Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

कोलकाता यात्रा की उपलब्धि: मदर हाउस की जियारत


मेराज अहमद
हिन्दी विभाग,
ए एम यू अलीगढ़
कोलकाता की यात्रा की योजना मेरे बड़े बेटे अशार के आग्रह पर बनी। हालांकि मैं तीन साल पहले भी अपने तीन शोधार्थियों के साथ कोलकाता जा चुका था, लेकिन उस समय हम लोग राष्ट्रीय पुस्तकालय तक ही रह गये थे। केवल एक दिन का समय निकालकर चिडिय़ाखाना और विक्टोरिया मेमोरियल देखने गये। बाकी ट्राम और मेट्रो की यात्रा की। लगभग तीन वर्ष बाद अशार बारहवीं कक्षा में आ गये। इस बीच संचार माध्यमों से आपसी संपर्क के क्षेत्र में क्रांति सी आ चुकी थी। उसी में से एक के द्वारा कोलकाता में रहने वाली उनकी एक मौसी की हमउम्र लड़कियों से उनका संपर्क हुआ। उम्र का तकाजा कहिए या अशार का भोलापन! वह उन लोगों से मिलने के लिए उतावले हो गये। मेरी जाती आयु में उभरी पर्यटन की रुचि या फिर बेटे के आग्रह के कारण सपरिवार कोलकाता जाने का निर्णय हुआ। वह तो उसी समय जाने के लिए उतावले हो रहे थे लेकिन समझाने-बुझाने और उनकी पढ़ाई और छुट्टियों का हवाला देकर अक्तूबर में तीन महीने बाद जाने की योजना बनी। टिकट उसी समय बुक करवा लिया तो उनको तसल्ली हुई। उनकी नानी सेवानिवृत्त अध्यापिका, मेरी सास और अशार की मौसी की मामी श्रीमती नूरजहाँ बेगम का भी आरक्षण साथ ही हुआ। इस बात से छोटे साहबजादे अम्मार भी खुश थे। जीवन संगिनी समीरा की प्रसन्नता के कहने ही क्या! वह तो इस निर्णय से बिना पर ही आसमान में उडऩे लगीं।
दरअसल अक्तूबर के आरम्भ होते ही हमारे विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद की जयन्ती के भव्य समारोह की तैयारियाँ आरम्भ हो गयीं। आवासीय व्यवस्था के तहत एक हाल (कई हॉस्टल का समूह जो कि छात्रों के आवास भोजन एवं कई एक प्रशासनिक व्यवस्था को संचालित करने की इकाई होती है। इसमें छात्रों को पठन-पाठन की गतिविधियों के अतिरिक्त खेल-कूद, साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार से प्रशिक्षित किया जाता है कि भविष्य में वह देश की उन्नति एवं विकास में अपनी भूमिका निभा सकें।) की जिम्मेदारी होने के कारण मेरी व्यस्तता काफी बढ़ गयी। शांति और सफलता के साथ आयोजन के समाप्त हो जाने के कारण आश्वस्ति के भाव के साथ यात्रा पर निकलते समय मैं बेफिक्र था। अशार की नानी आने के बाद बीमार हो गयीं, उनका मन थोड़ा घबरा रहा था, लेकिन वह भी जाते-जाते स्वस्थ हो गयीं। तीन घंटे की देरी के साथ हम लोग अपने गंतव्य यानी हावड़ा स्टेशन पर आठ बजे पहुँचे। वहाँ से दो टैक्सियों के द्वारा समीरा की बहन के यहां गये, एक बेटा दो बेटियों और पति-पत्नी सहित परिवार हम लोगों की प्रतीक्षा कर रहा था। कोलकाता जैसे शहर में पाँच लोग किसी के यहाँ रहेंगे! पाँच दिन के लिए ही सही! मैं संशय में था। महानगरों में रहने की परेशानियों से मैं वाकिफ  भी था। हालांकि उनकी मौसी ने बार-बार कहा कि रहने की कोई परेशानी नहीं होगी, लेकिन यह बात मुझे औपचारिकता ही लग रही थी। उनका घर और उनके स्वागत के उत्साह को देखकर हमारी शंका निर्मूल साबित हुई। तीन बेडरूम और दो हाल का डुप्लेक्स फ्लैट था। हम लोग किसी भी तरह स्वयं को एडजेस्ट करने की मानसिकता से आये थे। यहां तो दो कमरे हमारे हवाले हो गये। देर रात तक पारिवारिक बातें होती रहीं। समीरा की बहन के यहाँ बहुत दिनों बाद उनके मायके के पक्ष से कोई आया था। इधर उनके यहाँ कुछ पारिवारिक विवाद भी था। अपने सुख के साथ दुख बाँट कर वह और उनके पति कुछ हलके से लग रहे थे।
