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Sunday 19 Nov 2017

अक्कड़-बक्कड: चमकदार,निरीह-भद्र दुनिया पर व्यंग्य

 

डॉ. रमेश तिवारी
64-बी, फेस-2, डीडीए
फ्लैट, कटवारिया सराय
नई दिल्ली-110016
मो.  09868722444
अक्कड़-बक्कड़ सुभाष चंदर का एक नया व्यंग्य-उपन्यास है। यह उपन्यास ग्रामीण जीवन-व्यवहार और प्रवृत्तियों पर केन्द्रित है। मूल कथा ‘बंगलों का नंगला’ (जिसे ‘कंगलों का नंगला’ के नाम से प्रसिद्धि मिली है) और वहां के निवासियों को केंद्र में रखकर ही लिखी गयी है। बीच में उपन्यास के एक अंश (भाग-9) में गुन्नू नामक पात्र के दिल्ली-प्रसंग को प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास में पांडु, मेघनाद सिंह, गुन्नू आदि प्रमुख पात्र के रूप में सामने आते हैं। इस उपन्यास का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गुण उसकी पठनीयता है। प्रसंगानुरूप भाषिक प्रयोग और संवादों की रचना में सुभाष चंदर अपने समकालीन रचनाकारों से इक्कीस साबित होते हैं। हालांकि भाषाई शुद्धतावादी इस उपन्यास की भाषा को लेकर अपना असंतोष जाहिर कर सकते हैं। किन्तु हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रसंग के अनुरूप ही शब्दों का प्रयोग रचना में अपेक्षित होता है। जब हम गाँवों की भाषा के बारे में बात करें तो यह समझ में आयेगा कि उनकी भाषा में किन-किन शब्दों की आवृत्ति देखने को मिलती है और यदि रचनाकार प्रसंग के अनुरूप भाषिक प्रयोग ना करे तो उस पर भाषा के स्तर पर बेईमानी का आरोप भी लगाया जा सकता है। इसलिए कोई भी सजग समर्थ व्यंग्यकार विषय के अनुरूप ही भाषा का चयन कर प्रयोग करेगा। सुभाष चंदर भी इस उपन्यास में ऐसा ही करते हैं।
अक्कड़-बक्कड़ उपन्यास हमें श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी और ज्ञान चतुर्वेदी के बारामासी, हम न मरब आदि की याद दिलाता है। जहाँ कहीं भी ग्रामीण भाषा के वास्तविक रूप को, ग्रामीणों के संवाद को लेखक ने जम कर और ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का काम किया है वहाँ हम उपन्यास को बारामासी और हम न मरब के निकट देखते हैं और जब बात प्रवृतियों की दृष्टि से देखने की हो तो ‘राग दरबारी’ के निकट। कथावस्तु के केंद्र में गाँव है और ग्रामीण (विषय-वस्तु) प्रसंगों की प्रस्तुति के आधार पर यह उपन्यास व्यंग्य जगत में रागदरबारी और बारामासी की परंपरा को छूने की कोशिश करता दिखाई देता है। यह लेखन और हस्तक्षेप की दृष्टि से कितना सफल और सार्थक है, इसका फैसला तो पाठकों को करना है।
अक्कड़-बक्कड़ ग्रामीण जीवन शैली, मानसिक प्रवृत्तियों आदि की व्यंग्यात्मक प्रस्तुति करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास का प्राण-तत्त्व उसकी भाषा है जो प्रसंग, परिवेश तथा पात्रों के अनुकूल है। ग्रामीण जनों के संवादों में गालियों का चलन इतना आम है जिसे वो बेधडक़ प्रयोग करते हैं , लेखक ने इस उपन्यास में प्रसंग के अनुरूप ही नैसर्गिक सौन्दर्य को बचाए-बनाये रखते हुए भाषा की सहजता को कायम रखा है। उपन्यास का एक और गुण वचनवक्रता के साथ-साथ प्रसंगवक्रता का भी