Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

समान स्कूल प्रणाली की शिक्षा: एक साहसिक फैसला

केदार नाथ पाण्डेय

सदस्य, बिहार विधन परिषद्
मो. 9431218048

माननीय न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 18 अगस्त 2015 को उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर दिये गये फैसले से ‘समान स्कूल प्रणाली की पड़ोस पद्धति शिक्षा व्यवस्था’ एक बार फिर मजबूती से विमर्श के केन्द्र में आ गई है। देश के शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और शिक्षक संगठनों ने इसे लागू करने की मांग तेज कर दी है। दरअसल समान स्कूल प्रणाली की पड़ोस पद्धति वाली शिक्षा व्यवस्था कोई काल्पनिक प्रश्न नहीं है। यह समानता के सिद्धांत पर आधारित नागरिकों का एक सुचिन्तित संवैधानिक अधिकार है जिसे खारिज नहीं किया जा सकता। डॉ. राम मनोहर लोहिया जब सबके लिए समान शिक्षा की वकालत कर रहे थे तो उनका नारा था- ‘‘कलक्टर हो या भंगी की संतान, शिक्षा सबकी एक समान’’ और ‘‘केरल हो या राजस्थान शिक्षा सबकी एक समान’’। इस नारे से उनका आशय था कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक फैले इस विविधतापूर्ण, विविध् भाषाई, बहुधर्मी विशाल देश में सभी बच्चों को समान रूप से गुणवतापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। शिक्षा के मामले में उनके बीच कोई भेदभाव या गैर बराबरी कायम नहीं की जानी चाहिए।  
    स्वातंत्र्योत्तर काल में जब भारत की सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर सांगोपांग विचार करने के लिए सन् 1964 में डॉ. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन हुआ जिसमें देश-विदेश के विद्वान शामिल थे, तो उसने काफी सुचिन्तित तरीके से विमर्श कर 1966 में जो रिपोर्ट सौंपी उसका नाम रखा- Education for national development यानि राष्ट्रीय विकास के लिए शिक्षा। आयोग का मानना था कि शिक्षा की समुचित व्यवस्था के बगैर राष्ट्रीय विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। 1968 में देश की संसद ने उसी प्रतिवेदन पर एक राष्ट्रीय शिक्षा की नीति स्वीकृत की। जिसमें शिक्षा संरचना, शिक्षक, शिक्षा के माध्यम की भाषा और राष्ट्रीय विकास के लिए सारे मुद्दे समाहित थे। 10धन 2 धन 3 की शिक्षा संरचना उसी नीति की देन है। आयोग ने विश्व के विकसित देशों की शिक्षा प्रणालियों के अध्ययन के आधार पर सुझाया कि भारत में समान स्कूल प्रणाली की शिक्षा लागू की जानी चाहिए जो पड़ोस पद्धति पर आधरित हो। यानि एक विद्यालय को केन्द्र मानकर उसकी निर्धरित परिधि के सारे नागरिकों को चाहे मंत्री, सांसद, विधायक, उच्चाधिकारी अथवा किसान, मजदूर हों उनके बच्चों के लिए उसी स्कूल में शिक्षा की बाध्यकारी व्यवस्था होनी चाहिए। आयोग का मत था कि इस व्यवस्था से संविधान प्रदत्त समानता का अधिकार तो कायम होगा ही, नागरिकों के बीच जाति, धर्म, लिंग का भेदभाव भी अंकुरित नहीं होगा। जो एक स्वस्थ और दीर्घकालिक लोकतंत्र के लिए आवश्यक शर्त है। चूँकि सभी वर्गों के बच्चे अपने पड़ोस के विद्यालय में अध्ययन करेंगे इसलिए मंत्री, सांसद, विधायक, उच्चाधिकारी, स्थानीय निकायों के   प्रतिनिधि, किसान, मजदूर सभी लोगों का ध्यान भी उस विद्यालय पर होगा। उसकी आधारभूत संरचना तथा शिक्षक सभी विचार दृष्टि के केन्द्र में होंगे। शिक्षक भी योग्य, कुशल एवं सम्मान-जनक वेतन प्राप्त करने वाले होंगे। आपसी समन्वय से जो राष्ट्र बनेगा उसका आपसी सद्भाव भी ठीक होगा। आयोग की यह अनुशंसा अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, इटली आदि जी आठ के देशों में पहले से सफलतापूर्वक संचालित शिक्षा प्रणाली पर आधरित थी। उन देशों में आज भी यह शिक्षा प्रणाली सफलतापूर्वक चल रही है।