दूसरे दिन यात्रा की थकान उतरने के बाद लगभग ग्यारह बजे हम लोग जाजिब, अरीबा और ऐमन के साथ सांइस सिटी के लिए टैक्सी से निकले। दूरी कम थी इसलिए टैक्सी वाले ने बजाय मीटर के तैशुदा भाड़ा लिया जो अधिक था, लेकिन हम लोगों की संख्या के कारण ठीक ही लगा। साइंस सिटी में विज्ञान से सम्बंधित इतना कुछ है कि पर्यटक आश्चर्यचकित हो जाये। सबकुछ इतने सरल तरीके से प्रस्तुत किया गया है कि हम आसानी से समझ पाते हैं कि जो ये हम सब अपने चारों ओर हम देख रहे हैं इन सबमें विज्ञान कैसे है। विज्ञान के सिद्धांतों को प्रैक्टिकल रूप में देखने के लिये कहीं-कहीं आपको उस प्रयोग का हिस्सा खुद बनना पड़ता है तो कहीं पर वो आपको होता हुआ दिख जाता है। कई चीज ऐसी भी देखने को मिलती हैं जिसे आम लोग चमत्कार समझते हैं। इस सांइस सिटी में रोलर कोस्टर, रोप वे, थ्री डी शो , मोनो साईकिल, ग्रेविटी कोस्टर, स्पेस थियेटर, रोड ट्रेन, टाइम मशीन, इवोल्यूशन पार्क आदि हैं।
हमारी शुरुआत रोपवे के द्वारा हुई। अन्दर विज्ञान के तमाम चमत्कारों से रू-बरू होते हम बाहर निकले तो अशार की नानी थक गयीं । हम लोग वहीं बाहर आकर बैठ गये। बच्चों का मन भरा नहीं था। कुछ देर और घूमने के बाद हम लोग गेट पर आ गये। वहाँ बच्चे काफी देर बार आये। छोटे साहबजादे अम्मार को विविध प्रकार के खानों का शौक जुनून की हद तक है। हमें वहीं पास में एक प्रसिद्ध रेस्टोरेन्ट के बारे में बताया गया। हालांकि हम अपने सहयोगी पंकज पराशर जी द्वारा बताये रेस्टोरेंट सुरुचि में जाने वाले थे, लेकिन वह दूर था। इसलिए 6 बाली गंज प्लेस में इसी नाम के रेस्टोरेंट की तलाश में हम लोग निकले। अशार, अरीबा, ऐमन का कार्यक्रम हम लोगों से अलग था। रेस्टोरेंट पर पहुंचने पर पता चला कि पूजा और मरम्मत के कारण बन्द है। हमें निराशा हुई। अशार की नानी थक गयी थीं। हम लोगों ने किसी दूसरे अच्छे रेस्टोरेंट की तलाश जारी रक्खी। उत्साहित जाजिब हमसे आगे निकल गये। पता चला कि आगे एक रेस्टोरेंट है। दो मिले। एक में लाइन लगी थी, दूसरे में केवल मछली ही थी। नाम भी फिश फिश था। चूँकि हम लोगों को मछली ही खाना था इसलिए फिश-फिश में गये। झींगा और एक मछली की करी की डिश का आर्डर किया। रोटी नहीं थी। आर्डर देने के बाद जाजिब ने बताया कि वह मछली नहीं खाते हैं। दुख हुआ। उनके लिए दाल मँगवाई गयी। किसी तरह मन मारकर खाना खाया। महंगा भी था और जैसे बंगाली खाने की तलाश में हम लोग थे। वैसी अनुभूति भी नहीं हुई।
अगले दिन कोलकाता दर्शन का कार्यक्रम था। हमारे काबिल शागिर्द गौहर ने काफी पहले ही कहा था कि आप जब कोलकाता जायेंगे तो वहां अपने संबन्धी के जरिए वह वाहन की माकूल व्यवस्था कर देंगें। ताहिर साहब से इसी सिलसिले में संपर्क हुआ। असल में उस दिन मुहर्रम की दसवीं तारीख थी इसलिए उन्होंने कहा कि दोपहर बाद घूमना मुश्किल होगा। हम लोगों ने सोचा क्यों न दिघा हो लिया जाय। दिघा बीच को ब्रिटेन ऑफ  द ईस्ट कहते हैं। यह पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा समुद्र तट है। यह कोलकाता से लगभग दो सौ किलोमीटर की दूरी पर है। यहां कम ढाल वाला छिछला समुद्री तट बेहद खूबसूरत हैं। दिघा को पर्यटन के नक्शे पर लाने का श्रेय अंग्रेज पर्यटक जॉन फ्रैंक स्मिथ को जाता है। वे यहां 1923 में आए और इस स्थान की खूबसूरती से प्रभावित होकर यहीं बस गए।
