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Tuesday 21 Nov 2017

और, दरवाजा खुल गया

हरदान हर्ष
ए-306, महेश नगर,
जयपुर-302015
मध्य रात एक बार नींद टूटी तो दुबारा ठीक से न आ सकी। सुबह उठा तो हल्का-हल्का सिर-दर्द था। आंखों में जलन, पूरे बदन में टूटन थी। सुबह की शिफ्ट में ड्रिलिंग रिंग पर काम। पूरे आठ घंटे की ड्यूटी, बाप रे! हर क्षण जान अधर में लटकी रहती है। क्षणभर के लिए भी ध्यान इधर-उधर हो जाए तो जीवन लीला समाप्त।
मैं मुश्किल से दोपहर तक काम कर पाया। पकती हुई धूप के साथ-साथ मेरा सिर दर्द भी बढ़ता गया। जब दर्द असह्य हो गया तो मैं शिफ्ट-इंचार्ज से अनुमति ले घर लौट आया।
घर क्या? ड्रिल-साईट से थोड़ी दूर किराए का एक कमरा था। उसके बराबर-बराबर दो कमरे जिनमें बाकायदा भरे-पूरे दो परिवार गुजर रहे थे। तीनों किराएदारों के लिए एक स्नानघर और एक गुसलखाना एक ओर बने थे। ये सब मकान मालिक के आलीशान मकान के पिछवाड़े में बने हुए थे।
मेरे कमरे की विशेषता यह थी कि वह अंदर की ओर खुलने के अलावा सडक़ की ओर भी खुलता था। और, मैं अक्सर सडक़ की ओर खुलने वाले दरवाजे का ही उपयोग करता था। चौक की ओर खुलने वाले दरवाजे और खिडक़ी को मैं अक्सर बंद ही रखता था।
इस मकान में आए आज मुझे आठ महीने हुए, मैंने पहले दिन खिडक़ी की सिटकनी एक बार ऊपर की थी, सो आज तक बंद है। बहरहाल खिडक़ी के पाटिये पर मैंने अपना आवश्यक सामान जमा रखा है। मसलन टूथपेस्ट, टूथब्रश, शेविंग किट, क्रीम, तेल, दर्पण, कंघा, बाम, डिटोल आदि।
मैं सडक़ की ओर से सीधा अपने कमरे में आकर दरवाजा बंद करके चुपचाप बिस्तर पर लेट गया। सोने की भरसक कोशिश के बावजूद नींद मुझसे कोसों दूर थी। सिर-दर्द बढ़ता ही जा रहा था। सोचा बाम की शीशी में थोड़ा बाम शेष है, उसे सिर पर मल लूं। मैं बिस्तर से उठा खिडक़ी तक आया। बाम की शीशी उठाई और उसे खोलने लगा कि मैंने सुना मकानमालकिन बीच वाले कमरे में रहने वाली स्त्री को कह रही थी- सुधा, लोगों के पास रहने को अपना न घर है न घाट। किराए पर जिंदगी बसर करते लोग। वे न दिन देखते, न रात। जब चाहे परेशान करते रहते हैं। अरे! जब औरत और बच्चों को भरपेट खिला नहीं सकते, रोग-शोक में उनकी दवा-दारू नहीं कर सकते तो गृहस्थी बसाने की क्या जरूरत है? इससे बेहतर तो पन्ना की तरह रंडक-भंडक रहना ही उचित है।
मकान मालकिन की बातें सुनकर लगा जैसे बम फटा है। ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे। पन्ना की तरह रंडक-भंडक। मकान मालकिन की बात से मेरा सिर चकराने लगा था। हाथ से बाम की शीशी नीचे गिर गई थी। लुढक़कर वह दरवाजे की ओर गई।