    आयोग का सुझाव था कि कानून सम्मत तरीके से इस व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए और शिक्षा को सामाजिक आर्थिक रूपान्तरण का हथियार मानते हुए देश के बजट का छ: फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। जिसे 1980 के बाद बढ़ती आबादी के हिसाब से और बढ़ाया जाना चाहिए। दुर्योग से कोठारी आयोग की इन दो महत्वपूर्ण अनुशंसाओं को राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी से लागू नहीं किया गया। देश के सारे नागरिकों को अपने बच्चों के लिए स्कूल चुनने की आजादी प्रदान कर दी गई। फिर 1986 में जब राजीव गाँधी ने पुन: राष्ट्रीय शिक्षा की नयी नीति बनाई तो उसमें भी स्वीकार किया गया कि गलतियाँ हुई हैं और उन्हें सुधारा जाना चाहिए और इस प्रकार नयी शिक्षा नीति में भी समान स्कूल प्रणाली की पड़ोस पद्धति शिक्षा व्यवस्था और जीडीपी का छ: प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की स्वीकारोक्ति की गई। लेकिन हुआ उल्टा, समान स्कूल की बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में दून टाइप नवोदय विद्यालय स्थापित कर फिर एक बार समानता के संवैधनिक अधिकार को खत्म कर दिया गया। शिक्षा की बहुपरती व्यवस्था अविच्छिन्न रूप से जारी रही बल्कि और बढ़ा दी गई। शिक्षा पर जीडीपी का खर्च नेहरू की तुलना में और घटा दिया गया। इसीलिए वी पी सिंह की सरकार ने जब नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा के लिए आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समिति गठित की तो समिति का साफ-साफ मानना था कि देश में शिक्षा के दो पिरामिड बन गये हैं अमीरों के लिए अलग और गरीबों के लिए अलग। विडम्बना है कि 69 साल की आजादी के बाद भी स्थिति जस की तस है बल्कि और बिगड़ती चली गई है। वैश्विक पूँजी के हमले के बाद तो इसे रोकने या सुधारने की कोई कवायद दिखाई भी नहीं पड़ती।
    माननीय उच्चतम न्यायालय के 93 के उन्नीकृष्णन न्याय निर्णय के बाद संविधान में संशोधन कर और अनुच्छेद 21 (क)जोडक़र छ: से चौदह वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा का नि:शुल्क एवं अनिवार्य अधिकार लागू अवश्य कर दिया गया है लेकिन वह एक छलावा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। पूर्व में संविधान के अनुच्छेद 45 में वर्णित 0-14 वर्ष के बच्चों में से 0-5 वर्ष के लगभग 17 करोड़ बच्चों के दायित्व से सरकार मुक्त हो गई है। इसीलिए न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने उत्तर प्रदेश के बहाने पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था की जो तस्वीर सामने रखी है वह निहायत गन्दी और अफसोसनाक है। न्याय निर्णय के अनुच्छेद 80-90 के अन्तर्गत उन्होंने सम्पूर्ण स्थितियों का वास्तविक चित्र सामने रखा है और सरकार को कदम उठाने का निदेश दिया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत बच्चों के स्कूलों को कामन मैन स्कूल की संज्ञा दी है। जहाँ न तो आधारभूत संरचनाएँ हैं, न शौचालय, न पीने के पानी की व्यवस्था और न ही गुणवतापूर्ण शिक्षा देने वाले सुयोग्य, प्रशिक्षित और पर्याप्त शिक्षक। ये सभी स्कूल वहाँ की सरकार, बोर्ड द्वारा संचालित हैं। ये