जैसे ही मुख्य हाइवे से उतरे खूबसूरती सामने आने लगी। दिघा कोलकाता से रेलमार्ग से भी जुड़ा है, लेकिन पूजा के कारण टिकट नहीं मिल सका। ताहिर साहब से टैक्सी के लिए बात हुई। उन्होंने वापसी में मुहर्रम के जुलूस का भय दिखाया। मुझे लगा कि इसी बहाने बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र का मुहर्रम भी देख लिया जायेगा। ड्राइवर संतोष जी की अगुआई में सडक़ के दोनों तरफ  की हरियाली मन को मोह रही थी। केले और नारियल के वृक्ष और भाँति-भाँति की झाडिय़ों से घिरे मार्ग की छटा अनुपम थी। न खत्म होने वाला आबादी का सिलसिला बीच-बीच में छोटे बड़े पोखर में खिले कमल और दूसरी वनस्पतियाँ मन को मोह रही थीं। संतोष जी गाड़ी धीरे-धीरे ही चला रहे थे। कुछ एक पोखर कच्चे-पक्के घरों के इर्द-गिर्द भी थे। कहीं-कहीं महिलाएं पोखरों में बर्तन धुल रही थीं तो कहीं कपड़े भी धुले जा रहे थे। रास्ते में तीन चार किलोमीटर चलने के बाद कोई-न-कोई बाजार आ जा रहा था। कस्बों में अभी भी पूजा के पंडाल अपनी भव्यता से खड़े थे। कहीं मंदिर तो कहीं महल विविध संकल्पनाओं के साथ ऐसे कि उनके यथार्थ होने में किसी को संदेह ही न हो! हालांकि कोलकाता में बने पंडालों का कोई जवाब ही नहीं, लेकिन कस्बाती गांवों और शहरों में भी कला के नायाब नमूने दिख रहे थे। चौराहों पर संभवत: स्वयंसेवी यातायात व्यवस्था संभालते दिख जाते। एक छोटे से बाजार में रुककर हमलोगों ने नारियल पानी पिया। फिर आगे बढ़े। हरियाली ही हरियाली थी। धान के खेत केला और पानी। सडक़ पर हमलोगों ने एक नये तरीके का जुगाड़ देखा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में पंपसेट के इंजन से बाकायदा चारपहिये का जुगाड़ चलता है। यहाँ मोटरसाइकिल के इंजन से बना तिपहिया वाहन सवारी से लेकर सामान ढोने तक में काम में लाया जा रहा था। सडक़ कहीं अच्छी तो कहीं खराब थी। बस हम लोग देवनागरी देखने के लिए जरूर तरस गये। अंग्रेजी का प्रयोग भी बहुत कम था। संतोष को बंगला आती थी इसलिए वह पूछने पर कस्बों का नाम बता देते। बाकी बंगाल की संस्कृति और वहाँ के शासन और व्यवस्था की बातें करते हुए हम लोग दिघा पहुँच ही गये।
दिघा में मुख्य बीच पर बाजार है। हम लोगों ने जहाँ टैक्सी पार्क की, चाय का एक खोखा था। सामने मन्दिर था। लौटते समय पता चला कि वह दरअसल मंदिर की प्रतिकृत पूजा पंडाल ही था। समीरा की अम्मी को किनारे एक सुरक्षित स्थान पर सामान की रखवाली की जिम्मेदारी सौंपकर हम लोग पानी में उतर गये। समीरा डर रही थीं। दरअसल लहरें अपेक्षाकृत बड़ी थीं। बेहद भीड़ थी। पर्यटक लहरों से अठखेलियों में व्यस्त अपने-अपने में मस्त थे। कहीं कुछ नौजवान तो कहीं परिवार था। कुछ युवा जोड़े अपनी मस्ती में ऐसे डूबे थे मानों दुनिया से बेखबर हों। किसी की परवाह नहीं। समीरा बीच-बीच में बाहर जाकर अपनी माँ का हाल ले आतीं। लगभग ढाई-तीन घंटे बाद हमलोग बाहर आये। दोपहरी और छुट्टियों की वजह से बाजार सूना था। वैसे हमें बताया गया कि बंगाली दोपहर में आराम अवश्य करते हैं। इसलिए लगा कि संभवत: सूनेपन का यही कारण हो! हम लोग खाने की तलाश में बाहर बाजार में गये। एक साधारण से होटल में खासी भीड़ थी। स्थान मिल गया। फिश-फिश में खाने के अनुभव के बाद समीरा और उनकी अम्मा ने