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Saturday 18 Nov 2017

पराई रोटी ( अलेक्सांदर इवानोविच कुपरिन ) (1896)

 

 अनुवाद- तरुशिखा सुरजन
704, हाईलैंड अपार्टमेंट्स
वसुंधरा एनक्लेव, नई दिल्ली-1
मो. 9868064895
जूरी के सदस्यों के चेहरों पर ध्यानपूर्वक बात सुनने के भाव आ गए, बाकी जज अपने सामने रखे कागज पर की जा रही ड्राइंग में और गंभीरता से लग गए, दर्शक शांत हो गए, अभियुक्त ने अपनी बात कहनी प्रारम्भ की- जब पिछले वर्ष के प्रारम्भ में मैं इस शहर में आया था तब मैंने भविष्य के बारे में कोई योजना नहीं बनाई थी। मुझे लगता है कि मैं असफल ही पैदा हुआ था। मुझे कभी भी, कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, और चालीस वर्ष की उम्र में भी मैं वैसा ही असहाय एवं अव्यावहारिक हूं जैसा जवानी के दिनों में था।

प्रतिवादी, आखिर में कानून आपको अपना पक्ष रखने का मौका देता है, थकान से आंखों को मूंदते हुए जज ने बेभाव कहा - आपको अपने बचाव में अथवा अपना पक्ष समझाने के किये कुछ कहना है?
अभियुक्त थोड़ा काँपा और अपनी पतली-लम्बी उँगलियों से उसने कटघरे की रेलिंग थामी। वह एक बदसूरत, दुबला व्यक्ति था, जिसके हाव-भाव भय व्यक्त कर रहे थे और उसकी आंखों में डर छुपा हुआ था। उसके थोड़े बहुत बचे और उलझे, सिर और दाढ़ी पर सफेद बाल, पूरी तरह सफेद भवें, उसके दयनीय चेहरे को बीमार बना रहे थे, मानो एनिमिक हो..... उस पर इस बात का आरोप था कि उसने अपने एक दूर के रिश्तेदार काउंट वेन्टसेपालस्की के घर पर रहते हुए 23 जनवरी की रात और 24 जनवरी के बीच आगजनी की थी और यह कदम पूर्वनियोजित योजना के तहत उठाया था। चिकित्सकीय परीक्षण ने उसे शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ पाया था। उनके अनुसार उसके नर्वस सिस्टम, शीघ्र आंसू बहाने की प्रवृत्ति तथा एकाग्रता में कमी में थोड़ी संवेदनशीलता बढ़ी थी, परन्तु इससे ज्यादा कुछ नहीं।
अभी तक अभियुक्त अदालत की कार्रवाई से बेभाव था, अपने केस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था। अदालत का गंभीर माहौल, अदालती कार्रवाई का उत्तेजित अंदाज, जजों के कसे हुए यूनिफार्म, जज की टेबल पर बिछा लाल-सुनहरा लेसदार कपड़ा, अदालत का विशाल दुमंजिला कक्ष, दीवारों पर लटके भव्य पोर्टे्रट, बैरियर के दूसरी ओर लोगों की भीड़, ढीठ कारिंदे, सम्मानजनक जूरी, सरकारी वकील की बेपरवाही, बचाव पक्ष के लचर तर्क - सब कुछ उसे भौंचक कर रहे थे। उसे लग रहा था कि वह किसी दैत्याकार मशीन के जबड़ों में फंस गया है, जिसको एक पल के लिए भी रोकना किसी आदमी के बस की बात नहीं है।
बहस के दौरान उसे कई बार महसूस हुआ कि उठे और चीखे - माननीय वकील साहब आप बिलकुल भी सच नहीं कह रहे हैं. बात इससे उलट है। आप चुप रहिये और मुझे अपने अपराध के बारे में खुद बताने दीजिये, - और अपनी विश्वसनीय आवाज में, स्पष्ट एवं भावपूर्ण शब्दों में अपनी भावनाएं, छोटी से छोटी भावना भी व्यक्त करे। परन्तु मशीन बिना रुके और बिना किसी भावना के बस चलते ही जा रही थी, उसे रोकना असंभव था।
ऐसे में जज के अंतिम शब्दों ने उसमें हताशा से पनपी ऊर्जा को जगा दिया, ऐसी ऊर्जा जो मनुष्य को अपने अंतिम वक्त में मिलती है - जब मनुष्य के गले में जल्लाद फांसी का फंदा डालता है और वह कभी-कभी उसी ऊर्जा से उससे छूटना चाहता है।
विनती करते हुए उसने कहा - जी, माननीय जज साहब!...भगवान के लिए, मुझे अपनी बात कहने दीजिये ....मुझे सब कुछ बताने की इजाजत दीजिये, सब कुछ!...