शीशी गिरने की आवाज से आगे की वार्ता को पूर्ण विराम लग गया था। मकान-मालकिन ने यह समझकर कि पन्ना यहीं है, अपने मकान के पिछवाड़े का दरवाजा खोलकर अंदर चली गई। अंतर-मन में उसका कथन अभी तक गूंज रहा था, ‘‘सुधा लोगों के पास रहने को न अपना घर है न घाट, किराए पर जिंदगी  बसर करते लोग। वे दिन देखते हैं, न रात। जब चाहे परेशान करते रहते हैं...इससे अच्छा तो पन्ना की तरह रंडक-भंडक रहना ही ठीक है।’’
स्वार्थ के महासागर में डूबी मकानमालकिन की सोच पर मुझे अचरज हुआ। और उसकी परिकल्पनाएं नितांत बौनी और क्षीण। उसने यह कैसे सोच लिया कि किराए के मकान में रहने वालों का कहीं घर-घाट नहीं होता। फिर इससे बड़ी परिकल्पना कि मैं रंडक-भंडक हूं। वह नहीं जानती गांव में मेरा घर है। भरा-पूरा संसार। जोरू है, बच्चे हैं, वह क्या समझे गृहस्थ में लोगों की अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। सभी के अपने-अपने सपने। सभी की अपनी-अपनी मंजिल, अपनी-अपनी दौड़।
मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा था। उफ् मकान-मालकिन इसे और बढ़ा गई। और सिर-दर्द से ज्यादा मुझे सीने में चुभन अनुभव हो रही थी। मैं आंख बंदकर दीवार के सहारे खड़ा हो गया। कुछ क्षण उपरांत भावनाओं का उबाल कम होने पर बाम की शीशी उठाई और धीरे-धीरे सिर पर बाम मलने लगा। शीशी को आलमारी में रखकर मैं पुन: बिस्तर पर लेट गया। मैं सोने का भरसक प्रयत्न कर रहा था। मगर, निष्फल। मकान-मालकिन की बातों से त्रस्त मैं उस रात के घटनाचक्र में खो गया। मध्य रात डेढ़ बजा होगा। तीसरा किरायेदार योगेश मकान मालिक के पिछवाड़े वाले दरवाजे पर खड़ा बुहत देर तक ठक-ठक करता रहा था। जब कोई परिणाम नहीं निकला तो उसने जोर-जोर से दरवाजे को भड़भड़ाया, तब मकानमालिक झल्लाकर उठा था। दरवाजा खोलते ही बिना कुछ जाने-सुने उसने योगेश को झिडक़ा था, ‘‘क्या है? शरीफ लोगों को रात में तंग करने का यह कौन-सा तरीका है?’’
योगेश रोते हुए उसके सामने गिड़गिड़ा रहा था, ‘‘विनोद भाई, मेरी पत्नी की तबियत अचानक खराब हो गई है। पूरा शरीर अकड़ गया है। आंखों की पुतलियां फिर-फिर जाती हैं। यदि जल्दी कुछ न किया गया तो वह मर जाएगी।’’ योगेश की आंखों से झरते आंसुओं और हृदय विदारक गिड़गिड़ाहट का विनोद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उस पत्थर दिल इंसान ने दो टूक शब्दों में कहा था, ‘‘मर जाएगी तो मैं क्या करूं?’’ योगेश फटी आंखों से उसकी ओर देख रहा था। उसे उससे ऐसे उत्तर की आशा कदापि नहीं थी। उसकी आंखों की मौन भाषा से शायद मकान मालिक हिल गया था, इसीलिए उसको कहना पड़ा, ‘‘क्या मैं डॉक्टर हूं?’’