तो यही तै किया कि वह मछली नहीं खाएंगी। अम्मार और मैंने जरूर मछली का आर्डर दिया। हिल्सा का भी। रोटी नहीं थी। बाहर ब्रेड भी नहीं थी। चावल से ही काम चलाना पड़ा। खाना साधारण ही था। वहाँ से आकर छुट-पुट खरीदारी करके हम लोग फिर बंगाल की खाड़ी के किनारे पर आ गये। लहरें तेज हो गयी थीं। मैं और अम्मार फिर खुद पर नियन्त्रण नहीं कर पाये। पानी में उतर गये। समीरा एक बार पास आयीं बाकी किनारे ही रहीं। लहरों के थपेड़े बढ़ते ही जा रहे थे। समुद्र धीरे-धीरे भयानक होता जा रहा था। पानी काफी ऊपर तक आ गया था। दिन ढलते-ढलते हम बाहर आये। बाजार सज गया था। खरीदारी के लिए महिलाओं को कुछ खास नहीं दिखा। वही सबकुछ जो आमतौर पर ऐसे सभी स्थानों पर होता है। फ्राई फिश का एक ठेला सजने लगा था। मैं और अम्मार वहीं जम गये। फिर झींगा और दूसरी कई मछलियों का स्वाद लिया। पहली बार एहसास हुआ कि हम मछलियों के देश में हैं। समीरा और उनकी अम्मा को भी खिलाया, लेकिन उन लोगों ने उतने मन से नहीं खाया। वापसी से पहले चाय पी। शाम होने की वजह से श्रद्धालु आने लगे तभी मंदिर और पंडाल का अन्तर समझ में आया।
वापसी में ताहिर साहब ने पहले ही बताया था कि मुहर्रम का जुलूस मिलेगा। जाम भी मिल सकता है। उल्लेखनीय यह भी है कि पूजा का विसर्जन और दसवीं का जुलूस एक ही दिन था। मुख्यमन्त्री ममता दी और बंगाल की जनता दोनों को दाद देनी पड़ेगी कि आपसी सहमति से मुहर्रम के जुलूस के एक दिन बाद विसर्जन का दिन निश्चित हुआ। पहला जुलूस हमें दिघा से निकलने के बाद ही मिला। कुछ ही देर के लिए हमें प्रतीक्षा करनी पड़ी। ताजिए देख कर मैं हैरान रह गया। रास्ते में कई एक स्थानों पर जुलूसों में एक-से-बढक़र एक ताजिए दिखे। उनपर पूजा का काफी प्रभाव दिखा। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी एक-से-बढक़र एक ताजिए देखने को मिलते हैं, लेकिन वहाँ  के कुछ कम नहीं थे! नाव के आधार पर सिरकियों से बना एक ताजिया तो अपनी शोभा से हैरतजदा कर रहा था। हम सभी को सबसे अधिक आश्चर्य जुलूस को देखकर हुआ। मुहर्रम गम की अभिव्यक्ति का अवसर होता है। लेकिन यहाँ डेक डीजे पर डांस हो रहा था। पसीने तर चेहरे उड़ाये जाने वाले सुनहरे रुपहले किरकिरों से झिलमिल कर रहे थे। कुछ ही देर बाद मेरा आश्चर्य गलने लगा। मुझे लगता है कि देश में मुहर्रम ही एक ऐसा अवसर या पर्व है जो भारतीय सामासिक संस्कृति का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। समरसता और सामसिकता का दरअसल यह प्रभाव था जो यकीनन पूजा के जुलूस से लिया गया होगा। जुलूस देखते हम लोग लगभग ग्यारह बजे स्वास्तिक गार्डन पहुंचे।
अगले दिन कोलकाता दर्शन की योजना थी। तय यह हुआ कि कार बुलवा ली जाय, लेकिन थकान के कारण किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी। अन्त में निर्णय यह लिया गया कि आज कुछ एक स्थानों को देखकर आराम किया जायेगा। मैं तो कहीं नहीं गया। बाकी सभी विक्टोरिया मेमोरियल गये। देर हो गयी थी। भीतर जाकर देखने का अवसर नहीं मिला, लेकिन पूजा के कारण ही रोशनी की गयी थी। सजावट भव्य थी। पल-पल परिवर्तित प्रकाश के रंगों ने सबका मन मोह लिया। लोगों के लौटने के बाद अगले दिन के लिए हमने संतोष जी के साथ टैक्सी के लिए कह दिया।
लगभग साढ़े दस बजे संतोष जी आ गये। हम लोग तैयार ही थे। समीरा की अम्मी हिचकिचा रहीं थीं, लेकिन इस वादे के साथ निकलीं कि थकने पर वह टैक्सी में बैठी रहेंगी।