जूरी के सदस्यों के चेहरों पर ध्यानपूर्वक बात सुनने के भाव आ गए, बाकी जज अपने सामने रखे कागज पर की जा रही ड्राइंग में और गंभीरता से लग गए, दर्शक शांत हो गए, अभियुक्त ने अपनी बात कहनी प्रारम्भ की- जब पिछले वर्ष के प्रारम्भ में मैं इस शहर में आया था तब मैंने भविष्य के बारे में कोई योजना नहीं बनाई थी। मुझे लगता है कि मैं असफल ही पैदा हुआ था। मुझे कभी भी, कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, और चालीस वर्ष की उम्र में भी मैं वैसा ही असहाय एवं अव्यावहारिक हूं जैसा जवानी के दिनों में था।
मैं काउंट वेन्टसेपोल्स्की के पास यह विनती करने गया था कि मुझे रहने के लिए कोई जगह दिला दें। मैं उनसे सहायता की उम्मीद इसलिए कर रहा था क्योंकि वे मेरी स्वर्गीय मां के दूर के रिश्तेदार हैं। काउंट दयालु व्यक्ति हैं और अनजानों पर भी कृपा करते हैं, कुछ समय तक जब वे मेरे लिए कुछ नहीं कर पाये तो उन्होंने कुछ इंतजाम होने तक मुझे अपने ही घर में रहने के लिए कहा।
मैं उनके पास चला आया। शुरू में तो वे मुझ पर थोड़ा बहुत ध्यान देते थे, परन्तु जब मेरा वहां रहना उन्हें असह्य हो गया तो उन्होंने मुझसे सारी झिझक छोड़ दी। मेरी उपस्थिति के वे इतने आदी हो गए थे कि मैं उन्हें कोई फर्नीचर जैसा लगने लगा था। तब मेरे लिए एक भयानक जीवन प्रारम्भ हो गया - कामचोर जीवन, जिसमें अपमान के कड़वे घूँट, नपुंसक क्रोध, चापलूसी भरे शब्द और मुस्कान शामिल थे।
जीवन के कड़वे अनुभव समझने के लिए उन्हें जीना जरूरी है। आत्मनिर्भर एवं स्वाभिमानी लोग व्यर्थ ही समझते हैं कि दूसरों पर निर्भर रहने से व्यक्ति की अपमान से कांपने और रोने की क्षमता कम हो जाती है। मैं अपने पूरे जीवन में अपनी निर्भरता के कारण सुने जा रहे एक-एक शब्द के प्रति इतना संवेदनशील कभी नहीं रहा। घाव से मेरी आत्मा सूज गयी थी, कोई दूसरी तुलना मैं नहीं दे पा रहा, और हर कहा जाने वाला शब्द उसे ऐसा लगता था जैसे किसी ने गरम लोहे को छू लिया हो। परन्तु जैसे जैसे समय बीतता गया, मुझमें इस अपमानजनक जीवन से बाहर निकलने की ताकत कम होती गयी। मैं हरदम से कमजोर, डरपोक एवं सुस्त रहा हूँ। काउंट की रोटियों पर पल रहे जीवन से मेरी बची-खुची आत्मनिर्भरता भी भ्रष्ट हो गयी, उसे जंग लग गया। कभी-कभी रात को लेटकर, दिन में अपने द्वारा सहन किये अपमानों को याद करते हुए मैं गुस्से से भर उठता था और खुद से कहता था - बस, कल और नहीं! मैं यहाँ से चला जाऊंगा, काउंट के मुंह पर कई कठोर और कड़वे सच बोलकर यहाँ से चला जाऊंगा। इस कायर जीवन से तो भूख, ठण्ड और पैबंद लगे कपड़े भले हैं।