है। हम लोगों में जिनका सम्बन्ध गाँवों से रहा है वो भली-भांति जानते हैं कि भारत के अधिसंख्य गाँवों में एक-सी प्रवृत्ति ही दिखाई देती है, जैसे गाँवों में एक-दूसरे की टांग खींचने का ही मामला लें, इस प्रवृत्ति को लेखक ने भली-भांति पकड़ा और उभारा है। हम जिसे कंगलों का नंगला नाम से जानते हैं वास्तव में उस गाँव का नाम बंगलों का नंगला है। वो तो गांववालों का कमाल है जो गाँव का नाम बंगलों का नंगला से कंगलों का नंगला कर डालते हैं और वही सबकी जुबान पर चल भी पड़ता है। रागदरबारी में श्रीलाल शुक्ल ने भी इस प्रवृत्ति का उल्लेख किया है। याद कीजिये सनीचर को जिसका वास्तविक नाम मंगल प्रसाद है किन्तु गांववालों ने उसका नाम सनीचर रख दिया है।
वास्तव में  ‘बंगलों का नंगला’ गाँव और वहाँ के पात्रों के बहाने से गाँव का जीवन-व्यवहार, जातीयता, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पड़ोसी गाँवों (जलालपुर आदि) के प्रति लोक-दृष्टि को लेखक ने इस उपन्यास का व्यंग्य-विषय बनाया है। ‘कंगलों का नंगला’ के ही एक नौजवान पांडु की दिली तमन्ना पुलिस में भर्ती होने की है, पांडु को पुलिस वालों की जीवन शैली बहुत पसंद है। जिसको चाहा पीट दिया, जिसको चाहा डंडा दिखाया, जब जहां चाहा उठाया-बैठाया, इसलिए पुलिस की ही नौकरी के लिए पांडु लालायित हैं। देर-सबेर नौकरी पाते भी हैं किन्तु इन सबके साथ और भी मजेदार  प्रसंग और घटनाएँ हैं जो साथ-साथ चलती हैं,  जिनको समेटे यह उपन्यास शुरू से आखिर तक चलता है। उदाहरण के रूप में हम देखते हैं कि पांडु जिस थाने में ड्यूटी ज्वाइन करने जाते हैं वहां उन्हें पुलिस नहीं बल्कि चोर समझ लिया जाता है। वास्तव में व्यंग्य ऐसे ही विद्रूपों से जन्म लेता है। अक्कड़-बक्कड़ का रचनाकार इस तरह के प्रसंग निर्मिति में सिद्ध है। भाषा के शिल्प और कथाप्रवाह में रचनाकार अपने समकालीनों से कहीं भी उन्नीस नहीं प्रतीत होता है, यह उसका विशेष गुण है, जिसे आज के युवा लेखकों को सीखने की जरूरत है।
इस उपन्यास के द्वारा सुभाष चंदर व्यंग्य के नए मुहावरे गढऩे की दिशा में एक नया मुकाम हासिल करते हैं। अब तक हम उम्मीद की किरण ढूंढते आये हैं। सुभाष इस उपन्यास में उम्मीदों के सूरज की तलाश करते हैं। वे ग्रामीण परिवेश, समाज, संस्कार, आदि से पाठकों का साक्षात्कार कराते हुए उम्मीद की किरणों को पीछे छोड़ देते हैं और उम्मीदों के सूरज की तलाश शुरू कर देते हैं। गाँववालों की ग्रामीण-विनोदी मानसिकता भारत के किसी भी दिशा में, किसी भी गाँव में चले जाइये, वहाँ आपको इस प्रवृत्ति के प्रमाण मिल ही जायेंगे। ग्राम्य जीवन में एक यह सच है जो लेखक पाठकों को दिखाना चाहता है। दूसरा सच है पड़ोसी के प्रति गाँव के लोगों की मानसिकता। पड़ोस के गाँव जलालपुर से दुश्मनी निभाने की प्रवृत्ति का पर्याप्त उदाहरण है। इन प्रसंगों में परिस्थितिजन्य विद्रूपता भी दिखाई देती है। भूलना न होगा कि विद्रूप की चमक और भद्रता की निरीहता आज के ही समाज की देन है। अत: लेखक ने इस प्रवृत्ति को पूरे उपन्यास में फोकस किया है। चाहे वह बंगलों का नंगला में जलालपुरिये के स्वागत-सत्कार का उदाहरण हो या ठाकुर मेघनाद सिंह के दबंगई भरे व्यक्तित्व के वर्णन का प्रसंग।
