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Wednesday 22 Nov 2017

नहीं


सर्वमित्रा सुरजन
‘कुछ जिंदगियां छोटी होती हैं, लेकिन इस अल्पकाल में ही खूब शोहरत हासिल कर चुकी होती हैं, ये छोटी जिंदगियां अक्सर लड़कियों की होती हैं। ये लड़कियां अपनी शोहरत जितनी ही बड़ी जिंदगी चाहती होंगी, लेकिन समाज ऐसा नहींचाहता। ये लड़कियां समाज के नियमों को धता बताकर अपनी शर्तों पर जीवन जीती हैं, जो समाज के अहंकार को नागवार गुजरता है। इसलिए जिया खान कथित तौर पर आत्महत्या करती है, प्रत्यूषा बनर्जी फांसी पर लटक जाती है, सुष्मिता बनर्जी अफगानिस्तान में मारी जाती हैं और कंदील बलोच यानी फौजिय़ा अजीम को सगा भाई ही गला घोंटकर मार देता है। कुछ होती हैं तस्लीमा नसरीन की तरह जो अपना देश छोडऩे पर मजबूर कर दी जाती हैं। तस्लीमा नसरीन की ही एक कविता प्रेरित नारी का हिन्दी अनुवाद सुशील गुप्ता ने किया है, जिसमें वे कहती हैं-
हम हैं- प्रकृति की भेजी हुई स्त्रियाँ
प्रकृति स्त्री को पुरुष की पसलियों से नहीं गढ़ती
हम हैं, प्रकृति की प्रेरित नारियाँ
प्रकृति नारी को पुरुष के अधीन नहीं रखती
हम हैं, प्रकृति की भेजी हुई स्त्रियाँ
प्रकृति स्त्री को स्वर्ग में पुरुषों के पैरों तले नहीं रखती।
प्रकृति ने स्त्री को मनुष्य बनाया है
पुरुष द्वारा निर्मित धर्म इसमें बाधा डालता है
प्रकृति ने स्त्री को मनुष्य बताया है-
समाज अंगूठा दिखाकर ठहाके लगाता है
प्रकृति ने स्त्री को मनुष्य कहा है-
पुरुषों ने एकजुट होकर कहा है - नहीं।
ऊपर उल्लिखित तमाम मृत महिलाओं और उनकी जैसी जिंदा महिलाओं को पुरुष समाज नहींकहने में ही अपनी शान समझता है, अपना सम्मान समझता है। पुरुषों को ही इंसान मानने वाले इस समाज में औरत का सारा वजूद केवल उसके शरीर तक ही सीमित है, और पुरुष अपने सम्मान की परिभाषा उसके इर्द-गिर्द ही गढ़ता है। इसलिए कंदील बलोच को बड़ी निर्ममता से उसका भाई मार देता है और इसे नाम दिया जाता आनर किलिंग। कंदील का कसूर इतना ही था कि उसने पर्दे में रहने की जगह पर्दे पर आकर अपनी भावनाओं का इजहार किया। उसका बिंदास अंदाज, लोकप्रियता हासिल करने के तरीके, बातें, इच्छाएं, इन सब पर किसी को भी सहमत या असहमत होने का अधिकार है, लेकिन ये अधिकार किसी को नहींथा कि उसकी हत्या कर दी जाए। कंदील को शायद अहसास था कि उसकी हत्या हो सकती है, इसलिए उसने अपने लिए सुरक्षा की मांग की थी, ऐसी खबरें हैं। लेकिन प्रशासन भी इसी समाज का हिस्सा है, उसने उसकी मांग पर ध्यान नहींदिया होगा। कंदील सोशल मीडिया पर अपनी बोल्डनेस के लिए काफी चर्चित थी। उसके वाचिक और कायिक संदेशों पर उन्हें कई अपमानजनक टिप्पणियां सुनने मिलीं, धमकियां मिलीं, नफरत भरे संदेश मिले, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि सोशल मीडिया पर उनके फालोअर्स की संख्या लाखों में थी। तो ये समाज का असली चेहरा है, जो ऊपर चाहे जितना संस्कृति, संस्कारों की माला जपे, भीतर वह सब देखने का आनंद उठाता है, जैसा कंदील दिखाती या बोलती थीं। सम्मान की इतनी ही परवाह रहती तो कंदील के सोशल मीडिया पर आए संदेशों को इतनी तवज्जो ही नहींमिलती। यह घटना पाकिस्तान की है और इसे इस्लाम की कट्टरता से जोडक़र देखा जा रहा है। लेकिन औरतों को लेकर संकुचित विचार पूरी दुनिया में हैं। भारत में ही सम्मान के नाम पर हत्या के कई मामले हुए हैं। दूसरी ओर कहींसात साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार की खबर है, तो एक बलात्कार पीडि़ता के साथ वही आरोपी दोबारा बलात्कार करते हैं, केवल इसलिए कि उसने समझौता करने से इंकार कर दिया। नाइजीरिया में बोको हराम सैकड़ों महिलाओं का अपहरण कर आतंकियों के पास भेज रहा है, तो आईएस महिलाओं को गुलाम बनाकर उनकी खरोद-फरोख्त कर रहा है। अमरीका में हाल ही में लगभग सौ महिलाओं ने रिपबल्किन पार्टी की ओर से राषट्रपति उम्मीदवार बन रहे डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में नग्न होकर प्रदर्शन किया। महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर रिपबल्किन पार्टी के बयानों और विचारों से ये आहत हैं। दुनिया भर की ये अलग-अलग घटनाएं बताती हैं कि पाकिस्तान ही नहीं, हर देश में महिलाएं दोयम दर्जे पर रखी गई हैं। अब चाहे जितने महिला दिवस मना लें, महिलाएं एक पायदान आगे बढक़र पुरुषों की बराबरी पर खड़ी नहींहो पा रही हैं। अगर होना चाहें तो उनका हश्र कंदील बलोच जैसा नहींहोगा, यह आश्वस्ति समाज नहींदे सकता। औरतों को खाना बनाने, कपड़ा सिलने के ही लायक समझा जाता है, लेकिन अक्सर यह मजाक भी सुनने मिलता है कि दुनिया के तमाम बड़े शेफ, तमाम बड़े फैशन डिजायनर पुरुष ही हैं। धूर्तता की हद देखिए, कभी यह नहींकहा जाता कि दुनिया के तमाम धर्मों में गुरु का पद भी अधिकतर पुरुषों के पास ही है, जो अपनी सुविधा से धर्म की व्याख्या करते हैं और एकजुट होकर कहते हैं- नहीं।