Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

मगर तैरना नहीं आया, बहुत बहा हूं


 कालूलाल कुलमी
हिंदी विभाग, गुरू घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर,छ.ग. 495009
मो. 8602575304

‘अपनी कमजोरियों का मुक्त स्वीकार आत्मकथा लेखन के मयार को और नीचे नहीं गिराता है बल्कि उसका मयार और ऊंचा उठ जाता है। रूसो की आत्मकथा, गोर्की या गांधी की आत्मकथा में कमजोरियों के मुक्त स्वीकार और आत्मालोचन को पढक़र आत्मकथा लेखक के बारे में आपकी धारणा और अच्छी हो जाती है।’
‘तो पाठक को सत्य सूंघने का अभ्यास होता है। सत्य-गंध की पहचान उसे है। चूंकि आत्मकथा में किसी भी विधा से अधिक विश्वसनीय होने की क्षमता है। इसके चलते कई कथाकार आत्मकथा के रूप का उपयोग विश्वसीनयता लाने के लिए करते हैं पर सिर्फ  उस रूप से विश्वसनीयता नहीं आती। वस्तुत: आत्मकथा रूप की कम अंतर्वस्तु वाली विधा अधिक है। उसका मूलाधार ही आत्मसंघर्ष है। उस कृति को आत्मसंघर्ष करना ही होगा तभी वह विश्वसनीयता अर्जित कर सकेगी।’
गद्य की पहचान - अरुण प्रकाश,  अंतिका प्रकाशन, पृसं 133,135
आत्मकथा सच कहने का सबसे बड़ा जोखिम है। लाल बहादुर वर्मा वही कहते हैं जो वे कहने का साहस कर पाए, आगे वे स्वीकार करते गये बस यही सच है। जीवन के उस अंधेरे में जहां बेटे ने कभी अपने पिता को अपनी मां से बात करते हुए न देखा हो, जहां हर कदम पर जैसे अंधेरा ही पसरा हुआ हो। लेकिन बचपन से ही एक पागल मन अंदर ऐसा संसार रचता रहा जहां कुछ करने की जिद और प्रकाश की राह पर बढ़ते रहने की गजब की जिजीविषा रही, वही वर्मा जी को आगे बढऩे की राह दिखाती रही। लेकिन वहीं कमजोरियों ने उनके साहस को भी कम कुंद नहीं किया।
‘पिता के लालच और बेईमानी तथा उनका विरोध न कर पाने की झिझक ने निश्चित ही मुझे भी कमजोर बनाया होगा।‘ बचपन की यह गं्रथि जैसे मनुष्य पर ताउम्र हावी रहती है, अजीब-सा डर हमें कुछ बोलने से हमेशा ही रोकता है। वह व्यक्तित्व को इस कदर कुंठित करता चलता कि मनुष्य दोतरफा जीता चलता है और कुछ पता ही नहीं चलता। लेकिन वर्माजी के साथ ऐसा नहीं है। वे वही जीते हैं जो उनको जीना था बस एक डर सदा बना रहा!
‘मुझे बस जाकर प्रिंसिपल साहब को बता देना है और फीस जमा कर के नाम लिखा लेना है। आत्मविश्वास का यह आलम था कि मैं स्कूल तो जाता, लेकिन प्रिंसिपल साहब के कमरे में घुसने की हिम्मत नहीं पड़ती और घर आकर झूठ बोल देता। मुझे झूठ बोलने में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। आदतें अच्छी हों या बुरी बनती तो घर-परिवार और परिवेश में ही हैं। झूठ का पता लगने पर डांट खाने की भी आदत थी। तो डांट खाई और एडमीशन हो गया।’
ऐसे ही वर्मा जी का व्यक्तित्व बनता चला गया। वे अपने गांव से गोरखपुर और आनंद नगर, लखनऊ और कुछ दिन बलिया में नौकरी और गोरखपुर विश्वविद्यालय आ गए वहीं से फिर फ्रंास भी चले गए। लेकिन ग्रंथि बनी रही। शायद वह कभी खत्म ही नहीं हुई। इतिहास उनके जीवन का हिस्सा बनता चला गया और वह इस तरह बनता गया कि वर्मा जी इतिहास को अपनी नजर से देखने लगे और उनको यह आभास हुआ कि हमें जो पढ़ाया जा रहा है वह इतिहास नहीं बल्कि इतिहास के नाम पर कचरा है। जिसका मनुष्य के संघर्ष से कोई रिश्ता नहीं है। इतिहास केवल राजा-महाराजाओं की ऐशगाह नहीं है। इतिहास मनुष्य के संघर्ष की अनवरत चेष्टा और सर्जन सौंदर्य है। लेकिन उनको हमेशा अच्छे अध्यापक मिले, जिनके वे हमेशा ऋणी रहे।