योगेश को विनोद में आशा की किरण दिखाई दी थी। इसलिए उसने हिम्मत कर कहा था, ‘‘विनोद भाई, आप डॉक्टर नहीं। मगर इस समय डॉक्टर की फीस, दवा-दारू के लिए कुछ रुपए उधार देकर आप मेरी मदद कर देंगे तो मेरी पत्नी बच जाएगी।’’ योगेश ने विनोद में आशा की किरण गलत देख ली थी। उस पत्थरदिल इंसान ने कडक़ते लहजे के साथ कहा, ‘‘तो तुम ये समझते हो कि मेरे पास कुबेर का खजाना दबा पड़ा है। और, उसे तुम लोगों में खैरात के रूप में बांटता फिरूं।’’ विनोद के स्वर में, उसके हर शब्द में कटुता भरी थी। योगेश ने सुना तो उसका सिर चकराने लगा था और मकानमालिक ने धड़ाम से अपना दरवाजा बंद कर लिया था। अपने कमरे में दरवाजे के पास कान लगाए मैं भी खड़ा था। मैंने दरवाजा खोला। उसी समय किराएदार रामसिंह भी अपने कमरे से बाहर निकल आया था। उसने योगेश को सहारा देते हुए चौक के चबूतरे पर बिठाया। मैं मौन सब देख-सुन रहा था।
रामसिंह ने अपनी सभी जेबें टटोली। कुल मिलाकर अठारह रुपए आठ आने निकले। उन्हें अपनी मुट्ठी में दबाए वह कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था। वे दोनों मुझसे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। कारण कि पिछले छ: महीने में उन्होंने कभी मुझसे औपचारिक परिचय की भूमिका भी नहीं निभाई थी। मैं दोनों की बेबसी को समझ रहा था। मानवता के तकाजे को समझते हुए मैंने योगेश से कहा, ‘‘मैंने आपकी पूरी बात सुनी है। मेरे पास इस समय पांच सौ रुपए हैं। आप जल्दी से अपनी पत्नी को हॉस्पिटल ले जाइये।’’
रामसिंह रिक्शा लाने दौड़ गया था। योगेश कृतज्ञ आंखों से मेरी ओर देख रहा था। वह मेरे पीछे-पीछे आया। मैंने अपनी अटैची खोली और पांच सौ रुपए उनके हाथ में थमा दिए। रुपये पाकर योगेश आश्वस्त हुआ था। उसने मेरा हाथ दबाते हुए कहा, ‘‘भाई आपने समय पर मदद करके मुझ पर उपकार किया। मैं ता-जिन्दगी  आपका अहसान नहीं भुलूंगा।’’ और उसने हाथ जोड़ लिए थे।
मैं हल्के से मुस्करा दिया था। उसने जाते-जाते कहा, ‘‘भाई, माफ करना। हम लोग तो इतने स्वार्थी और शंकालु थे कि आपको यहां अकेला समझकर उपेक्षा भाव से ही देखते रहे।’’मैंने कहा, ‘‘योगेश देर न करो, जल्दी जाओ। ये सब तो हमारे समाज में स्वाभाविक है।’’
रिक्शा आ गया था। योगेश अपनी पत्नी को लेकर उसमें बैठ गया था। रामसिंह साइकिल पर सवार रिक्शे के पीछे-पीछे हो लिया था। मैं उन्हें तब तक देखता रहा जब तक कि वे मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गए। अपने कमरे में लौटकर मैं बिस्तर पर लेट गया था। कभी इधर करवट लेता तो कभी उधर। नींद नहीं आ रही थी। न चाहते हुए भी मकान मालिक के कठोर शब्द जहन में तैर रहे थे। फिर भी मुझे थोड़ी आत्मतुष्टि थी कि समय पर मैंने योगश की सहायता कर दी। सहायता? सहायता इतनी कि वह अस्पताल जाने का साहस जुटा सका। उसकी पत्नी? कैसे होगी वह? डॉक्टर मध्य-रात मिला भी होगा या नहीं? समय पर इलाज? अनेक अच्छे-बुरे विचार मेरे मन में उभर रहे थे। मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था। इससे अच्छा तो मैं भी उनके साथ अस्पताल चला जाता।
सोचने के क्रम में यह प्रश्न मेरे सामने आकर खड़ा हो गया कि मैं उनके साथ अस्पताल क्यों नहीं गया? ऐसी हालत में क्या मात्र पांच सौ रुपए उधार देने भर से एक पड़ोसी का सामाजिक उत्तरदायित्व पूरा हो जाता है? यदि यहां कल मुझे कुछ हो गया तो फिर कौन देखेगा? मैंने अपने दायित्व का पूर्ण निर्वाह नहीं किया था। यही सोचकर मैं बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। कपड़े पहने और अस्पताल की राह बढ़ गया।
समय रहते योगेश की पत्नी का इलाज हो जाने से वह बच गई थी। और, इस आपत्ति से उबरने के बाद मेरी आत्मीयता दोनों अन्य किराएदारों से बढ़ गई थी। मकान-मालिक को हमारा एक होना अखरता रहा था, पर बेचारा कर भी क्या सकता था?