हाल ही में अपना 143वां जन्मदिन मनाने वाला कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट देश के प्रमुख बंदरगाहों में से एक है। संतोष जी सबसे पहले खिदिरपुर डक यार्ड दिखाना चाहते थे। ऐतिहासिक हावड़ा ब्रिज तो हमारी मंजिल था ही। हावड़ा ब्रिज को रवींद्र सेतु भी कहते है। यह हावड़ा को कोलकाता से जोड़ता है। हावड़ा ब्रिज की स्थापना 1874 में हुई थी। यह ब्रिज 270 फीट ऊंचे खंभों पर खड़ा है। जो जहाजों को पार करने के लिए खुल जाता है। पुल से हम लोगों ने दोनों तरफ  के यात्री और मालवाहक पोतों को देखा और फोटोग्राफी की। उसके बाद दूूसरे पुल पर ले गये। वह ऊपर उठने के बजाय तिरछा घूम जाता है। वहाँ से भी जलपोतों के नजारे देखे जा सकते थे। दूर हुगली नदी पर बना भव्य पुल दिख रहा था जो कि आधुनिक इंजीनियरिंग के शानदार नमूने के रूप में देखा जा सकता है। दूसरे हावड़ा ब्रिज के नाम से जाने जाना वाला यह पुल विद्यासागर सेतु के नाम से भी जाना जाता है। विद्यासागर सेतु हावड़ा ब्रिज से 1.5 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह केवल चार स्तम्भों और 121 रस्सियों के सहारे खड़ा हुआ है। विद्यासागर सेतु हुगली नदी पर कोलकाता से हावड़ा को जोड़ता हुआ सेतु है। यह अपने प्रकार के सेतुओं में भारत और एशिया के सबसे लंबे सेतुओं में से एक हैं। स्टील रोपवे पर आधारित विद्यासागर सेतु की कुल लंबाई 27 सौ फुट, ऊंचाई और चौड़ाई 115 फुट है। 1992 में शुरु हुआ यह सेतु 6 लेन वाला है। काफी देर तक हम इन पुलों और जहाजों को निहारते और उनकी फोटो लेते रहे।
वहाँ से आगे बढऩे पर एक पार्क में गये। वह किसी बड़े अंग्रेज अधिकारी जेम्स प्रिंस के स्वागत में तैयार छोटी सी इमारत के गिर्द था। वहां तीन हाथी बड़े छोटे संभवत: लोहे के फ्रेम कृत्रिम फाइबर की हरी घास से इस प्रकार से तैयार किये गये थे कि लगता था बस ये हरे हाथी अभी बोल देंगे। पता चला कि यहां फिल्मों की शूटिंग भी होती रहती है। वहां से हमारा अगला पड़ाव बालाघाट था। हम लोग जल्दी पहुंच गये थे इसलिए वहां भीड़ नहीं थी। नीचे छोटी नाव वाले कुछ तो दोपहर का भोजन ले रहे थे या कुछ खाने के बाद झपकी ले रे थे। हम लोगों ने एक बेहतरीन सी चाय पी। आगे बढ़े। स्टीमर की सवारी के लिए चले गये।
समीरा की अम्मी तो गाड़ी में ही बैठी रहीं, लेकिन हम लोग वापसी का टिकट लेकर हावड़ा की जमीन को छू आये। पानी में आस-पास यात्री और मालवाहक पोतों की आवाजाही भी थी। वहाँ से लौटकर संतोष जी एक चर्च ले गये। कोलकाता में नये-पुराने बहुत सारे चर्च हैं। उन्हीं में से एक चर्च में जैसी की मुझे तमाम चर्चों में अनुभूति होती है, हुई। मन को शांति प्रदान करने वाली अनुभूति! हम लोग दस-पद्रह मिनट तक प्रार्थनार्थियों के लिए नियत स्थान पर बैठे रहे। उसके बाद वहाँ से बाहर निकलकर चर्च के प्रांगण में स्थित कुछ एक मकबरों को देखा। बाहर आकर संतोष जी ने इडेन गार्डन स्टेडियम का चक्कर लगया। कोलकाता का यह एक पर्यटन स्थल है। इस स्टेडियम की क्षमता लगभग 1 लाख लोगों की है। एक छोटे से तालाब में बर्मा का पेगोडा स्थापित किया गया है, जो इस गार्डन का विशेष आकर्षण है। कोलकाता ही नहीं हिन्दुस्तान के लोकप्रिय और बड़े खेल मैदानों में इसकी गणना होती है। क्रिकेट प्रेमियों के बीच इसे क्रिकेट का मक्का भी कहा जाता है। संभवता मैंने जब से होश