पहली कोटि के विद्यालय हैं। उन्होंने दूसरी कोटि में उच्च सुविधा प्राप्त वर्ग के बच्चों के स्कूलों को रखा है और उन्हें  एलीट स्कूल  की संज्ञा दी है। जहाँ उत्तम आधारभूत संरचना, शौचालय, पानी की व्यवस्था, अच्छे पुस्तकालय, ए सी बसें, ए सी कमरे आदि सब कुछ हैं। इन्हीं विद्यालयों में देश के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, उच्च नौकरशाहों और समृद्ध वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। उन्हें सुयोग्य, कुशल, अच्छे वेतनधारी शिक्षक नसीब हैं। तीसरी कोटि में वैसे विद्यालयों की चर्चा की है जो सेमी एलीट स्कूल हैं जो एलीट से नीेचे और ‘कॉमन मैन’ स्कूल से थोड़ा ऊपर हैं। यहाँ मध्यवर्गीय, अद्र्ध-समृद्ध वर्ग, निचले स्तर के नौकरशाहों के बच्चे पढ़ते हैं। यहाँ कॉमन मैन स्कूल से सुविधाएँ थोड़ी बेहतर हैं। आगे के अनुच्छेदों में शिक्षा की नंगी सच्चाई वर्णित है कि कामन मैन स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्तियाँ सिर्फ और सिर्फ अपने मतदाताओं को रिझाने, फुसलाने तथा राजनैतिक लाभ के लिए की जाती हैं। इनका उद्देश्य देश के बच्चों की उचित शिक्षा की व्यवस्था करना नहीं है। देश के समृद्ध वर्ग, शासक वर्ग यहाँ तक कि नौकरशाही, और नागरिकों का भी ध्यान इन स्कूलों की ओर नहीं जाता है और न ही कोई इनकी सुविधा, आधारभूत संरचना, शिक्षक की ओर दृष्टि डालता है। ये उपेक्षित और त्याज्य हैं।
    इसी प्रसंग में न्यायमूर्ति अग्रवाल ने न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर को याद किया है जिन्होंने देश की शिक्षा व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी की थी और इसे सुधारना केन्द्र तथा राज्य सरकारों का दायित्व बताया था। माननीय न्यायमूर्ति ने निर्देश दिया है  कि जो लोग सरकारी खजाने से वेतन प्राप्त करते हैं, चाहे माननीय मंत्री हों, सांसद, विधायक, जिलाधिकारी, पुलिस अध्ीक्षक अथवा नौकरशाही के अंग हों सभी अपने बच्चों को पड़ोस के सरकारी विद्यालय में ही पढ़ावें ताकि उन बच्चों में समुदाय की भावना का विकास हो सके। उनके बीच सामाजिक वैषम्य की खाई पाटी जा सके और सामाजिक भेदभाव और बँटवारा न हो। उनका कहना है कि इस व्यवस्था से इन स्कूलों पर सबका ध्यान केन्द्रित होगा। वे उपेक्षित, अमर्यादित और दोयम दर्जे के नहीं समझे जाएंगे और एतदर्थ उत्तर प्रदेश की सरकार को कानून बनाना चाहिए। न्याय निर्णय में यह भी दर्ज है कि यदि समाज का यह वर्ग अपने बच्चों को उन स्कूलों में नहीं पढ़ावे तो उनके वेतन से उतनी राशि काटकर जितनी वे एलीट स्कूलों में अपने बच्चों पर खर्च करते हैं, उन स्कूलों की व्यवस्था, निर्माण पर खर्च किया जाय। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को की गई कार्रवाई की रिपोर्ट छ: माह में शपथ पत्र के माध्यम से समर्पित करने का निर्देश भी दिया है।
    बिहार में भी नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2006 में राजग की सरकार ने प्रो. मुचकुन्द दूबे की अध्यक्षता में राज्य स्तर पर समान स्कूल प्रणाली आयोग गठित किया था। इसका बीज कोठारी आयोग की उसी अनुशंसा में निहित था जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। आयोग ने निर्धारित समय सीमा में बिहार की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था, भावी दशा-दिशा का सम्यक् विश्लेषण करते हुए जून 2007 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। उसने बिहार में समान स्कूल प्रणाली की