बरसात के दिन थे। दो दिन से बराबर बारिश हो रही थी। कोई भी काम पर जाने की स्थिति में नहीं था। मेरे कमरे का सडक़ की ओर खुलने वाला दरवाजा दो दिन से बंद था। अंदर के चौक की ओर खुलने वाले दरवाजे को ओढ़ाल कर मैं लेटा हुआ था। अब मैं इस दरवाजे की सिटकनी नहीं लगाता था। बगल वाले दोनों किरायेदार जब-तब दरवाजे को धकेल कर आ-जा सकते थे। मैं, योगेश और रामसिंह दोनों को भाई कहने लगा था। उनकी पत्नियां मेरी भौजाइयां हो गई थी। सभी में अपनापन पनप गया था। रामसिंह की पत्नी ने मूंग की दाल की पकौडिय़ां बनाई थीं। एक प्लेट भरकर वह मेरे कमरे में हाजिर हुआ। मैंने कहा, ‘‘वाह! बरसात के मौसम में मूंग की दाल की पकौडिय़ों का मजा ही कुछ और होता है।’’
‘‘तुम्हारी भाभी ने मौसम का ध्यान रखकर ही तो मूंग की पकौडिय़ां बनाई हैं।’’ रामसिंह ने कहा। मैंने उठकर एक अखबार बिस्तर पर बिछाया। रामसिंह ने प्लेट अखबार पर रख दी थी और वह मेरे बाजू में बिस्तर पर बैठ गया था। उसने योगेश को आवाज लगाई। पहली आवाज पर ही वह आ धमका। कमरे में घुसते ही उसने कहा, ‘‘वाह! पकौड़ी’’, कहते हुए उसने एक पकौड़ी उठा ली। मैंने कहा, ‘‘इसके साथ हरी-मिर्च की चटनी या सॉस हो तो मजा आ जाये।’’ योगेश ने मुड़ते हुए कहा, ‘‘मेरे यहां हरी मिर्ची की चटनी रखी है। अभी लाता हूं।’’ तीनों जमे। चटखारे लेते हुए गर्म-गर्म पकोडिय़ां खाने लगे थे। तीनों दो प्लेट पकौडिय़ां चट कर गये थे। मैंने उठकर चाय बनाई। अच्छा-खासा नाश्ता हो गया था। समय कट क्या उड़ रहा था। हंसते-बतियाते कब दोपहर हो गई पता ही नहीं चला। दोपहर का खाना भी हम तीनों ने मिलकर खाया। पता नहीं, खाने में किस घर से क्या आया है? विनोद के घर के पिछवाड़े की खिडक़ी से उसकी छाया बार-बार नजर आ रही थी। छाया में उत्सुकता थी, उत्कंठा, भय या ईष्र्या- पता नहीं, पर उसकी छाया परिवेश में मलिनता रच रही थी।
अगला साल। गर्मी के दिन। विनोद किसी काम से बाहर गया था। मकान-मालकिन को शाम से ही उल्टी और दस्त हो रहे थे। रात को ग्यारह बजते-बजते उसकी हालत नाजुक हो गई थी। उसकी छोटी सी लडक़ी अपनी मां को बेहोश देखकर रोने लगी थी। उनका तीनों किराएदारों में से कोई विशेष लेना-देना नहीं था। बस उनका मतलब मात्र किराए वसूलने तक था। लडक़ी के रोने की आवाज सुनकर मेरे कान खड़े हो गए थे। मकान के पिछवाड़े के दरवाजे के पास मैंने कान लगाया। लडक़ी के रोने की आवाज के अतिरिक्त कोई हलचल सुनाई नहीं दे रही थी। हां, दुर्गन्ध का एक भपारा मेरे नथुनों को जला गया था। अत: मैंने योगेश को आवाज दी। वह तुरंत बाहर आया। मैंने दरवाजे पर दस्तक दी। दस्तक सुनकर लडक़ी घबरा गई और वह जोर-जोर से  रोने लगी। मैंने कहा- ‘‘पीछे रहने वाले किरायेदार अंकल।’’
