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Thursday 23 Nov 2017

अक्षर पर्व मई-16 अंक मिला। ललित जी ने प्रस्तावना से कई पाठकों को इतिहास में झांकने का मौका दिया है।

दिलीप गुप्ते
अक्षर पर्व मई-16 अंक मिला। ललित जी ने प्रस्तावना से कई पाठकों को इतिहास में झांकने का मौका दिया है। साठ के दशक की हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं की मृत्यु पर उनका दुख जायज है तब वे पत्रिकाएं किसी घर के बौद्धिक स्तर की पहचान हुआ करती थी। धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसे अद्र्धसाहित्यिक साप्ताहिक तो घर के सदस्य जैसे थे। इन्हें पढऩा भी बुद्धिजीवी होने का प्रमाण पत्र होता था। लघु पत्रिकाओं के भी कद्रदान हुआ करते थे। समाचार पत्र भी साहित्य में रुचि रखते थे। हर रविवार या सोमवार को साहित्य पृष्ठ हुआ करते थे जिनमें प्रतिष्ठित साहित्यकारों की रचनाएं पढऩे को मिलती थी। उन पर बहस हुआ करती थीं। नए लेखक को पहचान मिलती थी। जब अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में भावुकतावश जिन विद्यार्थियों ने हिन्दी का हाथ थामा वे आंदोलन के झंडावदारों के धोखेबाज के शिकार बने। नेताओं ने अपने बेटे-बेटियों को कॉन्वेंट स्कूलों में भेजकर उन्हें अच्छी नौकरी दिलवाई। हिन्दी वाले कारकूनी के लायक भी नहीं रहे। इससे अभिभावकों का विश्वास न केवल नेताओं से बल्कि हिन्दी से भी हट गया। गली-गली में इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल गए। जब हिन्दी से ही दूरी हो गई तो हिन्दी साहित्य की क्या बिसात। आज समाचार पत्रों से कविता तो एकदम गायब हो गई है। कहानियां और लेख भी सिकुड़ गए हैं। अब संपादक का काम आयोजनों की शोभा बनना ही रह गया है। वह मालिकों का पीआरओ बन गया हैा। उसकी प्रतिबद्धता मालिक के प्रति हो गई है। प्रस्तावना में अरविंद कुमार सिंह के बारे में पढक़र याद आया कि मेरे मित्र तीर्थराम भोजने भी रेल डाक सेवा में थे और वे भी डाक विभाग पर शोध कार्य कर रहे हैं।