ठाकुर मेघनाद सिंह के शौर्य का प्रसंग भी कम व्यंग्यपरक नहीं है - उनके बारे में मशहूर है कि जिस नार पे उन्होंने नजर डाल दी, वो फिर अपने भरतार की ना रही। ऐसी नारियों की संख्या आसपास के सात-आठ गांव मिलाकर सिर्फ तीन दर्जन भर है। संख्या और भी बढ़ सकती थी, पर जैसा पहले बताया कि वो काफी बिजी रहते हैं, समय की उनके पास कमी है। फिर भी उन्होंने जो कीर्तिमान बनाये हैं, उन्हें तोडऩे में शम्सु से लेकर गुन्नू तक दर्जनों छोकरे प्रयत्नशील हैं पर ये रिकॉर्ड उनसे ना टूटेगा, इसकी गारंटी उनके सगे यार-दोस्त भी ले सकते हैं। (पृष्ठ 73-74)
इस वीभत्स सचाई ने धर्म-कर्म का आवरण भी ओढ़ रखा है। इसी को प्रमाणित करते हुए लेखक कहता है कि मेघनाद केवल ब्याहता औरतों का ही शिकार करते हैं, कुंवारी कन्याओं को वे देवी का रूप मानते हैं। देवी की अष्टमी पर बाकायदा उन्हें भोजन कराकर उनके चरण छूते हैं। (पृष्ठ 74)
गाँव ही नहीं बल्कि हर जगह नकारात्मक शक्तियाँ इतनी हावी हैं कि सकारात्मक शक्तियां दिखाई ही नहीं पड़ती हैं। मेघनाद सिंह जेल से छूटकर मुखिया की खुली जीप से शाही अन्दाज में जुलूस की शक्ल में अपने गांव-घर आता है। उस समय चारों तरफ गांव-समाज में सबकी जबान पर मेघनाद की ही चर्चा है मानो कोई बहुत बड़ी जंग जीत कर लौट रहा है मेघनाद सिंह। हफ्ते भर से गाँव में बिजली का न होना, स्कूल में मास्टर का न होना मुद्दा नहीं है, मुद्दा है जेल से छूटकर मेघनाद सिंह की गांव वापसी। इन परिस्थितियों में जो विद्रूपता जन्म लेती है उसे रचनाकार पाठकों के समक्ष बड़ी ही संजीदगी से प्रस्तुत करता है।
इन प्रसंगों की प्रस्तुति से रचनाकार पाठकों को यह दिखाता है कि जनता के लिए ये नकारात्मक शक्तियां चर्चा और आकर्षण का केंद्र कैसे बन जाती हैं और इनकी बढ़ती ताकत के पीछे और कुछ नहीं बल्कि जनता की चुप्पी ही महत्त्वपूर्ण कारण है। लेखक जनता की इस चुप्पी पर व्यंग्य करते हुए कहता है -भीड़ का मानना था कि जो होता है, वह भगवान की मर्जी से होता है और हिंदुस्तान में भगवान की मर्जी के काम में दखल देने का रिवाज कतई नहीं है। इसलिए सीताएं चीखती-चिल्लाती रहीं, रावण ठहाके लगाते रहे और तमाशबीन आराम से तमाशा देखते रहे। (पृष्ठ 84)  
अक्कड़-बक्कड़ में अपराध और राजनीति के गठजोड़ पर संक्षेप में लिखा गया है। मुझे लगता है कि इन बिन्दुओं पर और विस्तार से व्यंग्य रचा जा सकता था। गाँव में प्रधानी का इलेक्शन प्रसंग और राजनीति का चित्रण भी उपन्यास में आते-आते 116 पृष्ठ निकल चुके होते हैं, अत: इस विषय को उपन्यास में जितना विस्तार मिलना चाहिए था उतना नहीं मिल पाया है। राजनीति कैसे गाँव में व्याप्त भाईचारा को ख़त्म करती है,  झूठे मुकदमों की बाढ़ लाती है। इन बिन्दुओं को जिस प्रकार से संकेतों में व्यक्त करते हुए रचनाकार आगे बढ़ गया है, मेरी दृष्टि में यह उपन्यास का दुर्बल पक्ष कहा जा सकता है। इन बिन्दुओं से सम्बंधित प्रसंगों की निर्मिति और संवादों के द्वारा उपन्यास को और भी मजबूती और प्रासंगिकता प्रदान की जा सकती थी। बहरहाल !
