Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

जे. पी. नगर वाया सिताब दियारा

सुरेश शॉ
8,पॉटरी रोड,                
कोलकाता-700015
फोन-033 23281731
उन दिनों हमारे गांव वाले जगलाल चाचा मुझे ‘जयप्रकाश नारायण’ कहा करते थे और मैं उन्हें  ‘चाचा नेहरू’। उनके लिए मैं जे.पी. इसलिए था, क्योंकि जे.पी. की भांति मैंने भी एक आंदोलन चला रखा था, जबकि जगलाल चाचा मेरे लिए ‘चाचा नेहरू’ इसलिए थे, क्योंकि वह जवाहरलाल नेहरू की भांति न केवल  सुंदर-सुडौल कद-काठी और मोहिनी सूरत-इंसान तथा गुलाब के दीवाने थे, बल्कि मेरे आंदोलन को बढ़ावा देने में वह भरपूर सहयोग दिया करते थे। फिर भी जे.पी. और मेरे आंदोलन में यह फर्क जरूर था कि वह अपने तरीके से देश की मुखिया और उनकी तानाशाही (नीतियों) के विरुद्ध एक जन आंदोलन चला रहे थे, जबकि मैं अपने परिवार के मुखिया के विचारों के विरुद्ध एक व्यक्तिगत आंदोलन कर रहा था। बताता चलूं कि हमारे परिवार के मुखिया चाहते थे कि मैं पढ़ाई-लिखाई नहीं करूं, स्कूल भी न जाऊं; अलबत्ता अपनी उम्र के अनुरूप कोई व्यवसाय शुरू करके धन कमाऊं और अपने घर की बिगड़ती माली हालत को सुधारने में पैसे देकर पिता जी की मदद करूं। लेकिन मैं तो रोजी-रोटी की नहीं, भविष्य में ‘बाबू’ बनकर ठाट-बाट से जिंदगी जीने का आदी होना चाहता था। अतएव उनके दकियानूस ख्यालों को ताक पर रखकर मैं लग गया एक बनावटी जिंदगी की नींव को पुख्ता बनाने में।
   यानी उस दौर में एक तरफ देश भर के राजनेताओं और बुद्धिजीवियों में नीतियों की टकराहट ज़ोर पकड़ रही थी, तो दूसरी तरफ समाज के हमारे जैसे निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में शिक्षा के प्रति उनके व्यक्तिगत विचारों की टकराहट भी अपनी जगह बना रही थी। अव्वल कि इन दोनों के समाधान का एक ही रास्ता बचता नजऱ आ रहा था— एक राजनैतिक तथा सामाजिक आंदोलनों को खड़ा करना। दोनों पक्ष के मुद्दे भी साफ थे— जे.पी. आंदोलन देश की राजनैतिक अस्थिरता को मिटाने के लिए चलाया जा रहा था, तो मेरा आंदोलन अपने परिवार में व्याप्त अशिक्षा के माहौल को मिटाने के लिए। पर इनका उद्देश्य सकारात्मक था, इसलिए इनका नतीजा भी सकारात्मक निकला। जे.पी. ने अपने आंदोलन से देश की (तत्कालीन) मुखिया को परास्त किया; मैंने अपने आंदोलन से अपने परिवार के मुखिया को ।
   इन बीते चार दशकों में राष्ट्रीय राजनीति और शिक्षा के प्रति हमारी सोच में एक जबरदस्त बदलाव आया है। अब लोगों में जिस तरह राजनीति के प्रति रुचि जगी है, उसी तरह अपने बच्चों को शिक्षित करने के प्रति दायित्वबोध का भी अहसास हुआ है। आज का निम्न मध्यवर्गीय परिवार भी कम खाने को तैयार है, पर अपने बच्चों को ऊंची तालीम जरूर दिलवा रहा है। यादों की एक और परत हटाने पर एक और अविस्मरणीय घटाना की याद बरबस हो आती है—
   उन दिनों छपरा से पटना आने-जाने के लिए लोग पानी के जहाज़ से गंगा नदी को पार किया करते थे। एक बार, जब मैं चौथी-पांचवीं कक्षा का विद्यार्थी रहा होगा, अपने मंझले भइया के साथ पटना होकर कलकत्ता आ रहा था। कचहरी से बस पर चढक़र पहलेजा घाट पहुंचने पर पता चला कि कोयला-पानी के भाप से चलने वाला ‘बच्चा बाबू’ का जहाज़ जा चुका है। महेंद्रू घाट जाने के लिए जेटी पर जो सरकारी जहाज़ अभी खड़ा है उसकी साधारण श्रेणी में अब कोई जगह खाली नहीं है। मजबूरन रामप्रवेश भइया ने दो-दो रुपये देकर प्रथम श्रेणी के दो टिकट कटवा लिये। यहां बैठकर यात्रा करने में मुझे खूब आनंद आया। यहां से दूर तलक देखने पर कभी पानी ही पानी दिखाई पड़ता, तो कभी पानी वाले जीव-जंतु; दूर किनारों पर कभी बाग-बगीचे-खेत दिखाई पड़ते, तो कभी माल-मवेशी, लोग और उनके घर।
