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Saturday 25 Nov 2017

शब्द को कालयात्री बनाती कविताएं

बी.एल. आच्छा
36, क्लेमेन्स रोड़ सरवना स्टोर्स के पीछे पुरूषवकम,चेन्नई (तमिलनाडु) पिन - 600007 मो. 94250-83335
समय और समय डॉ. दुर्गाप्रसाद झाला की सृजन-यात्रा का चयनित काव्य संकलन है। यों इन कविताओं में प्रकृति बिम्बों का गहरा सहकार है, परन्तु खडख़ड़ाते जीवन के स्पन्दन के साथ। ‘अक्षर और आदमी का रिश्ता’ इन कविताओं में धरती की भाषा बन जाता है, जहां पसीने का सौन्दर्यशास्त्र भी है, प्रकृति और प्रेम का रोमान भी है, इतिहास के मुर्दा शव को धकेलता वर्तमान भी है, जीवन के दर्दीले परिदृश्यों में जिजीविषा के संवेग हैं, अपने को पिघलाकर जीवन के लिए रस राग की सार्थकता की तलाश है, प्रेम की ऊष्णता में रिश्तों की भावसाध्य विविधता है, काल-लिपि में अभय मंत्र लिखती आत्म-आस्था है, त्रिशंकुपन को धकेलती सामाजिक प्रतिबद्धता है, बाज़ार की शक्तिमानता में उलझी आम आदमी की कसमसाहट खंडित आस्थाओं में अखंडित भाव पूर्णता की लय साधने की चाहत है। यही नहीं, अपने विसंगत समय में उन रागात्मक लयों का संधान करती काव्य आस्था है। कभी धूमिल ने लिखा था- ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है।’ श्री झाला लिखते है- ‘कविता लिखना/अपने आपको कविता बनाना है।’ यह भी कोई परिष्कारक शुद्धतावादी संस्कार नहीं, बल्कि संघर्ष, जुझारूपन, निर्भीकता और मानव की बेहतर नियति के लिए जीवन भरा जुनून है।
    यह संग्रह छह खंडों में विभक्त है- अपनी ज़मीन से गुजरते हुए, धूप और छांव के रंग, चेतना के स्वर, अक्षर और आदमी का रिश्ता, बहती एक नदी तथा यात्रा जारी है। पिछले दस काव्य संकलनों में से छह काव्य संकलनों की चर्चित कविताओं को इस संग्रह में समाहित किया गया है। अपने जीवन में सादगी और सरलता भावुकता और आक्रोश, लचीलेपन और प्रतिबद्धता से रचा-पचा डॉ. झाला का काव्य-संसार भी अपने तेवरों, संवदेनशील वैचारिकता, बदलाव की अनवरत चेष्टाओं और समता के लिए संघर्षशील आंदोलनों की अनुगूंज लिए हुए है। सृजन का यह ताप उनका काव्यगुण है, नीम के कड़वेपन और पलाश के दहकने की तरह। इसी ताप से, इसी काव्यगुण से वे अपने समय की पड़ताल करते हैं, जहां तितलियों के रंगीन पंख, गुलमोहर से झरते लाल फूल, रूपसी की लहराती वेणी में गुंॅथा फूल या कि सूरज-चांद की पीठ पर सवार काल-यात्री कहीं छिटक गये हैं और समय ‘जलती हुई सिगरेट की तरह कुछ उंगलियों में दबा हुआ है।’ कवि ने पेड़ के सादृश्य से अपने समय की गुत्थमगुत्था उलझनों को बदहवासियों को, सहचरत्व की साजिशों को रेखांकित किया है- ‘यह समय है/जब दरख्त पत्तों से उलझे हुए हैं/ और पत्ते/ दरख्तों की जड़ें काटने के काम में जुटे हुए हैं।’ इस विसंगत परिदृश्य में, मूल्यों के क्षरण और साजि़शों में भी सृजन का आंतरिक धरातल उस चिडिय़ा को खोजता है जो - घोंसला बनाने की उमंग लिए/ तिनकों की खोज में/ उड़ती चली जा रही है। ध्वंस और विखंडन का अपना समय, सृजन और अप्रतिहत जीवन-लालसा का अपना समय। यह अपने समय से आहत सपनों की व्यथा भी है और आकांक्षाओं से भरी जीवन-प्रत्याशा भी। इस संकलन की कविताओं में दो सिरे हैं, जहां कठोरता, कोमलता, उदासी, आह्लाद, विध्वंस सृजन, निराशा, रोमान जैसी विपरीतताओं में जीवन के अंधेरे-उजले मनोराग अन्तत: आकांक्षाओं में भविष्य को संजोते हैं।
    संग्रह की कतिपय कविताओं में प्रकृति, राग और रोमानीपन अपनी सारी तरलता के साथ स्पंदित है। ऐसा नहीं कि यह सब छायावादी उत्स के आखिरी अवशेष हों। अलबत्ता दृश्यों की चित्रमयी कल्पनाशीलता और भावमयी तन्मयता नये बोध के साथ इन कविताओं में पसरी हुई है। लेकिन यह प्रेम देह रूपों में न उलझकर रागात्मक विस्तार पाता है, धरती से आसमान तक। रोमान का यह रूप अपनी गंवई प्रतिमा में आद्र्रता के साथ खिला है ‘जब तुम गोबर सने हाथों से मेरे गालों को छू लेती हो/ मिट्टी की सारी महक/ मेरे प्राणों में समा जाती है’/ वहीं विराट-बोध में प्रकृति की रागात्मकता दर्शन की पृष्ठभूमि पाकर विराट धारा का छंद बन जाती हैं - देखो / मैं भी तो/ तुम्हारे इस विराट छंद से बंधकर/ सब कुछ से बंध गया हूं / और आत्म-मुक्ति का रस पीते हुए/ उस विराट धारा में बहने लगा हूं/ पर प्रेम की यह रोमानी उष्णता जब धरती का कठोर विस्तार बन जाती है, तो विविध रूपों में, विविध सादृश्यों के साथ किलकती है- प्रेम चट्टानों से झरनों की लड़ाई है/ अर्र्थों का रंगों में संवरना है / घोंसले का एक पूरी दुनिया बनना है/ चिडिय़ा का डाली पर फुदकना है/ यही नहीं, कवि के अपने मुश्किल समय में प्रेम में पड़ी दरारों और फांसों का गहरा अहसास है, पर प्रेम के आदिम और प्राकृतिक रंगों की चाहत उसका आंतरिक अभिलाष है- समय तो एक ख़ौफनाक दरार की तरह/ फैला हुआ है / मेरे और तुम्हारे बीच / कहां ढूंढू वेे टहनियां/ जो फूल और फलों के भार से / झुक झुक जाती हैं / और लताएं लिपट-लिपट कर जिनसे / उत्सव मनाती हैं।
    इस राग का जीवन बांध कवि को पसीने के सौन्दर्यशास्त्र की ओर ले जाता है, जहां अर्थ की विषम क्रूरताओं में उलझा मज़दूर-किसान है, शोषण के दांव हैं, बाजार की सर्वशक्तिमानता है, प्रकृति के रंगों पर कुल्हाड़ी की मार है, जंगलों को तिजोरियों में कैद करती पूंजी की अतृप्त लालसाएं हैं। कवि इन विसंगत परिदृश्यों में इसलिए लिखना चाहता है - क्योंकि कविता लिखना/ पसीने को मिट्टी के कण-कण में बोना है/ गेहंू की बाली में सूरज का मुस्कुराना है/ और किसान का धरती पर लहराती अपनी फसल से बातचीत करना है।
‘नई चेतना’ कविता में भी वह मज़दूर के हथोड़े की चोट और कृषक की हंसिया-कुदाली से फ़सल के देवता के साथ मदमस्त होकर गाना चाहता है।
