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Monday 20 Nov 2017

बाबू समझो इशारे: नए शिल्प के धारदार व्यंग्य


गुरमीत बेदी
सेट नंबर- 8 टाईप- 4, डीसी कालोनी ऊना-174303 हिमाचल प्रदेश
मो. 9418033344
व्यंग्य रचनाएँ हमारे भीतर गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने भी ला खड़ा करती हैं जिनसे हम आए दिन दो-चार होते हैं। व्यंग्य लेखन समाज की पीड़ा को अभिव्यक्ति भी देता है और समाज को उद्वेलित करके उसे झिंझोड़ता भी है। असली व्यंग्य वही है जो अंतस को गहरे तक स्पर्श करे। समकालीन मूल्यों के विघटन को केन्द्र में रखकर समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में लगातार व्यंग्य लेखन हो रहा है। भाषायी तेवर, शिल्प की सजगता और वैचारिक चिंतन के जरिए घटनाओं व स्थितियों के सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं की पड़ताल न केवल व्यंग्य को लगातार समृद्ध कर रही है बल्कि पाठकों में इसे और लोकप्रिय बना रही है। व्यंग्य को आज सामाजिक सर्तकता के हथियार के अलावा समाज के आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है।
          इस लिहाज से देखा जाए तो हरियाणा के व्यंग्यकार कुमार विनोद का पहला ही व्यंग्य संग्रह- बाबू समझो इशारे मारक क्षमता से लैस है। इसकी अधिकतर व्यंग्य रचनाएं अपने लक्ष्य को भेदने में सक्षम मिसाइलें हैं, जिनके प्रहार से बच पाना नामुमकिन है। पेशे से गणितज्ञ कुमार विनोद ने एक संवेदनशील कवि और शायर के रूप में तो अपनी पुख्ता पहचान बनाई ही है, लेकिन व्यंग्य को अपना औजार बनाकर कई चुटीली, नुकीली व भ्रष्ट तंत्र को तिलमिलाती रचनाएं भी पाठकों को दी हैं।  उत्तम अभिव्यंजना शैली और उपयुक्त विषयवस्तु के सामंजस्य के चलते बाबू समझो इशारे एक पठनीय व संग्रहणीय व्यंग्य संग्रह है। इस संग्रह की खास बात यह भी है कि व्यंग्यकार की सामाजिक दृष्टि साफ है। जितनी विविधता उनके विषयों में दिखाई देती है, उतनी ही उनके प्रस्तुतीकरण में भी झलकती है। लेखक ने सामाजिक सरोकारों को सदैव प्राथमिकता दी है। वैसे भी सामाजिक सरोकार का दूसरा नाम ही प्रतिबद्धता है और यह प्रतिबद्धता लेखक की कलम में झलकती है। इस संग्रह के व्यंग्य लेखों से गुजरते हुए शिल्प के अनेक प्रयोग भी देखने को मिलते हैं। व्यंग्य रचना- टमाटर आलू संवाद का सीधा प्रसारण हो या योगा फार डॉग्स, हिन्दी डे सेलीब्रेशन्ज हो या टोटका नींबू और मिर्च के फ्यूजऩ का, कुमार विनोद नए शिल्प के जरिए अपने व्यंग्य लेखन को धार देते और पाठकों को गुदगुदाते दिखते हैं।
            एक व्यंग्यकार को उपदेशक व समझौतावादी नहीं बल्कि जीवन मूल्यों के प्रति ईमानदार व विचारों से क्रांतिकारी होना चाहिए और ऐसे व्यंग्य लिखने चाहिए जिससे आम आदमी की पीड़ा को शब्द मिलें और भ्रष्ट तंत्र तिलमिला उठे। इस व्यंग्य संग्रह के जरिए व्यंग्यकार वर्तमान से मुठभेड़ करता हुआ दिखाई देता है। संग्रह की रचनाएं फूहड़ हास्य व हल्के-फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबरकर देशकाल और समाज के व्यापक प्रश्नों से जुड़ती दिखाई देती हैं। कुमार विनोद एक ऐसे व्यंग्यकार के तौर पर सामने आए हैं जिन्होंने व्यवस्था की विद्रूपताओं पर निशाना साधने के साथ-साथ स्वयं पर भी व्यंग्यात्मक प्रहार करने से कोई परहेज नहीं किया। इस स्वनिंदा या स्वयं पर हंस सकने की क्षमता ने भी उनके लेखन को अतिरिक्त धार प्रदान की है। कुमार विनोद ने जहां विसंगतियों के बीच पिसते जा रहे आम आदमी के दुख-दर्द को जीवंतता के साथ अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति दी है, वहीं पाठकों को किसी भी घटना को देखने का एक नया नजरिया भी दिया है। उनकी निगाह स्थानीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर भी रहती है। मानसून आयो रे , टेररिज्म डिप्लोमा का संशोधित पाठ्यक्रम, वर्दी मुशर्रफ  और मेरे बेटे की, इस संग्रह के ऐसे व्यंग्य हैं, जिनमें स्थानीय हुक्मरानों से लेकर अमेरिका तक उनके कटाक्ष के शिकार बने हैं। इन दिनों अखबारों व पत्रिकाओं में बहुतायत में ऐसे व्यंग्य लिखे जा रहे हैं जो व्यंग्य टिप्पणियों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं और कई बार तो पाठक को यह आभास तक नहीं होता कि वह व्यंग्य रचना से गुजरा है! व्यंग्य के नाम पर मात्र सपाट बयानी! लेकिन कुमार विनोद की दाद देनी होगी कि अखबारों के कालमों में छपते हुए भी उन्होंने अपना मुहावरा व व्यंग्य की धारदार शैली को नहीं बदला। उनकी कई रचनाओं में बहुत ही सूक्ष्म प्रतीक भी छिपे हैं। कुमार विनोद ने इस संग्रह की व्यंग्य रचनाओं में नाटकीय घटनाक्रमों के बीच पारिवारिक, सामाजिक, प्रशासनिक, राजनैतिक आदि अनेक विसंगतियों की पड़ताल की है।
 कुमार विनोद की व्यंग्य लेखन पर गहरी पकड़ और विषयों की विविधता के चलते उनसे लंबी व्यंग्य रचनाओं की भी आशा की जाती है। इस संग्रह में उन्होंने अपेक्षाकृत छोटी व्यंग्य रचनाओं तक खुद को सीमित रखकर एक तरह से अपनी प्रतिभा से अन्याय किया है। कुमार विनोद को व्यंग्य के क्षेत्र में लंबा सफर तय करते हुए लक्ष्य तक पहुंचना है तो उन्हें व्यंग्य जगत को लंबी रचनाएं भी देनी होंगी। बहरहाल यह संग्रह उनकी लंबी यात्रा के प्रति आश्वस्त करता है।