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Saturday 25 Nov 2017

अक्षर पर्व मई-2016 अंक पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। एक साथ छ: कहानियां इस अंक में पाकर मन गदगद हो गया। अप्रैल-2016 के अंक में मात्र तीन कहानियां प्रकाशित हुई थी।

 

बलदेव कृष्ण कपूर,
491, कृष्णापुरी, मुजफ्फरनगर     
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अक्षर पर्व मई-2016 अंक पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। एक साथ छ: कहानियां इस अंक में पाकर मन गदगद हो गया। अप्रैल-2016 के अंक में मात्र तीन कहानियां प्रकाशित हुई थी। मई अंक में सुभाष रस्तोगी की कहानी ‘अब सात-पैंतीस नहीं बजते’ सामयिक विषय पर लिखी गई एक अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी है। लेखक बधाई के पात्र हैं। कुंदन सिंह परिहार की कहानी ‘अपने गांव का आदमी’ सेमीनारों की पोल खोलती हुई एक प्रभावशाली कहानी है। विजय रंजन की कहानी ‘हुडुकचुल्लू’ अपने शिल्प और शैली से प्रभावित करती है। प्रभा प्रसाद ने अपनी कहानी ‘एक रास्ता यह भी है’ में पुरुषों को घर में रहकर ‘हाऊस-वाइफ’ की जिम्मेदारी निभाते हुए $फुलटाइम ‘हाउस हस्बैंड’ बनने की प्रेरणा दी है। प्रभा जी का यह आइडिया पुरुषों को बहुत अटपटा लगेगा, यद्यपि कुछ पुरुषों ने इसे पहले ही अपना लिया है।  हरदर्शन सहगल का आलेख ‘गल्प साहित्य का यथार्थ’ बहुत विवादास्पद है। सृष्टि में सफेद, काला और ग्रे तीनों रंग होते हैं। इसे हरदर्शन सहगल भी मानते हैं। परन्तु श्री सहगल चाहते हैं कि अच्छे कहानी साहित्य में केवल उजला पक्ष ही सामने आना चाहिए; काले और ग्रे रंग अर्थात समाज में व्याप्त असंगतियों, विसंगतियों, अत्याचारों, हताशाओं को कालीन के नीचे ही रहने देना चाहिए ताकि वह नजर न आएं। प्रामाणिक अच्छा कहानी साहित्य वह है जो सदैव आदर्श स्थिति को ही दिखाए- यह श्री सहगल का मत है। यथार्थ की उनकी परिभाषा नि:तांत व्यक्तिगत है। आज के समाज में घटित होने वाले सच को दर्शाने वाले कहानी-साहित्य को वह ‘गल्प मानते हैं, यथार्थ नहीं’। मैं विनम्रतापूर्वक श्री सहगल से निवेदन करना चाहता हूं कि सत्य को छुपाने से काम नहीं चलेगा। अच्छा कहानी लेखक अपनी लेखनी से समाज की कुरुपताओं पर हथौड़े से चोट करता है- स्थितियों को सुधारने के लिए, कभी नायक-नायिका की जीत दिखाकर कभी हार दिखाकर। क्या फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ अच्छा साहित्य नहीं है। जबकि वह समाज के स्याह पक्ष का यथार्थ चित्रण करता है।  अब दो शब्द इस पत्रिका के कवर पृष्ठ के बारे में भी। हर अंक में कवर-पृष्ठ इतना सारगर्भित और भाव-व्यंजक होता है कि ऐसा लगता है जैसे पूरे अंक को परिभाषित करती हुई एक सार्थक टिप्पणी चित्रकार ने अपने कैमरे से या तूलिका से लिख दी हो। ऐसा कवर पृष्ठ चुनने के लिए आप बधाई के पात्र हैं। ‘उपसंहार’ के रूप में आपका आलेख ‘बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि।’ आपने बिल्कुल ठीक कहा है कि हर राजनैतिक दल बाबा साहेब अम्बेडकर पर अपना कब्जा जमाना चाहता है। यदि हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा चढ़ जाए, तो हर सत्ताधारी सरकार अपने-अपने राज्य का नाम बदलने को तैयार है, चाहे हरियाणा हो, चाहे बंगाल, चाहे तमिलनाडु, चाहे पांडिचेरी, चाहे उड़ीसा और चाहे उत्तराखण्ड। असली दोष तो जनता का है जो केवल नाम बदलने से ही संतुष्ट हो जाती है।