    कवि की शब्द-संवेदनाओं के भीतर अभय का ओजस राग हर कहीं स्पंदित है, और वही सारे संघर्षों में, विरूद्धों में, अन्याय के विरूद्ध प्रतिकारों में, राजनीति और सत्ता के विरूद्ध व्यंग्यों में आचरण के द्वैत में, अपनी खडख़ड़ाती ध्वनियों के साथ सच का साक्षात्कार कराता है-
    जीवन का एक ही मंत्र है/ अभय/ जो मरण के द्वार की सांकल को तोडक़र/ बाहर निश्चिन्त चहल-क़दमी करता है/ हर उत्सव को अपना बनाता है/ और हवा में/ एक अक्षर     काल-लिपि लिख जाता है।
इस अभय मंत्र में शिव का तीसरा नेत्र भी समाया है और आसमान को अपनी बांहों में बांध लेने को मचलता हुआ सपना भी/ समझौतावादी तटस्थता, निर्ममताओं के विरूद्ध निर्विकार भाव, अमानवीयता के विरूद्ध मौन की भाषा, भलेमानुस का लबादा ओढ़ती भाषा के खेल, उसके रक्तमय शब्द-संचार से टकराते हैं और जिजीविषा के नये स्वरों में उमगता है, विफलताओं में भी सार्थकता का प्रतिमान रचता है। यह अनाहत आत्म आस्था उसे टकराने की ताकत भी देती है और सपनों को उगाने की शक्ति भी। इसीलिए इन कविताओं में राजनीति और सत्ता पर करारे व्यंग्य भी मुखर हैं - सत्ता है/ सच/ झूठ है/ बाकी सब/ हमारे लिए वही झूठ सच है / जो हमारे झूठ के पक्ष में / सीना तानकर खड़ा होता है।
मूल्यविहीन आदमखोर चरित्र, बाजारवादी कुचक्रों में चीज़ों के आगे सस्ता होते आदमी का अवमूल्यन, मुस्कुराते मुखौटों की उजली भाषा, भूखे आदमी के सामने मोक्ष का संदेश, तिजोरियों की गुमानभरी ताकत, अर्थजीवी समय में जीवन के अर्थ को खोती हुई मानसिकता निर्णयों में त्रिशंकु व्यक्तित्व कवि के व्यंग्य और प्रतिकार भरी आस्था के विषय बने हैं।
    श्री झाला की कविताओं में जीवन-राग ही शब्दराग बन गया है। उनकी सृजन-प्रक्रिया में भी जीवन के सारे कोमल राग, वात्सल्य भरी मुस्कानें, हरी पत्तियों का निष्कलुष प्यार, पेशानी पर चमकता पसीना, पीड़ा से जलता दीया, आंखों की अरूणाई, प्राणों का छंद और बांसुरी की तान, और तितलियों के इन्द्रधनुष एक चाहत भरा जीवन स्वप्न बने हुए हैं, जिसके समानान्तर एक असल दुनिया है जिसमें भरोसे पर भरोसा करना। ज़मीन में जडं़े जमाना और सिर तान कर खड़े होना दुश्वार हो गया है। पेड़ों को कोयल की वासंती वाणी के आह्लाद के बजाय कुल्हाड़ी की दहशत ज़्यादा है। बाज की चोंच में गौरैया के पंख फंसे हैं। ‘घायल जटायु’ की पीड़ा को समय रहते सुननेवाला कोई नहीं है। धूप में झुलसने, चांदनी में सरसाने और दूसरों की आंखों के पानी से करूणाद्र्र होने या बुझे हुए चूल्हे की आग से गर्माहट होने की संवदेनाएं अब आंदोलित नहीं करतीं। इस समय को जीते हुए कवि इन विडम्बनाओं को भी रेखांकित करता है - मैं रो रहा हूं / क्योंकि नहीं मिलता कोई / सुननेवाला शब्द को / मैं हंस रहा हूं/ क्योंकि हर तरफ / तारीफ़ हो रही है शब्द की।
