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Saturday 18 Nov 2017

अपनी प्रस्तावना में ललित जी हमेशा कुछ नायाब ही कहते रहे हैं, इस अंक की प्रस्तावना में ललित जी ने हिन्दी लेखन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण समस्या पर विचार किया है!

 

नवनीत कुमार झा, हरिहरपुर
अपनी प्रस्तावना में ललित जी हमेशा कुछ नायाब ही कहते रहे हैं, इस अंक की प्रस्तावना में ललित जी ने हिन्दी लेखन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण समस्या पर विचार किया है! आज साहित्य की तरफ लोगों के रुझान में कमी आ रही है। आज जब साहित्यिक कृतियों से ही हम अनभिज्ञ बने हुए हैं, तो भला साहित्येतर लेखन की कहाँ से कोई पूछ होगी!! स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के प्रति नई पीढ़ी में एक अवज्ञा का भाव उत्पन्न हो गया है और इसके लिए जिम्मेदार है हमारी महत्वाकांक्षा। आज हम में से हरेक व्यक्ति सफलता की बुलंदियों को छूना चाहता है चाहे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। साहित्य और जीवन मूल्य से अधिक मूल्यवान है कैरियर, जॉब और पैसा। आज कॉन्वेंट में बच्चों को पढऩा अनिवार्य हो गया है ! पहले के जैसी न लोगों की अभिरुचि रह गई है और न ही हिन्दी में अब ऐसी पत्रिका ही है कोई, जिसे पारिवारिक पत्रिका की हैसियत दी जाए!! धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवनीत और कादम्बिनी कुछ ऐसी पत्रिकाएँ थीं जो अपने बेहतरीन साहित्येतर गद्य के लिए प्रसिद्ध थीं क्योंकि इन सभी पत्रिकाओं में जो सामग्रियाँ छपती थीं उनमें हर उमर के पाठकों के लिए कुछ न कुछ अवश्य रहता था। इनके अलावे दैनिक समाचार पत्रों में भी हर उमर और अभिरुचि से जुड़े लोगों के लिए - विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा, संस्कृति और कला आदि पर तथ्यपरक सामग्री देने की एक विशिष्ट परिपाटी थी जो अब कम हो रही है!! अपने चिरपरिचित अंदाज में ललित जी ने साहित्येतर लेखन की शुरुआत की पत्रिकाओं से और बाद में चर्चा में आ गई दस साल पहले लिखी अरविंद कुमार सिंह की किताब - भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा - 400 पृष्ठ की इस लोकप्रिय किताब के बारे में इतना बढिय़ा लिखा है ललित जी ने कि सहज ही हिन्दी भाषा को समर्थ और समृद्ध बनाने वाली इस पुस्तक को उलट- पलट कर देखने - पढऩे की इच्छा हुई है, इसलिए ललित जी का आभार !!! प्रभा प्रसाद की कहानी ( एक रास्ता यह भी है ) को पढऩा आरम्भ किया, आत्मीयता और स्नेह से लबालब खत के जिक्र ने मुझे थोड़ा सा साकांक्ष कर दिया कि इस कहानी को तन्मयता से पढ़ा जाए, क्योंकि आज समाज में सब कुछ मिल जाएगा पर प्यार, अपनापन, आत्मीयता और स्नेह का मिल पाना कठिन होता जा रहा है! हम आत्मकेन्द्रित और असंवेदनशील हुए जा रहे हैं! एक समय था जब मोबाइल फोन और इंटरनेट नहीं था और लोग अपने सुख-दुख खतों में बांटते थे !!  यह कहानी थोड़ी लीक से हटकर है पर सदियों से चली आ रही प्रथा या परंपरा को तोडक़र नई परंपरा गढ़ती इस कहानी को तन्मयता से पढऩा एक सुखद अनुभूति से भर गया!!
 क्या व्यंग्य लिखते हैं अश्विनी कुमार दुबे। इस उत्कृष्ट व्यंग्य को पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया ! व्यंग्यकार कहते हैं कि - ऋण जब वल्र्ड बैंक मंजूर कर लेता है, तब अफसरों के चेहरे गोभी के फूल की तरह खिल जाते हैं - तो कितना अच्छा कार्टून बन जाता है दिमाग़ में!! एकदम यथार्थ को हास्यास्पद और जुगुप्सा पूर्ण चित्र बनाते इस बेहतरीन व्यंग्य रचना के लिए लेखक और सम्पादकीय टीम को बधाई और एक आग्रह कि कभी - कभी हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचनाओं के भी दर्शन करवाइए !!