‘शाम को मैं हॉकी, फुटबाल भी खेलता था, पर स्कूल में विशेष परिचय परीक्षा में अच्छे नंबर पाने के कारण बन गया था। इसके लिए मैं कोई विशेष परिश्रम तो करता नहीं था, क्योंकि जीवन भर पाठ्यक्रम की पुस्तकों ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया। हां पाठ्येतर पुस्तकें खूब पढऩे की ललक थी जो आज भी कायम है। शायद मां से विरासत में मिली हो। मेरे अच्छे नंबरों का मुख्य श्रेय उस समय के वास्तव में कुशल शिक्षकों को है, हिंदी, अंग्रेजी, भूगोल और विज्ञान के हमारे शिक्षक इतने कुशल थे कि जो पढ़ाते मानो क्लासरूम में ही याद हो जाता।’
शिक्षा के हालात और युवावर्ग की रुचि दोनों में कितना फासला है? वैसे भी जो शिक्षा हमारे व्यक्तित्व का एकांगी विकास करती हो उससे बहुत ज्यादा उम्मीद भी कैसे संभव है? जिस तरह का तंत्र हम विकसित कर रहे हैं उसमें शिक्षक की योग्यता का कोई महत्व नहीं रह गया है? यहां तो बस डिग्री चाहिए। वैसे समाज में मूल्यों का हस हुआ लेकिन शिक्षा में अगर आप गुणात्मकता को अस्वीकार करते हैं तो उसका परिणाम क्या होगा? कहा जाए कि हमने ऐसी तकनीक को अपनाया है जिसमें मनुष्य का व्यक्तित्व खत्म होता जाता है और उसे इसका पता तक नहीं चलता। बाजार और राज्य ने मिलकर शिक्षा को अनुपयोगी और धंधा बना दिया है जिसका परिणाम समाज को झेलना होगा।
अपने एक मित्र के बारे में वे इस तरह बताते हंै- ‘स्कूल से निकाले जाने के बाद निहाल की घर और मोहल्ले में स्थिति बुरी हो गई, अपराध को देखने का हमारे समाज का नजरिया अभी नहीं बदला है। वे मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री जो जान गए है कि अपराध सारत: एक सामाजिक रोग होता है और कोई अपराधी केवल इसलिए नहीं बन जाता कि उसमें अपराध करने की प्रवृति है। अपराध के कारण सामाजिक होते हैं, वे भी अपने सामान्य जीवन में अपराधी को व्यक्तिगत रूप से ही जिम्मेदार मानते हैं। ऐसे में उस जमाने में निहाल को तरेरती आंखें कैसे जानने की कोशिश करती कि उसका जुआ खेलना अपराध नहीं मनहूस और नीरस जीवन से उत्तेजक पलायन मात्र था।’
जिस समाज में इतने अच्छे संस्थान हो वहां भला बुरे लोग कैसे पैदा हो सकते हैं? हमने बुरे लोगों को पैदा करने के लिए कुछ भी नहीं किया फिर भी समाज नाम की फैक्टरी में वे हर युग में पैदा होते जाते हैं और हम कुछ भी नहीं कर पाते। ऐसे में जब समाज में परिवर्तन होता है तब इस तरह का वातावरण पैदा किया जाए कि जिससे इन कुप्रवृतियों को समाप्त किया जाए। लेकिन हम वहां से देखने के आदी ही नहींहैं। हम वैसे ही देखते हैं जैसे हमें देखना सिखाया गया है। हमें पहले से ही दिखा दिया गया कि हमें कैसे देखना है और कैसे किसी की व्याख्या करनी है। नया सोचने और नया करने से तंत्र डरता है इसी कारण वह कदम-कदम पर पहरे लगाए बैठा है।
वर्मा जी अपने बारे में कुछ ऐसा ही कहते हंै-‘किशोरावस्था में ही प्राय: खोखली आदर्शवादी नैतिकता का ऐसा चस्का लगा कि वही पहचान बन गई। और जिससे मैं आज तक मुक्त नहीं हो पाया हूं। इसने मेरी जिंदगी को जितना छलपूर्ण बनाया है उसे मेरे अलावा कौन जान सकता है?’