लेकिन इन दो विरोधी परिदृश्यों में वह जीवन की लय को पाने के लिए जिजीविषा के साथ चल पड़ता है - मैं लिखना चाहता हूं/ एक कविता/ जिसमें एक आदमी/ अंधकार की पीठ पर सवार होकर/ पूरब की यात्रा पर निकल पड़ा हो/ जो दीये की लौ की तरह/ रात के काले डरावने सन्नाटे को/ चीरता हुआ गुनगुना रहा हो।
    इस संग्रह की कविताओं में कहीं आभूषणों के मायालोक और पूजा के श्लोकों में खोई विवश नारी है, तो तुलसी वंदन में रत्ना का शक्तिमय प्रेमबीज है। कहीं प्रकृति के मनोमय रंगों में विकसा प्रेयसी भाव है, तो कहीं तवे पर सिकती रोटी की गंध-सी चाहत का आंतर-आस्वाद। पर नारी की देह-भाषा भी उसके मनोमय भाव संवेगों में ही प्रेम की चाहत बन जाती है- आओ, हम तुम मिलें/ जैसे मिलता है सरोवर से हंस/जैसे मिलता है कविता से छंद/जैसे मिलती है हवा से गंध / आओ, हम तुम मिलें।
काव्य-भाषा की दृष्टि से इस संग्रह की कविताएं इंसान की सरलता और संवेगों की प्रवाहमयता से असरदार बनी हैं। शब्दावली में ऐन्द्रियता, चित्रमयता, आवेगपरकता और ज्ञान-संवदेनाओं को अपने रंग में रंग देने की आत्मिक क्षमता निश्चय ही विशिष्ट है। कवि के पास जितनी आग की भाषा है, उतनी प्राकृतिक रंगों की तरलता की। मधुरिमा के जितने रंग हैं, उतने ही आक्रोश के। नीली आंखों की जितनी आश्वस्ति है, भेडिय़ों, लकड़बग्घों की खौफनाक हंसी भी। जितना आत्मिक स्पर्श है, उतनी ही धर्म के आवरणों को खंगालने वाली भाषा भी। अरण्यानी की जितनी मधुर कूक और हरी पत्तियों की ताजगी है, बाज़ारियत के अफ़साने भी। कवि का दायरा और तद्परक भाषा का लचीला विस्तार कोमल-कठोर के दो छोरों को समेट लेता है। नये बिम्ब और सादृश्य-विधान इस सरल-सी काव्यभाषा को संप्रेषण-धर्मी बना देते हैं- झांक रही / आंखों की अरूणाई / बिखरे केशों के बीच / तुम्हारा प्यार/ रात की खामोशी है / जो एक ढिबरी की तरह मेरे अंधेरे में/ जलती रहती है / टपक पडऩा ओस-सा / निविड़ एकांत में/ अकेलेपन का कैसा/ अघोर आकाश बना देता है।
    संग्रह की कविताओं में समय का यथार्थ है और यूटोपिया भी। कसमसाते जीवन के आर्तस्वर हैं और उनसे निजात पाने की जिजीविषा भी। कवि शब्द को कालयात्री भी बनाता है और आह्वान-परक भी। कवि कहता है - मेरी जमीन है / मेरी कविता / और इस ज़मीन पर खिलता शब्दों का यह मधुरिम कसैला संसार उसके अपने समय के साथ जीने और उसके आस्वादों से रूबरू होने का यथार्थ है और बदलाव की चाहतों का संकल्पित आवेग भी। समय की हताशाओं और कविता से दूर होते जीवन के उपरांत भी उनकी कविताओं में जो ग्राम्य सहृदयता है, अपने स्थानीय भूगोल से जो सरोकार हैं, वादों की पोथियों से रूबरू होकर भी उनकी रचनाशीलता में जो अपनी अनुभूतिपरकता है, वह निश्चय ही इन कविताओं को विशिष्ट बनाती है।