लेकिन कल आ भी गया। मेरा संकल्प गायब हो गया। मेरे होठों पर पुन: दु:ख भरी और तनावपूर्ण मुस्कान आ गयी। पुन: खाने की मेज पर बैठने और किसी चीज को छूने की हिम्मत नहीं हुई और पुन: अपने आप को मैंने अजीब और हास्यास्पद पाया। जब मैंने काउंट को उनके द्वारा मुझे कहीं रहने की जगह दिलाने के वादे को याद दिलाया तो उन्होंने अपने राजसी तरीके से आपत्ति करते हुए कहा-
 - अरे भाई, आपको जल्दी क्या है? क्या आपको यहाँ अच्छा नहीं लगता? अभी यहीं रहिये, हम कुछ देखेंगे।
मैं चुप हो गया। जब काउंट ने मुझे अपने कुछ पुराने कपड़े दिए, तब भी मैंने मना करने की कोशिश भी नहीं की। कपड़े बढिय़ा थे, परन्तु मेरे लिए बहुत बड़े थे। काउंट के मेहमानों में से एक बार एक ने पूछ लिया कि क्या मैंने अपने चचेरे भाई के कपड़े पहने हुए हैं, एक दूसरे मेहमान, जो कि नीच और घटिया किस्म के थे,  ने इस बात पर जोर से ठहाका लगाते हुए मुझसे बेशर्मी से पूछा-
- फ्योदर, लगता है आप और काउंट एक ही दर्जी के पास कपड़े सिलवाते हो?
उनमें से कोई भी मेरा नाम सम्मान (पिता के नाम के साथ) से नहीं पुकारता था। काउंट मेरा अपने मेहमानों से कभी भी परिचय नहीं करवाते थे, जबकि उनमें से ज्यादातर काउंट के पैसों पर ही पल रहे थे, जैसे कि मैं, पर वे किसी तरह काउंट से एक बराबरी के स्तर पर व्यवहार करने में सक्षम थे, लगभग अपनेपन से, जबकि मैं हमेशा डरपोक और गुलाम ही बना रहा. वे सब मुझसे गहरी नफरत रखते थे, ऐसी नफरत जो उन लोगों के बीच होती है, जो कि मालिक की मेहरबानी के लिए प्रतिद्वंदी बन जाते है।
काउंट के नौकर मुझसे बड़े रूखे और अशिष्ट तरीके से पेश आते थे, जैसा कि इस पेशे के लोगों की खासियत होती है। मेज पर मैं पकवानों और शराब से घिरा होता था। उनके नौकरों वाले व्यवहार और बातों में मैं शिकायत महसूस कर पाता था, शिकायत जो कि नौकरों को किसी छोटे व्यक्ति की सेवा करने से होती है। मैं अपना बिस्तर खुद लगाता था और अपने कपड़े खुद धोता था।
शाम को कभी-कभी ताश का खेल होता था। जब काउंट को साथी नहीं मिलता था तो वे मुझे बैठा लेते थे। मेरे पास अपने पैसे कभी नहीं रहे, पर फिर भी मैं बैठ जाता था, यह सोचते हुए कि मैं जीतूंगा। मैं लालच से, गुणा-भाग करके, जोखिम उठाकर, यहाँ तक कि मन-ही-मन भगवान से अपनी जीत की प्रार्थना करते हुए खेलता था। परन्तु ऐसे हालात में अक्सर जैसा होता है, मैं हार जाता था - सब में सबसे ज्यादा हारता था।
जब खेल खत्म हो जाता था, और बाकी खिलाड़ी अपनी जीत के हिस्से की उम्मीद लगा कर बैठे रहते थे, मेरी आँखें झुक जाती थी, शर्म से लाल और उदास आँखें। जब और चुप रहना मुमकिन नहीं रह जाता था, मैं काउंट से सहज बनने की कोशिश करते हुए कहता था-
काउंट,..प्लीज ...अभी तो मेरे पास पैसे नहीं हैं, मेरी हार को अपने खाते  में रखिये...., मैं कल आपको पैसे दे दूंगा.....