इस सन्दर्भ में एकाध उदाहरण देना चाहूँगा, पृष्ठ 118 पर एक प्रसंग है -नंगला ग्राम पंचायत के चुनावों में ठेठ राष्ट्रीय चुनाव नीति का अनुपालन करता था मतलब वहां भी जाति के आधार पर वोट डालने की प्रथा थी जिसकी जाति के लोग ज्यादा, उसके जीतने के आसार ज्यादा। मुखिया पिछले दो इलेक्शन इसी चक्कर में जीत गए थे। पर इस बार मामला गड़बड़ था। उनकी जाति के कुछ लोग बकौल उनके, शहर चले गए थे जिनके इलेक्शन के दिन आने की संभावनाएँ काफी महँगी पड़ सकती थीं। (पृष्ठ 118) जाति-प्रथा का जो मुद्दा लेखक ने इस प्रसंग में उठाया है वह पूरी तरह मौजूं है । इसी प्रकार पृष्ठ 120 पर जब पांडु मुखिया के दरबार में पहुँचते हैं तो उनके और मुखिया के बीच सम्वादों द्वारा और प्रभावशाली व्यंग्य रचा जा सकता था। आखिर व्यंग्य के लिए मुख्य उपकरण तो उसकी भाषा ही होती है।
कई ऐसे अंश मौजूद हैं जिनसे इस उपन्यास को मजबूती मिली है। पृष्ठ 121 के अंतिम अनुच्छेद को ऐसे ही अंशों में गिना जाना चाहिए। आप भी देखें- अगले दिन से नंगला के चुनाव कार्यक्रम में तेजी आ गयी। नारों की फसलें बोई जाने लगीं। आश्वासनों का यूरिया बिखर गया। नेताजी को संघर्ष के लिए उकसाने का दौर शुरू हो गया। मुर्दों को वोट डालने के लिए तैयार किया जाने लगा। आश्वासनों की रेवडिय़ाँ बँटने लगीं। भुखमरी के तालाब पर पुल बंधने लगे। खड़ंजे-सडक़ों का हेमा मालिनी के गालों से कम्पटीशन कराने का दावा जोर पकडऩे लगा। जुबान की गाड़ी पर वादों की रेल चलने लगी। अपने गुण गुणा होने लगे, विरोधी के भाग होने लगे। बिरमा के द्वारा मेघनाद सिंह की हत्या का प्रसंग सांकेतिक रह गया है। मेरी राय में इसे थोड़ा और विस्तार दिया जाना चाहिए था। हाँ, गाँव में लकडबग्घा के द्वारा पहले एक बच्चे को और अंत में बकरी के मेमने को उठा ले जाने की घटना और गाँव वालों का मुखिया सोबरन सिंह की जीत के जश्न में डूबा होना, बच्चे को लकड़बग्घे द्वारा उठा ले जाने की खबर पर गाँव वालों की कोई प्रतिक्रिया का न होना व्यंग्य को चरम पर ले जाता है। इसी चरम दशा में लेखक इस उपन्यास को समाप्त कर पाठकों को ‘पिन ड्राप साइलेंस’ के माहौल में छोड़ जाता है। लेखक द्वारा इस घटना को ‘चिरकुट घटना’ कहना उत्कृष्ट व्यंग्य का संकेतक है और उससे भी उत्कृष्ट यह कि ‘‘नंगला में चिरकुट खबरों पर ध्यान देने की फुर्सत किसे है?’’(पृष्ठ 125) यानी जो महत्त्वपूर्ण खबर है वह कैसे हाशिये पर चली जाती है और अनावश्यक खबरें कैसे हमारी जिंदगी में अपनी पैठ बनाती जाती हैं इस एक पंक्ति और प्रसंग के द्वारा इस पर लेखक ने बेहतरीन व्यंग्य किया है।