 इतना होने पर भी मेरे कान, ज्यादातर उन दो सज्जनों की बातचीत पर लगे रहे जो हमारे साथ सफर कर रहे थे। उनमें से एक तीस-पैंतीस साल का नौजवान था तो दूसरा अधेड़ उम्र का आदमी, जिसकी गोल-चकोर मुखाकृति पर गोल फ्रेम का चश्मा था, सिर पर गांधी टोपी थी, देह पर खादी के कपड़े थे और पैरों में चमड़े के जूते।
   सन् 1977 की बात है। एक शाम हमारे शहर के महात्मा गांधी रोड से हो कर एक बड़ी-खुली गाड़ी पर सवार नेताओं का एक काफिला गुजर रहा था। सडक़ों के किनारे आम लोगों के साथ-साथ मैंने भी आमहस्र्ट स्ट्रीट-महात्मा गांधी रोड चौराहे पर खड़ा होकर इन महानुभावों को देखा। उन नेताओं में से एक जो अपने हाथ हिला-हिलाकर हमारा अभिवादन स्वीकार कर रहे थे, जिसके गोल-चकोर मुखड़े पर गोल-गोल ऐनक थे, वह सुदर्शन सूरत वाला व्यक्तित्व कोई और नहीं, जयप्रकाश नारायण ही थे, जिन्हें मैंने तीन-चार साल पहले पानी के जहाज़ पर देखा था।      
   महेश खरवार, मेरे स्कूल का सहपाठी रहा है। उन दिनों वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों के प्रति पूर्ण समर्पित रहने वाला एक युवक था। जे.पी.-गांधी को थोड़ा-बहुत समझने में उसने मेरी भी खूब मदद की थी। मुझे याद है उसी के कहने पर ( 1979 में जे.पी. के निधन के बाद) जो उनका अस्थि-कलश कलकत्ता के शहीद मिनार मैदान में रखा गया था, उसके दर्शन और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए, बहुत भीड़ होने पर भी, मैं सहर्ष कतारबद्ध हो गया था। लगभग तभी से मन में एक लालसा भी घर कर गई थी कि एक बार बाबू जयप्रकाश नारायण के गांव जरूर जाऊं  और देखंू कि उस ‘बिहार-उत्तर प्रदेश के लाल’ का घर-द्वार और खेत-खलिहान कैसा है !!
    सौभाग्य से मुझे उस लालसा को पूरा करने का अवसर इस मई महीने की 28 तारीख को मिल भी गया। इस बार के अपने 3 दिनों के बिहार प्रवास के दौरान मैं अपने गांव पुरसौली नहीं जा सका, जिसका बेहद अफसोस है; पर इस दफा मैं जे.पी. नगर जरूर पहुंच गया, इसकी मुझे हद की खुशी है। पर मुझे वहां ले जाने का सारा श्रेय मेरे हम उम्र भांजे दारोगा प्रसाद को ही जाता है।
   उसने एक कार की व्यवस्था की, उसमें अपने पैसे से ईंधन भरवाया, संजीव कुमार सिंह उर्फ खेदन जी तथा चालक रमाशंकर प्रसाद महतो (मीठू भाई) को साथ लिया और चल पड़ा मुझे सिताब दियारा दिखाने। इस सफर में एक जगह दूर तक फैले खेतों में नील गायों का झुंड दिखा। मेरे मुंह से अनायास ही निकल पड़ा—‘कितनी सुंदर हैं ये नील गायें।’ खेदन जी तुरंत बोल पड़े-‘किसानों की लाखों की फसलें चर जातीं हैं ये नील गायें। इसलिए सरकार ने इन्हें बंदूक की गोली से भुनवा डालने का निर्णय लिया है। यानी बहुत जल्द इनका सफाया होने वाला है।’