इस वादे ने कभी भी धोखा नहीं दिया। सभी जानते थे कि मैं न कल, न परसों, न कभी भी पैसे लौटा पाऊंगा।
ऐसा हुआ कि काउंट और उनके साथी रेस्टोरेंट में खाना खाने जा रहे थे और वहां से औरतों के पास। मुझसे यूँ ही बेपरवाही से पूछ लिया गया और कुछ ऐसी टोन में जो कि मानो कह रही थी कि मत ही चलो। मैं जानता था कि नहीं बोलूंगा तो मुझे खुशी से छोड़ दिया जायेगा। पर भगवान कसम, पता नहीं मुझे क्या हो जाता था, कौन सी शक्ति मुझे खींचती थी कि मैं सबसे पहले आगे भागता था और जल्दी से अपना ओवरकोट पहन लेता था।
डिनर पर बहुत लोगों ने असभ्य और अजीब व्यवहार किया जिस पर मुझे जोर से और अक्सर हंसना चाहिए था, पर हंसी मुझे उतनी ही खुशी देती थी जितनी कि किसी प्रशिक्षित कुत्ते को मिलती है। यदि मैं कुछ कहना चाहता भी तो मुझे श्रोता नहीं मिलते। जब भी मैंने मुंह खोलना चाहा, मुझे रोक दिया गया। मुझसे सबने मुंह मोड़ा हुआ था, मैंने एक ही वाक्य को दस बार कहने की कोशिश की, अपनी नजरें एक से दूसरे की ओर ले जाता गया, परन्तु किसी की भी नजर मुझसे नहीं मिली।
रातें मेरे लिए सबसे ज्यादा कष्टप्रद थीं। मैं दरवाजे के पास एक संकरे कमरे में सोता था, जो कि कॉरिडोर की तरह ही था। मेरा पलंग एक पुराना सोफा था, जिसकी गद्दी फटी हुई थी, बीच में कूबड़ सा निकला हुआ था और स्प्रिंग दबाने से नीचे होती थी। सामने के दो पाये गायब थे और मेरा सूटकेस उन पायों के स्थान पर रखा हुआ था।
ओह, मुझे उस बिस्तर से कितनी नफरत थी! मुझे कभी किसी व्यक्ति पर भी इतना क्रोध नहीं आया था, जितना इस कबाड़ पर, जिसे कोई कबाड़ी भी खरीदने से इंकार कर दे। जैसे-जैसे रात करीब आती थी, मुझे उतना ही ज्यादा लम्बी नींदरहित असह्य रात का डर घेर लेता था, जो मेरा इंतजार कर रही थी। अंत में मैं लेट जाता था। सोफे के बीच में निकला हुआ कूबड़ मेरी पीठ में चुभ रहा था। उसे दबाने के प्रयत्न में स्प्रिंग बगल में चुभ रही थी, तकिया नीचे था और बार-बार फिसल रहा था। पांच मिनट बाद कमर और गर्दन में बहुत दर्द होने लग गया। मेरा दिमाग भडक़ने लग गया और विचार मेरे दिमाग में बवंडर मचाने लगे। मैं भविष्य के लिए शानदार और अवास्तविक योजनाएं बने लग गया; रात को मैं इन योजनाओं पर यकीन करता था, परन्तु सुबह होते ही वे योजनाएं मुझे डराती थी, मानो प्रलाप हों।