‘‘किराएदार अंकल।’’ उसने कहा।
‘‘हां।’’
‘‘ठहरो, दरवाजा खोलने की कोशिश करती हूं।’’
योगेश ने चुटकी ली, ‘‘सीधे-सीधे अपना परिचय देता ना, किरायेदार अंकल।  बड़ा आया पन्ना अंकल।’’
मैं हल्के से मुस्करा दिया।
लडक़ी ने दरवाजे के पास स्टूल रखा और कैसे-जैसे उस पर चढक़र उसने सिटकनी हटाई। हमने देखा मकान-मालकिन बिस्तर पर अस्त-व्यस्त अवस्था में बेहोश पड़ी है। चारों ओर उल्टी और कै से कमरा भरा था। तीखी दुर्गन्ध से हमारे नथुने जले जा रहे थे।
मैंने पानी के जग से कुछ बूंद पानी लेकर मकान-मालकिन के चेहरे पर छिडक़ा। उसके शरीर में कुछ हलचल  हुई मगर होश न आया। मैंने योगेश की ओर देखा। आंखों ही आंखों में हम दोनों ने उसको अस्पताल ले जाने का फैसला किया।
घड़ी रात के साढ़े बारह बजा रही थी। लडक़ी को योगेश की पत्नी के पास छोडक़र हम सडक़ पर आ गए थे। सडक़ सन्नाटे का गीत गा रही थी। कहीं कोई वाहन दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने कहा- ‘‘योगेश भैया, जल्दी कुछ करना है। इस तरह समय जाया करने से तो कोई लाभ नहीं।’’
‘‘हां, लगता है इस समय यहां कोई रिक्शा, ऑटो वगैरह जल्दी से नहीं मिल सकेगा।’’
मैंने पूछा, ‘‘ऐसा क्यों?’’
‘‘अरे भाई! सिनेमा का आखिरी शो बारह बजे खत्म हुआ। और इस समय कोई गाड़ी का टाइम भी नहीं। अब पहली गाड़ी दो बजे आएगी। उस समय ही कोई रिक्शा या ऑटो नजर आएगा।’’
‘‘फिर क्या किया जाए?’’
‘‘भाई, पवन-पुत्र बनने के अलावा अपने पास चारा भी क्या है?’’
‘‘हां, तुम ठीक कहते हो भाई। चलो मैं पवन-पुत्र हनुमान बनकर ही उसे अस्पताल पहुंचाता हूं।’’ मैंने कहा।
योगेश की पत्नी ने मकान-मालकिन के कपड़े ठीक किये। उसके बाद मैंने हिम्मत की। उसको अपने कंधे पर डालकर चल पड़ा। अस्पताल लगभग एक किलोमीटर दूर था। भारी-भरकम मकान-मालकिन को इस तरह ढोते हुए मेरी सांस फूल गई थी। पर, विपत्ति के समय पता नहीं हममें इतनी हिम्मत कहां से आ जाती है कि हम असंभव लगने वाला कार्य भी कर डालते हैं। मैं उसे अस्पताल तक पहुंचाने में सफल हो गया था।
योगेश दौडक़र इमरजेंसी डॉक्टर को ढूंढ लाया। उसने उसे तत्काल इमरजेंसी में भर्ती कर लिया गया। योगेश दौडक़र ग्लूकोज, दवा और इंजेक्शन ले आया। इंजेक्शन देने के 2-3 मिनिट बाद मकान-मालकिन ने आंखें खोली। अपने दायें-बायें हम दोनों को व्यथित खड़े देखकर उसके होंठ हल्के से खुले। इस नि:शब्द मुस्कान में कितना कुछ था, जिसकी अनुभूति हमें अंदर तक भिगो गई।
वह हैजे की चपेट से बच गई थी। दूसरे दिन सुबह मैं उसके लिए दूध-नाश्ता लेकर अस्पताल पहुंचा तो योगेश की पत्नी ने चुटकी लेते हुए कहा था, ‘‘भाभीजी मध्य-रात यह मलंग आपको कंधे पर उठाकर ऐसे दौड़ रहा था मानो तुम इसकी...’’
