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Tuesday 21 Nov 2017

मई अंक में हरदर्शन सहगल की बात से मैं भी सहमत हूं और शायद अन्य लोग भी सहमत होंगे कि सभी के अपने यथार्थ उनके ज्ञान और अनुभव पर आधारित होते हैं

गंगा प्रसाद बरसैंया
ए-7, फारचून पार्क, जी-3,
गुलमोहर भोपाल (म.प्र.)- 462039

मई अंक में हरदर्शन सहगल की बात से मैं भी सहमत हूं और शायद अन्य लोग भी सहमत होंगे कि सभी के अपने यथार्थ उनके ज्ञान और अनुभव पर आधारित होते हैं उसे किसी स्थापित यथार्थ की नाप से नहीं नापा जा सकता। एक ही मानदंड सभी पर लागू नहीं होता जबकि विद्वान आलोचक एक कसौटी बनाकर चलते हैं। इसकी साक्षी इस बार की कहानियां हैं जो बौद्धिक गांभीर्य से दूर बड़ी सहजता से लिखी गई हैं। वहां बड़ी घटना नहीं, मनोवैज्ञानिक प्रस्तुतिकरण प्रमुख हैं। प्रभा प्रसाद की कहानी की अलग शैली है। कुंद नसिंह परिहार कमल चोपड़ा और विजयरंजन की कहानियां मनुष्य-स्वभाव से जुड़ी है। अश्विनी दुबे का व्यंग्य आज की सच्चाई का बयान है यही हो रहा है। मोटे लोग मलाई खा रहे हैं और छोटे लोग आत्महत्या कर रहे हैं। उनका जीना मुश्किल है। मुहदेखी व्यवस्था है। डॉ. शोभा निगम का लेख महत्वपूर्ण शोध और व्यापक अध्ययन का साक्षी है। तुम्हारा सम्पादकीय लाइन से हटकर है। उसे पढक़र उस जमाने की याद आता है जब हर दैनिक अखबार रविवार को साहित्य अंक निकालते थे। दीवाली, होली के विशेषांक संग्रहणीय होते थे। छोटे-छोटे अखबारों में भी साहित्य पढऩे को मिलता था। अब तो वह विज्ञापनों के बीच फिलर बनकर रह गया है।