संभाला एक औसत मध्यवर्गीय भारतीय समाज में पलने वाले बच्चे की तरह क्रिकेट का दीवाना गावस्कर विश्वनाथ बनने का सपना देखा करता था, इसलिए भला यह कैसे मुमकिन था कि मैं इसकी उस भव्यता से परिचित न होता, जिसका बखान मैंने जसदेव सिंह, मुरली मनोहर मंजुल, सुशील दोषी, और स्कन्द गुप्त की रनिंग कमेट्री में सुनी थी। यहाँ यह भी साफ कर दूँ कि टेलीविजन से वह छवि कभी भी नहीं बन पायी। असल में टेलीविजन में जो दिखाया जाता है उसमें तकनीक का कमाल होता है। कमेंट्री भावनाओं और संवेदनाओं से भी प्रभावित होती है।
मेरी बड़ी इच्छा थी कि कोई छोटा-मोटा ही मैच हो तो देखा जाय, लेकिन उस दिन ऐसा कुछ नहीं था। इडेन गार्डन के बाद कोलकाता के संदर्भ में मैं मोहन बगान और मोहमडन स्र्पोटिंग फुटबाल क्लबों से भी परिचित था। उसका बाहर से ही दर्शन हो गया।
जनरल पोस्ट ऑफिस भवन कोलकाता शहर के केंद्र में स्थित है। वहाँ से निकले तो जनरल पोस्ट ऑफिस कोलकाता के पास से गुजरे। इमारत की भव्यता और उसके अतीत की कल्पना ने भारत में आधुनिकता की जननी कोलकाता के संदर्भ में विचारों की झड़ी लगा दी। आगे राइटर्स बिल्ंिडग का बाहर से दर्शन किया। राइटर्स बिल्डिंग की स्थापना 1770 ई. हुई थी। राइटर्स बिल्डिंग अंग्रेजों के शासन काल में लेखकों तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के छोटे अधिकारियों के मुख्यालय के रूप में प्रयोग में लायी जाती थी। राइटर्स बिल्डिंग का पश्चिम बंगाल सरकार के सचिवालय के रूप में भी प्रयोग किया गया है। वहाँ से हम लोग न्यू मार्केट गये। असल में पंकज जी ने जाने से पहले वहाँ के होटल अमीनियाँ के काठी कबाब और पराठे की तारीफ  की थी। अम्मार से अब भूख बरदाश्त नहीं हो रही थी। बाजार का पूरा चक्कर लगाने के बाद हम लोग होटल तक पहुँच गये। धीरे-धीरे भीड़ होनी आरम्भ हो गयी थी। सच बात यह है कि जिसने लखनऊ के कबाब पराठे का जायका लिया हो उसके लिए काठी कबाब पराठे स्वाद के बजाय अपनी प्रसिद्धि के लिए अधिक अहम थे। हम लोगों ने पराठा कबाब और चिकेन की एक डिश का आर्डर दिया। हमारे आस-पास के ग्राहक बिरियानी का आर्डर दे रहे थे तो हम लोगों ने भी सोचा कि बिरियानी का स्वाद ले लिया जाय। हमारी पड़ोस की मेज पर आये परिवार में तीन वयस्क और एक किशोर था। उन लोगों ने चार प्लेट बिरियानी का आर्डर दिया। हम लोग चूँकि कई चीजें पहले ही थोड़ी-थोड़ी खा चुके थे इसलिए संकोच के साथ दो प्लेट बिरियानी मँगवाई। दो ही चार लोगों से खत्म नहीं हुई। दूसरी तरफ  लोग एक-एक प्लेट बिरियानी लिए मजे से उड़ाए जा रहे थे। हम लोगों ने बची हुइ बिरियानी पैक करवाई फिर बाजार में निकल गये। बहुत बड़ा बाजार है। वहां दैनन्दिन की कौन ऐसी वस्तु थी जो न मिल रही हो! कपड़े, सब्जी, हर तरह का मांस, घरेलू प्रयोग की दूसरी तमाम वस्तुएं, लेकिन छुट-पुट खरीदारी करके ही वहां से हम लोग वापस आ गये।
एक प्रसिद्ध गिरजे में जाकर थोड़ी देर रुके। समीरा अपना रुपयों का पर्स वहीं छोड़ आयी, लेकिन निकलते-निकलते याद आ गया। हम लोग  फिर अन्दर गये। सन्नाटा था। केयटेकर भी हम लोगों के पीछे-पीछे ही आ गया था। बहरहाल पर्स मिल गया। हमारा अगला पड़ाव मदर हाउस था।