मैंने बीच में ही झिडक़ दिया था, ‘‘छि: भाभी। ऐसा क्यों कह रही हो? मध्य-रात कहीं कोई साधन भी तो नहीं मिला था। कंधे पर लादकर न लाता तो पता नहीं क्या होता?’’
मकान मालकिन लज्जा से ऊबर आई थी। उसने कहा, ‘‘होता क्या? मैं मिट्टी हो गई होती।’’
बेंच पर बैठते हुए मैंने कहा था, ‘‘मालकिन ऐसा न कहिये।’’
मकान मालकिन उठकर बैठ गई थी। मेरे चेहरे की ओर देखते हुए कहा, ‘‘काहे की मालकिन। आप मुझे भाभी कहिये।’’
मैंने एक गिलास में दूध डाला और उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लीजिए।’’
दूध का गिलास थामते हुए उसने कहा, ‘‘आपको बहुत कष्ट हुआ।’’
‘‘नहीं, भाभी। इसमें कष्ट क्या? हम सब इंसान हैं। एक ही जगह रहते हैं। दुख-सुख में हम एक-दूसरे के काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा। पर, हां...।’’
‘‘कहते-कहते रुक क्यों गये? कहो, जो कुछ कहना है नि:संकोच कहो।’’
‘‘भाभी मुझे उस दिन बड़ा कष्ट हुआ। जब ये भाभीजी बीमार पड़ी थी और आप कह रही थी लोगों के पास रहने को न अपना घर न घाट। किराये पर जिन्दगी बसर करते हैं। वे न दिन देखते न रात। जब चाहे परेशान करते रहते हैं।...’’
मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि उसने कहा, ‘‘भैया, क्षमा करना। उन बातों को भूल जाओ। स्वार्थ की पराकाष्ठा पर खड़े मेरे पति ने मुझे भी अति-स्वार्थी बना दिया था। अब मेरी आंखें खुल गई हैं।’’
विनोद दो दिन बाद अपने काम से लौट आया था। आते ही उसने पिछवाड़े का दरवाजा खोला और वह पुकारने लगा था, ‘‘अरे कहां हो? क्या कर रहे हो? पन्ना भाई... योगेश भाई... रामसिंह भाई आओ, बाहर आओ।’’
एक-एक कर हम तीनों किराएदार बाहर चौक में आ गये थे। विनोद मेरे और फिर योगेश के गले से लिपट गया था। वह भावावेश में कह रहा था, ‘‘आप लोगों ने मेरी पत्नी को मौत के मुंह से बचा लिया। मैं नहीं जानता आप लोगों को किन शब्दों में धन्यवाद दूं।’’
हमने समवेत स्वर में कहा था, ‘‘भाई, यह तो हमारा फर्ज था। एक जगह रहते हुए हमें ऐसा करना ही होता है।’’
‘‘भाई! यह सामाजिक फर्ज आज से मैं भी सीख गया हूं। आओ, इस मौके पर मेरे यहां आज खाना-पीना हो जाए।’’
मैंने कहा, ‘‘इसकी क्या जरूरत है?’’
‘‘हां, भाई ! जरूरत है। मिलेंगे नहीं, एक साथ उठे-बैठेंगे नहीं, एक साथ खाएंगे-पिएंगे नहीं तो सामाजिक एकता भाव कैसे पैदा कर पाएंगे?’’ कहते हुए विनोद मुझे अपने मकान में खींच ले आया था। साथ ही वह कह रहा था, ‘‘योगेश और रामसिंह आप दोनों अपने बीवी बच्चों सहित 5-7 मिनट में आ जाओ।’’
सभी एक साथ जमे थे। तीनों औरतें रसोई में व्यस्त थीं। विनोद और हम हास-परिहास के साथ बाहरी व्यवस्था में लगे थे। सभी ने मिलकर एक साथ खाना खाया। पूरा मकान जीवन्त हो उठा था।
मुझे याद नहीं पड़ता कि उस दिन के बाद मकान-मालकिन ने कभी अपने पिछवाड़े के दरवाजे को सिटकनी लगाई हो। वह दरवाजा हमेशा के लिए खुल गया था।