‘नैतिकता का मुखौटा लग जाए तो दोस्त भी इज्जत करने लगते हैं। यानी उनसे भी पूरी अंतरंगता नहीं बन पाती। आप अपनी क्षुद्रताएं किसी को बता नहीं सकते। और फिर जीवन असहाय और असहज होता जाता है।’
आत्मकथा में जितनी जिंदगी की कहानी है उससे ज्यादा इतिहास की व्याख्या है। बार-बार इतिहासकार बोलने लगता है। तरह-तरह से इतिहास की संकीर्ण व्याख्याओं को वे चुनौती देते हैं। जर्मन दार्शनिक हेगल का कहना है कि ‘इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि हम इतिहास से कोई सबक नहीं लेते।’ यह उनके बारे में हैं जो इतिहास को एकांगी देखते रहे हैं या कि उससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं है।
सत्ता की भूख को वे इस तरह देखते हैं सत्ता और उसका नशा और फिर सद् इच्छाओं की बलि ‘एक जमाने में बीड़ी पीते हुए बड़े हुए कवि श्रीकांत जब सत्ताधारी हो गए तो कभी-कभी छटपटाहट महसूस करते। ‘मगध’ नाम से छपी उनकी कविताओं में पराजित सद्च्छिाओं की मर्मांतक चीख चुनाई पड़ती है।’
सत्ता का चरित्र ही होता है कि वह आपको अपने विपक्ष में कभी-भी स्वीकार नहीं करती। इसी कारण बुद्धिजीवी को अपनी उस व्यापक सोच से सत्ता विचलित करती है। लेकिन बुद्धिजीवी प्रतिपक्ष ही होता है, उसका वही बने रहना उसके होने का सबूत है। सत्ता के पक्ष में बोलना और खुद सत्ता बन जाना दोनों में बड़ा फर्क है। श्रीकांत वर्मा को यह बात बहुत बाद में समझ आयी तब तक समय बहुत निकल गया था। सत्ता का प्रतिरोध निरंतर आवश्यक है? सत्ता कभी-भी अपनी सीमा रेखा लांघ सकती है! आत्मालोचन सत्ता का हो या व्यक्ति का, सदैव समृद्ध ही करता है। स्वयं की सीमाओं से परिचित कराता है। उसके मानवीय पक्ष को जिंदा रखता है।
वर्मा जी छात्र राजनीति में निरंतर सक्रिय रहे और वे इस काम को बहुत मन से करते रहे। उनका वह कोमल मन हमेशा उस प्रवाह में बहता रहा, वे किसी न किसी रूप में उस भोलेपन को जिंदगीभर बचा पाए यह उनके होने और बनने को बखूबी बताता है। वे अपनी ही गलतियों को स्वीकार करते हैं। अपनी उस कमजोरी और कमजोर ग्रंथि को भी सहजता से स्वीकार करते हैं। जिंदगी से टकराते ही रहे, कभी रूके नहीं। जिंदगी उनके आगे हमेशा नतमस्तक ही रही। यह उनका जमीन से जुड़ाव और खुली सोच का परिणाम ही है। वे वामपंथ की राह पर चलते रहे। कभी रुके नहीं, राह छोड़ी भी नहीं। जिंदगी में जहां भी रहे सक्रिय रहे। काम करते रहे और यही उनको सक्रिय रख पाया। अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए वे निरतंर संभावनाओं को संभव करते रहे। स्वभाव में सरलता और अपने को उसी जुनून के साथ प्रस्तुत करना बहुत कम लोगों के लिए संभव होता है। लोग बहुत जल्दी ठहर जाते हैं। उनमें यह ठहराव नहीं है। गति जीवन और जुनून को संभव करती है। वही हमें सदैव सक्रिय रखती है।
भारतीय समाज के बारे में उनकी यह टिप्पणी जो सच है- ‘वास्तविकता यह है कि भारतीय समाज में ब्राहमणवाद के साथ-साथ पितृसत्ता का साम्राज्य कायम है। और अधिकांश मर्द, चाहे कितने प्रबुद्ध और राजनीतिक हों, नारी को बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं, न बाहर न घर में। आंकड़े यही बताते हैं कि अधिकांश लड़कियों के साथ यौनिक हिंसा होती है और वह भी प्राय: निकट के पुरुषों के द्वारा।’
