निर्द्वंद्व। सारी चीकट धोती हुई। लगा था अपने से टूटा हुआ रिश्ता लौट आया है।
नहीं जानती थी कि एकाएक इतना पा जाना भी एक डगमगा देने वाला अनुभव होता है. मन के दरिद्रता भरे स्पेस में उस अतुल्नियता को न समेट सकने की पीड़ा से भरा। अपने जीवन-यापन की अभ्यस्त रफ्तार के विपरीत। जर्मन कवि रिल्के के पत्रों के अनुवाद में पहले से लगी थी अत: प्रथमत: उसे ही करने में लगी। शायद वह अपने अब तक के ध्वस्त हो चुके आत्मविश्वास को एक दस्तक जैसी भी थी। अथाह के तट की रेती पर झिझकते खड़े अपने तत्सत् का जायजा लेने जैसी। वैसे भी जानने लगी थी कि उस जैसे जटिल कवि में डूबकर भी निकल पाने की चुनौती वाला काम, दुश्मन दिल्ली में नहीं हो सकता था। अपने प्रस्तावित प्रोजेक्ट - ‘नदी उद्गम’ शीर्षक के अपने उपन्यास का पुनर्लेखन स्थगित होता रहा। उस माहौल में जोर-जबरदस्ती नहीं चल सकती थी। प्रकृति के ऐसे विपुल वैभव में कोई भी प्रस्ताव पंक्ति में नहीं लग सकता था।
अत: जो लिखा गया स्वत: ही लिखा गया। जाने कब-कब के भूले-भुलाए प्रसंग तैर-तैर कर आते रास्ता रोकते रहे। मुझे हर बार, बार-बार लपकती आती प्राणवान आबोहवा के हवाले हो जाना पड़ा। वहाँ भी सामने बिछी दृश्यमानता से निस्संग रहकर (बाद में जाना) जाने क्या-क्या लिखा गया। कितनी कविताएं, कितने आलेख, कितनी नया मुखड़ा पाती कहानियां, कितना अनाम अरूप बहुत सा कुछ।  कुर्सी मेज पर बैठने का अनुशासन तोडक़र कमरे की धूप में पैर फैलाये, सोफे पर बैठे जो कुछ भी लिखे जाने को उकसाता रहा वही लिखा गया। वह प्राणवायु थी, माहौल था, कमरा नहीं था। अपना कमरा तो घर में ही छूट गया था। वहाँ हर कहीं अपेक्षित कमरे की अनुभूति थी। पेड़ के नीचे, गलियारों में, ऊँचायिओं निचायिओं पर, खाते टहलते, अनुभूति से खिलवाड़ करते। मन ही मन रचते मिटाते, अधूरा छूट जाने या खो जाने के डर से मुक्त। समय की अदृश्यता पर भी धमाधम पैर रखकर दौड़ती आती सृजनात्मकता ने खुद-बखुद जो रास्ते पकड़े वही पकड़े निजी चारदीवारी की उपलब्धता के बावजूद।
फिर किसी एक दिन तो लौटना ही था। लौटने का अर्थ था -उसी बदहवास कर देने वाले शहर और उन्हीं-उन्हीं स्थितियों के बीच प्रश्नों का घटाटोप लिए आन लगना।  परिवेश की तुलना का बाँट हाथ में लिए हर पल अपने को कोंचना, क्या सृजन किसी चारदीवारी का मोहताज है? क्या लेखन तल्लीनता के व्योम में प्रविष्ट हो पाने की सरगम है? क्या यह भीड़ में अपने को अकेला कर पाने का कौशल है? क्या लेखन वातावरण से एकान्विति है या निजी सम्वेदंप्रवणता? क्या लेखन बाहरी सुविधा है या भीतरी आवेग? क्या लेखन चेतना की वह जाग्रत अवस्था है जो अपने से भी परे जा सकने का दमखम रखती है? क्या वह आत्मविस्मृति है या स्मृति की आसंग उत्कटता? क्या वह अन्य के संसार में तैर जाने की धुर संलग्नता है या एकांत का विलगाव? क्या यह संसार के यथार्थ से पूरमपूर लगाव है या कल्पशक्ति का उपहार? क्या यह अभिमंत्रित होना है या मुक्त होना? कौन सा संयोग कौन सी दिशा इस कर्म में कारगर होती है मैं अलग से नहीं जानती। शायद उस आदीप्त पल की अनुकूलता को अपनी अनुकूलता की तरह बरत लेती हूँ।
मैं कभी, नियमित रूप से, अनुशासित ढंग से बैठकर लिख नहीं पाती, इसीलिए इस रहस्य के मर्म को, उस अभिमंत्रित घड़ी के आगमन को नहीं जान पाती जो हमसे लिखवाता है। इतना जानती हूँ कि यह किसी ठोस इरादे या संकल्प का दबाव नहीं, भीतर मंडराने लगती कोई एक गूँज है। एक चित्रात्मक, दृश्यात्मक चौखटे का चेतना के वितान में एकाएक पूरे का पूरा छप जाना है। यह पूरी भौतिकता, दैहिकता, जागतिकता के बीच खड़े-खड़े एकाएक सघन एकांत महसूस होने लगने का कोई अन्यतम क्षण है जो अनजाने, अनायास अपना माहौल, अपनी आबोहवा,अपनी प्राणवत्ता स्वयं साथ लेकर आता है और हमें अयाचित ही अपने कोमल-कठोर आगोश में ले लेता है।
उस घड़ी को मैं पहचानती हूँ, पर वहाँ पहुँचने के तर्क को नहीं जानती; वैसे ही जैसे संसार की अन्य अनेक चीजों को नहीं जानती। वे सब लोग भाग्यशाली होंगे जो सब चीजों का उत्तर साफ-साफ पा लेते हैं। मैं शायद डरती भी हूँ कि सृजन के मर्म को खोलना चाहना कहीं ऐसा तो नहीं जैसे रुई भरे नख-शिख वाले सुन्दर खिलौने की असलियत जानने के लिए हम उसे बेदर्दी से खोल-उधेड़ कर पूरेपन का रेशा रेशा बिखरा लेते हैं जो अंतत: हमारे किसी काम का नहीं होता।