कुछ प्रसंगों में कहे गए व्यंग्य कथन बड़े प्रभावशाली बन पड़े हैं जो इस उपन्यास की उपलब्धि कहे जा सकते हैं। ऐसे उदाहरणों में कुछ निम्नलिखित हैं - दलालों के लिए पांडु का कथन है -बेईमानी के धंधे में ही ईमानदारी की गुंजाइश बची है। बाकी सब जगह तो अंधेर है। (पृष्ठ 135)
बलभद्दर चच्चा उफऱ् रिटायर्ड हेड कांस्टेबल बलभद्र सिंह ने अपने ज़माने में नंगला गांव को काफ़ी इज्जत बख्शी थी। वह खांटी ईमानदार पुलिसिये माने जाते थे यानी जिससे पैसा लेते थे, उसका काम जरुर करते थे।.......बलभद्दर सिंह आदमी बढिय़ा थे और ठाकुर मेघनाद सिंह के शहीद होने के बाद, नंगला की शान का झंडा करीने से उठाये हुए थे। (पृष्ठ 136)
और तो और पुलिस की ड्यूटी में रात को रिपोर्ट करने जाने पर चोर होने के शक में पुलिस वालों के हाथों पांडु पिट जाते हैं। जब अपनी सफाई थानेदार को देते हैं, उस समय का दृश्य बड़ा ही व्यंग्यात्मक है- थानेदार ने सारी कहानी सुनी पर हँसने से परहेज रखा। मामूली सिपाहियों के सामने दांत फाडऩा, किसी भी अफसर के लिए शर्म की बात होती। मामला प्रोटोकॉल का था जिसमें नेताओं के आगे दुम हिलाने और जूनियरों पर गुर्राने का विशेष प्रावधान होता है । (पृष्ठ 153)
इस संग्रह में प्रूफ सम्बन्धी कुछ अशुद्धियां रह गयी हैं, जिनका सुधार संभवत: अगले संस्करण में कर लिया जायेगा। वगैरह के बदले वगैरहा और अंतर्धान के बदले अंर्तध्यान बार-बार प्रयोग किया गया है जो अशुद्ध है। पृष्ठ 81 पर मुल्तवी के बदले मुल्लवी शब्द का प्रयोग किया गया है, यह भी अशुद्ध है। इसी प्रकार पृष्ठ 122 पर कुसुमा देवी पत्नी छुट्टन के स्थान पर कुसुमा देवी पुत्री छुट्टन छप गया है। इन अशुद्धियों के परिमार्जन से रचना को और अधिक सम्प्रेषणीय और प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
हम सबको सदा ही यह स्मरण रखना नितांत अनिवार्य है कि कोई भी रचना अपने सकारात्मक-नकारात्मक पक्षों के साथ ही सम्पूर्ण होती है और किसी भी विषय, व्यक्ति, वस्तु, रचना आदि की स्वीकृति समग्रता या पूर्णता के साथ ही होनी चाहिए। अक्कड़-बक्कड़ उपन्यास को भी उसकी सम्पूर्णता में पढ़ा-समझा जाना चाहिए। मुझे उम्मीद है यह व्यंग्य-उपन्यास अपनी विशिष्ट कथाभाषा और ग्रामीण जीवन की रोचक प्रस्तुति के कारण पाठकों के बीच बहुत पसंद किया जाएगा।