जिस तरह की सामाजिक व्यवस्था है शिक्षा और उसका मॉडल कैसे हमें ढोना होता है उसके बारे में वर्मा जी सच कहते चलते हैं -‘एक चीनी इतिहासकार ने सच ही कहा था इतिहास की किताबें टेलीफोन की डायरेक्टरी लगती है। ऐसा क्यों न हो जब इतिहास केवल अतीत की राजनीति  (पास्ट पॉलिटिक्स) मात्र हो और उसका जीवन से कोई जीवंत संबंध न हो? इतिहास याद करने के विषय के रुप में बदनाम रहा है, जबकि वह जानकारी नहीं समझदारी का विषय है, किसी भी तरह की समझदारी का आधार।’
एक इतिहासकार के रूप में उनका यह कहना कहीं से भी गलत नहीं है। शिक्षा की हालत यह है कि सब कुछ को ठेला जा रहा है। उससे आगे कुछ नहीं। जैसे सभी किसी शाप को जी रहे हो कोई नया कुछ भी सोचने को तैयार नहीं है। सभी उसी लीक को पीट रहे हैं जिसका कोई अंत नहीं। समाज की हकीकत को वे इस तरह कहते हैं- ‘दरअसल मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी चूक मेरे घर में ही और पति-पत्नी संबंधों में ही उजागर हुई और वह है सहज संवाद का अभाव। संवाद के माध्यम से ही तो हम एक-दूसरे को जानते-समझते हैं, निकट आते हैं या दूर जाते हैं। संवाद के लिए ही तो शरीर भाषा और फिर शब्द-भाषा का आविष्कार किया और समृद्ध करता गया है।............पर अपने जीवन में चरितार्थ कर पाने में मैं कभी पूरी तरह से समर्थ नहीं रहा।’
छात्र जीवन में ही बहुत कुछ पढ़ लिया और फिर नौकरी भी समय पर मिल गई, नौकरी के बाद फ्रांस भी चले गए। कहा जाए कि वहां जाने के बाद तो वे पूरी दुनिया का भ्रमण कर आए। इस तरह भारतीय समाज और दुनिया के बाकी समाजों से वे निंरतर परिचित होते रहे। यह उनको बहुत कुछ देता चलता है। फ्रांस में पढऩे गए और इनके पास पैसा नहीं था या बहुत कम हुआ करता था तो इन्होंने वहां के गांवों में जाकर खेतों में काम तक किया था। यूरोप में रहते हुए तूलिका सदैव उनके साथ रही। यह वह दौर भी था जब फ्रांस में छात्र आंदोलन अपने चरम पर था और सात्र्र उसके हीरो थे। सत्ता को चुनौती देते हुए वे जिस तरह से जनहित की बात कर रहे थे और सात्र्र जैसा बुद्धिजीवी इसको नेतृत्व प्रदान कर रहा था। लोग सात्र्र के दीवाने थे। यह परिवर्तन का दौर था जहां वे सवाल सबसे ज्यादा केन्द्र में थे जिन पर सत्ता बात करने से सदैव डरती रही।
आत्मकथा को पढ़ते हुए यूरोप के बारे में बहुत कुछ समझ आता है। वर्मा जी के द्वंद्व नैतिकता को लेकर सवाल और यूरोप और भारतीय समाज के नैतिकता के मानदण्ड कैसे भिन्न हंै।? वे तूलिका को लेकर इस ग्रंथि में रहे भी। पर यह नैतिकता का दायरा ही ऐसा है कि उसको अतिक्रमित बहुत कम ही लोग कर पाते हैं। फ्रांस से शिक्षा पूरी कर हिंदुस्तान लौटने तक की कहानी है यह। दूसरा खंड भी आनेवाला है। एक तीस बरस का लडक़ा जिसने वह सब कुछ प्राप्त किया जो चाहा, वह अपने देश लौटता है और फिर से जुट जाता है अपने काम में। जीवन के सहज प्रवाह में। कभी-भी जीवन वैसे नहीं जीया जिस तरह से सुनियोजित जीया जाता है। कितना सच है कितना झूठ है वह सामने है। लेकिन वर्माजी अपनी कमजोरियां और गलतियां सदैव स्वीकार करते चलते हैं और सहजता के साथ।