मदर टेरेसा की कर्मभूमि रहे मिशनरीज आफ  चैरिटी के कोलकाता स्थित मुख्यालय मदर हाउस का दर्शन दरअसल मेरी कोलकाता यात्रा की उपलब्धि कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सबसे पहले हम लोग मदर के मकबरे में गये। सादगी और सेवा की मूर्ति मदर के मकबरे की शांति और सादगी वहाँ के वातावरण में एक विशिष्ट तरह की अलौकिकता की अनुभूति करा रही थी। पहले अम्मार समीरा और मैंने दो मिनट के लिए मौन धारण करके मदर को श्रद्धांजलि दी। मौन के समय की अनुभूति का बयान मुमकिन नहीं। अन्दर चन्द विदेशी ही थे। हम लोग मकबरे में एक किनारे की कुर्सियों पर बैठकर प्रार्थना तो करते रहे, लेकिन किसके लिए! यह मैं समझ नहीं पाया लेकिन वह अनुभव भी अलौकिक ही था।
वहाँ से निकलकर मदर के संग्रहालय का रुख किया। मदर से जुड़े चित्र, दस्तावेज देखे। उनकी दैनन्दिन की वस्तुएँ साफ-साफ  कह रहीं थीं कि मदर महान क्यों थी! जब उनके कमरे को देखने गये तो उसके बाद स्थिति और भी स्पष्ट हो गयी। हम साधारण लोग कितनी भी कल्पना कर लें, लेकिन बिना देखे हम कदाचित महसूस ही नहीं कर सकते हैं कि इतना बड़ा व्यक्ति इतने कम संसाधनों से जीवन यापन कर लेता है। वापसी में हम लोग फिर से मदर के मकबरे में चले गये। अब भीड़ थी। अधिकांश विदेशी ही थे। सब शांत बैठे लोगों में कइयों की आँखें नम थीं। हम लोग कुछ देर वहीं बैठे रहे फिर बाहर आये।
अभी बहुत सारे मन्दिर और मठ हवेलियाँ रह गयी थीं, शाम उतरने लगी थी।अम्मार की जिद थी कि चाइनाटाउन जायेंगे। हमने भी चाइनाटाउन के बारे में बहुत पढ़ और सुन रक्खा था। लेकिन वहां जाने के बाद पता चला कि जो पढ़ा था वैसा कुछ नहीं है। इक्का-दुक्का बुजुर्ग चीनी चेहरे ही दिखे बाकी बार और रेस्टोरेंट थे, उन पर जरूर मंदारिन लिपि में नाम थे। वरना आम गरीब बंगाली ही दिख रहे थे। दरअसल पता चला कि नई पीढ़ी के अधिकतर लोग पलायन करके यूरोप और अमेरिका तथा कनाडा इत्यादि देशों में चले गये हैं। पलायन के कारण बन्द होता टेनरी का उद्योग भी है। चीनियों का मुख्य व्यापर टेनरी का कारोबार ही था, लेकिन बढ़ती प्रतिद्वन्द्विता और नई पीढ़ी के भारत से मोहभंग के कारण चीनियों की आबादी संकट में दिखाई पड़ी। अम्मार के मन में फिल्मों देखी चीनी फूड स्ट्रीट की कल्पना थी, लेकिन वह जब नहीं दिखी तो उन्होंने भी वापसी के लिए उतावली दिखाई। रास्ते में संतोष जी ने एक मिठाई की दुकान पर गाड़ी रोकी। असल मेंं हम लोगों की योजना थी कि वहीं से घर के लिए रशोगुल्ले ले लेंगे। दुकान पर भीड़ थी। पता चला कि अब रशोगुल्ले खत्म होने वाले हैं। पैकिंग के लिए मैंने बात की तो दुकानदार ने बताया कि मुश्किल से दो दिन ही चलेंगे। हमारी यात्रा का समय ही दो दिन का था। अगले दिन रात में निकलना था। संदेश के बारे में बताया कि यह दस-पन्द्रह दिन चल जाता है। हमने संदेश पैक करवाये। वहाँ से विक्टोरिया मेमोरियल का रास्ता पकड़ा। हालांकि हमें यह पता था कि विक्टोरिया मेमोरियल शाम में ही बन्द हो जाता है, लेकिन कल देखकर आये सभी लोगों ने वहाँ के प्रकाश सज्जा की बड़ी तारीफ  की थी। पूजा के कारण तो पूरा कोलकाता ही विविध रंगों और रूपों के साथ सजा था, मार्ग की सजावट को निहारते हम वहाँ पहुँचे। बदलते हुए बिजली के कुमकुमों की शोभा के संदर्भ में कहना अतिशयोक्ति न होगी कि अगर होगा तो कदाचित स्वर्गीय सौन्दर्य वैसा ही होगा जैसा वहाँ का नजारा था, लेकिन पार्किंग की माकूल व्यवस्था न होने के कारण हम वहां बहुत देर तक रुक नहीं पाये। रात के लगभग साढ़े आठ बजे गये थे। हम लोग वापस स्वास्तिक गार्डन आ गये।