दिन के सभी अनुभव, मेरे और दूसरों के द्वारा कहा गया हर शब्द, हर अपमान, हर थप्पड़, हर दुव्र्यवहार मेरी स्मृति में फिर से आते गए. मैं उन्हें एक जलती खुशी, एक गहरी, भयानक निरंतरता से समझता रहा, जो कि किसी आहत व्यक्ति के दिमाग के बस की ही बात है, और इन अपमानजनक बातों को जीवित रखते हुए मैंने दिन भर में अपनी आत्मा में इतनी गंदगी बसा ली, ना  ....जिसके बारे में न तो अदालत में और न ही अपने बचाव में कुछ कहना उचित है।
काउंट के दोस्त मेरे कमरे के सामने से गुजरते हुए मेरे पलंग के हाल का मजाक उड़ाना पसंद करते थे, वे उसे प्रोक्रुस्ट्स*  पलंग कहा करते थे।
जिस रोज मैंने अपराध किया, उस रोज काउंट के एक परिचित श्रीमान ल्वोव् ने विरासत मिलने की खुशी में सभी को दावत पर बुलाया था. मैं भी तैयार होने लग गया. जब हम सीढिय़ों पर आये तो मैं श्रीमान ल्वोव् से टकरा गया और माफी मांगने लगा। उन्होंने जवाब दिया-
- कोई बात नहीं ...
और फिर तुरंत जोड़ा -
- फ्योदर आप बेकार ही जाने के लिए परेशान है, आपको किसी ने निमंत्रण नहीं दिया है।
 इन कठोर शब्दों से कुचला हुआ मैं पोर्च में रुक गया। मेहमान शोर मचाते हुए पोर्च में आये, उनमें से एक ने कहा-
- जाइये और अपने प्रोक्रुस्ट्स पलंग पर नजर दौड़ाइए।
दूसरे ने जोड़ा -
- अपने प्रोक्रुस्ट्स पलंग पर!
जोर से हँसते हुए वे बाहर निकल गए; मैं वापस आकर सोफे पर लेट गया। मुझे एक क्षीण आशा थी कि वे लोग अपने कठोर शब्दों पर शर्मिंदा होंगे और मुझे कोई लेने आएगा, परन्तु कोई नहीं आया...दो या तीन घंटे मैं नपुंसक क्रोध में खारे आंसू बहाता रहा। प्रोक्रुस्ट्स पलंग मुझे दर्द देता रहा। मैं उठ खड़ा हुआ। सोफे के प्रति नफरत से मेरा दिल उबल रहा था। मैंने कुछ गत्ते के डब्बे इक_े किये, उनपर पुराने अखबार रखे, मिट्टी का तेल छिडक़ा, सोफे के नीचे उन्हें रखकर आग लगा दी। इस दौरान मैं जैसे एक बेहोशी में था।
जब मुझे होश आया तो सारा कमरा जल रहा था. अपने किये पर मैं बहुत डर गया था और मदद के लिए पुकारने लगा. आगे आपको सब मालूम है जज साहब.....
* प्रोक्रुस्ट्स - ग्रीक मिथक के अनुसार प्रोक्रुस्ट्स एक बदमाश अथवा दस्यु था जो लोगों को एक लोहे के पलंग पर लिटाकर यातना देता था। जिनके लिए वह पलंग बड़ा होता था, उनके पैर वह तब तक खींचता था, जब तक कि पैर पलंग के सिरे तक न पहुँच जाये, तथा जिनके पैर पलंग से लम्बे होते थे, उनके पैर वह काट दिया करता था। ग्रीक मिथक के एक वीर थीसियस ने प्रोक्रुस्ट्स को उसी के पलंग पर उसी के तरीके से यातना देकर मौत दी। इस जगह प्रोक्रुस्ट्स पलंग का अर्थ यातना के पलंग से है।