पड़ोस पद्धति शिक्षा स्थापित करने हेतु एक रोड मैप और वित्तीय आकलन भी प्रस्तुत किया था। जिसमें पाँच वर्षों में कुल साढ़े सत्रह हजार करोड़ का बजट आकलित था। लेकिन जिस उत्साह से सरकार ने आयोग गठित किया था और शिक्षा सुधार का दावा पेश किया था उसी उत्साह से उसने आयोग की रिपोर्ट को आलमारियों में बन्द भी कर दिया। कई बार मेरे द्वारा विधान परिषद् में प्रश्न उठाये जाने के बावजूद रिपोर्ट विधान मण्डल के पटल पर भी नहीं रखी जा सकी और न ही उसकी स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक समझा गया।
    कोठारी आयोग की अनुशंसा अथवा मुचकुन्द दूबे आयोग की अनुशंसाएँ स्वतंत्र भारत अथवा बिहार में क्यों नहीं लागू हुई इसके उत्तर के लिए पिछली सदी के पचासोत्तरी काल में जाना पड़ेगा। उस समय आजाद भारत में एक नया माहौल पैदा हुआ था। जिसकी व्याख्या तत्कालीन कवि, कलाकार, रचनाकार, राजनीतिज्ञ अपने-अपने तरीके से कर रहे थे। उनके पास आजादी से उत्पन्न सामाजिक विकास को समझने की एक वैज्ञानिक विश्व दृष्टि थी, लेकिन उनमें गहरे मतभेद थे। बावजूद इस बात पर वे एकमत थे कि यह वो आजादी नहीं है जिसकी वो कल्पना कर रहे थे।
    उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में शिक्षा पर चली बहस में जब बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बालक-बालिकाओं की अनिवार्य और नि:शुल्क शिक्षा की वकालत की तो लम्बे विमर्श और मशक्कत के बाद भी इसे मौलिक अधिकारों के खण्ड तीन में शामिल नहीं किया जा सका। शिक्षा नीति निर्देशक तत्वों के खण्ड चार अनुच्छेद 45 में समाहित की गयी। उसके लिए दस वर्षों का अतिरिक्त समय तय किया गया। कुछ लोग तो बाबा साहेब पर यह दबाव भी डाल रहे थे कि देश गरीब है इसलिए चौदह वर्ष की उम्र घटाकर कम की जानी चाहिए। लेकिन अम्बेडकर चूँकि सामाजिक उत्पीडऩ, विषमता के भोक्ता थे इसलिए वे इसे घटाने पर सहमत नहीं हुए और शिक्षा कम से कम नीति निर्देशक तत्वों वाले खण्ड में जगह पा सकी।
    आजादी के बाद तो धीरे-धीरे यह साफ ही हो गया कि देश का रास्ता किधर से होकर जा रहा है? सत्ता मिलते ही कांग्रेस सुख भोग की राजनीति में ढल गई और नये सत्ताधरी वर्ग ने जो रास्ता चुना वह ‘महाजनों येन गत: स पन्था:’ न होकर महाजनी सभ्यता का रास्ता बन गया। पूँजीवादी समाज के निर्माण की कोशिशों से भारतीय समाज के भीतर पूँजीवादी चेतना का विकास तेजी से हुआ। पुराने नैतिक मूल्य ध्वस्त होने लगे और उच्च वर्ग के साथ मध्यवर्ग ने भी धनवान होने तथा अपने और अपने परिवार में केन्द्रित होने के सारे हथकंडे अपना लिए। 90 के बाद आये भूमंण्डलीकरण के प्रभाव ने इसे और मजबूत दिशा दे दी। फलत: अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रान्स, आदि पूँजीवादी देशों में अपनायी गयी समान शिक्षा प्रणाली यहाँ लागू नहीं हो पायी। मध्यवर्ग को लालीपाप जरूर दिखाया गया कि यही बेहतर प्रणाली है लेकिन उसकी धार को कुंद करने के लिए केन्द्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय सामने ला दिये गये। उन्नीकृष्णन न्याय निर्णय को भी ‘डाइल्यूट’ कर दिया गया। ऐसे में इलाहाबाद का न्याय निर्णय कितना कारागर होगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है? लेकिन राष्ट्रीय विकास की दिशा में इस प्रणाली की महती भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता? इस दौर में भी न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के फैसले को साहसिक और ऐतिहासिक मानना ही होगा।