सब थककर चूर हो गये थे, लेकिन संतोष जी की मेहरबानियों से जितना संभव हो सकता था हम लोगों ने देख लिया। रह गयी इमारतों में नकोदा मस्जिद, जैन मंदिर, बेलूर मठ, दक्षिणेश्वर मंदिर, कालीघाट का काली मंदिर, बिड़ला मंदिर, शहीद मीनार, नेशनल म्यूजियम, एशियाटिक सोसाइटी, ठाकुरबाड़ी, फोर्ट विलियम, मार्बल पैलेस इत्यादि देखने के लिए दिनों के बजाय सप्ताह की दरकार होती है। अगली यात्रा के लिए इन स्थानों को छोड़ कल यानी यात्रा के अन्तिम दिन नेश्नल लाइब्रेरी जाने कार्यक्रम था। असल में उसी दिन हमारी वापसी की ट्रेन थी। यात्रा लम्बी थी। समीरा और उनकी बहन की योजना वापसी में तैयारी की थी। विशेषरूप से खाने की। असल में पता यह चला कि वापसी वाली गाड़ी में खानपान की व्यवस्था नहीं है। अम्मार जरूर तैयार थे। अशार अपनी गोल के लोगों के साथ घूमकर थक गये थे। उनका इरादा भी आराम का था। अगले दिन हम लोग नेशनल लाइब्रेरी के लिए निकले। देश के बड़े पुस्तकालयों में शुमार नेशनल लाइब्रेरी में मैं पहले जा ही चुका था। इस यात्रा में हमें मुंशी नवलकिशोर पर भारत सरकार के सूचना प्रसारण मन्त्रालय से प्रकाशित एक पुस्तक की तलाश थी। हम लोग पहुंचे तो पता चला कि बच्चों के लिए एक अलग विभाग है। अम्मार को वहाँ भेजकर मैं लाइब्रेरी में चला गया। उर्दूविभाग में अलीगेरियन उस्मान साहब से मुलाकात हुई। बहुत प्रयत्न के बाद भी वह पुस्तक नहीं मिल पायी। अम्मार को लाइब्रेरी ने बहुत प्रभावित किया। बच्चों के लिए वहाँ नायाब अध्ययन सामग्री थी। कॉमिक्स टिन-टिन की आरम्भिक प्रतियाँ भी मिल गयीं। इन्साइक्लोपीडिया में थ्री डी तस्वीरें थीं। वह तो वहाँ के दीवाने हो चुके थे। उनको इस बात का अफसोस था कि उनकी पढ़ाकू नानी साथ आयीं क्यों नहीं।
लाइब्रेरी से निकलकर हम लोगों ने थोड़ी दूर पैदल यात्रा करके वहीं जाकर खाना खाया जहां पहली यात्रा में खाते थे। खाने के बाद पड़ोस की दुकान से रसमलाई ली गयी। खा-पीकर हम वापस टैक्सी से समीरा की बहन के यहाँ आ गये। तैयारियाँ समाप्ति पर थीं। मैंने महसूस किया कि हमारे मेजबान शकील भाई, समीरा की बहन जाजिब, ऐमन, अरीबा सभी उदास थे। असल में ये लोग घर के मुखिया की मृत्यु के बाद एक भरे पूरे परिवार से इस फ्लैट में रहने आये थे। पारिवारिक विवाद के कारण शकील भाई के परिवार में दूसरे भाइयों से संबन्ध अच्छे नहीं थे। वह परिवार में सबसे बड़े थे। समीरा की बहन का परिवार में बड़ा मान था। उन्होंने परिवार को संवारा था। शकील भाई थोड़े सीधे हैं, इसलिए परिवार के लोग उनको जायदाद में उनका मुनासिब हिस्सा नहीं देना चाहते हैं। आपसी विवाद के कारण लोगों का मिलना-जुलना बन्द हो गया था। इधर उनकी बहन के घर से लोग कम ही आते। एक तरह से लोग खुद को अकेला महसूस करते। हम लोगों के वहाँ पहुँचने के बाद अपनी तमाम समस्याओं को हम लोगों से बाँट लेने के बाद उन लोगों का दुख कुछ गलता-सा दिखा। मैंने महसूस किया। बच्चों को उनके हमउम्र साथी मिल गये। फिर तो क्या कहने! मध्यवर्गीय नगरीय परिवार की जीवनशैली में जीने वाले बच्चों की प्रसन्नता का अनुमान उस वर्ग का कोई भी लगा सकता है। बिदाई के समय की रुदन की बड़ी ही स्वाभाविक प्रक्रिया के साथ हम लोग कलकत्ता स्टेशन के लिए निकले। घर पर केवल समीरा की बहन कुमकुम बाजी ही रह गयी थीं। हम लोग समय से स्टेशन पहुँच गये। वह लोग लगभग एक घंटे हमारे साथ रहे। एक बार फिर सब नम आँखों के साथ अपनी-अपनी राहों की तरफ  निकले।