   मढ़ौरा-तेजपुरवां, नगरा-खैरा, मानपुर-वाजितपुर, नैनी-फकुली, गोबर्धनदस का पोखरा, छपरा-ब्रह्मपुर, रिविलगंज होते हुए जब हम माझी के पुल को पार करने लगे तो स्वत: याद आ गए कवि केदारनाथ सिंह और याद आ गई उनकी कविता ‘माझी के पुल’। इस पुल को पार करते ही हम उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में प्रवेश कर गए। वहां से कार बाईं ओर मुड़ी और सरयू (घाघरा) नदी के तट (बांध) पर बनी पक्की सडक़ पर भागने लगी। इस तटबंध की पहली चट्टी पर जब हम पहुंचे तो पता चला कि जे.पी. के गांव- ‘लाला का टोला’- ज़ाने का रास्ता यहीं (बाईं तरफ) से जाता है। यह भी सुना कि उनके जन्म-स्थान पर इन दिनों एक नया स्मारक बन रहा है। ‘वापसी में हम लाला टोला जाएंगे, पहले जे.पी. नगर चलते हैं।’ ऐसी हमारी योजना बनी। इस चट्टी से जल्दी-जल्दी आगे बढऩे की एक वजह यह भी थी कि ‘गरीबा टोला ढाला’ पर रामदास जी हमारा इंतजार कर रहे थे।
    इलाहाबाद बैंक की नौकरी से सेवा मुक्त रामदास जी पासवान दारोगा के अभिन्न मित्र और एक सहृदय पुरुष हैं। उन्होंने हमें इस दियारा के इतिहास-भूगोल, खेती-बाड़ी, लोगों की जीवन शैली, बाढ़ के दिनों की उनकी ऊभ-चूभ स्थितियों, मानसिक दबावों तथा आर्थिक-सामाजिक पहलुओं से अवगत कराया और यह भी बताया कि ‘बाबू गरीबा सिंह’ के नाम पर उस चौक-चट्टी का नाम गरीबा टोला (कैसे) पड़ा !!
 यह वह सीवान है जिसके बाएं सारण (छपरा) और दाएं बलिया है। दास बाबू कहने लगे कि किस तरह इस सीमा (बिहार) के शराबी उस सीमा (उत्तर प्रदेश) में घुसकर छनकर शराब पीते हैं और नशा चढ़ आने पर लुढक़ते-पुढक़ते अपने उस गांव-घर-जिले में लौट आते हैं, जहां आज-कल शराब की बिक्री पर पाबंदी लगी हुई है।
   एक मजे की बात यह कि हमारी कार बिहार प्रदेश में ही खड़ी थी, जबकि हम उत्तर प्रदेश में बैठकर चाय पी रहे थे; पर हम केवल चाय पी रहे थे, जिसपर अब तक कोई रोक-टोक या पाबंदी नहीं लगी है।
   रामदास जी के निदेशन में हमने गरीबा टोला से दक्षिण दिशा (बैरिया) की ओर जाने वाली सडक़ पकडक़र बामुश्किल एक कि मी की दूरी तय की होगी कि हमारी कार बांध से दाहिने उतर गई और हम जे.पी. नगर पहुंच गए। यहां रामदास जी ने फिर से बताना शुरू किया कि यहां का जे.पी.-स्मारक वाला इलाका वास्तव में जयप्रकाश नारायण की पैतृक खेती-बाड़ी की जमीन या यूं कहें खेत-खलिहान-बथान वाला भू भाग था, ‘उनका जन्म तो लाला-टोला (छपरा) में हुआ था और वहीं उनका बचपन भी बीता था।’ पर हमने देखा कि आज यहां खेत-खलिहान से कहीं ज्यादा लोगों के घर-मकान, बाग-बगीचे; आचार्य नरेंद्रदेव तथा प्रभावती देवी के नाम से जुड़ी संस्थाएं, स्कूल-कॉलेज, पुराना खादी भंडार, ग्रामीण बैंक की एक शाखा और दूसरी संस्थाएं हैं।       लोहे के फाटक से स्मारक हाते में दाखिल होते ही दिखे छोटे-छोटे भवन-मकान, दिखीं लतियां-पतियां, तरह-तरह के फूल-फल के पेड़-पौधे और बाग-बगीचे। उन्हें देखकर सच में दिल बाग-बाग हो उठा। फिर दिखा ‘प्रभावती पुस्तकालय’, अंदर सहन वाले मकान में जे.पी. के सोने-पढऩे का कमरा, वहां रखी एक चारपाई, मेज़-कुर्सी, दो जोड़े उपानत (लकड़ी की चप्पलें) और कमरे की दीवारों पर टंगीं ढेर सारी तस्वीरें। उसके आगे दिखा जे.पी. का भोजन-कक्ष,  जिसे अब (शीशे का गेट लगाकर) बंद कर दिया गया है। एक बंद कोठरी के बाहर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की शीशे में मढ़ी बड़ी सी एक तस्वीर दिखी और लंबे पसरे हुए दो-चार ओसारे भी दिखे। पीछे वाले आंगन के बीचोंबीच एक दुबला-पतला-छरहरा सा पानी-कल (हैंड-पंप) है, जो महज़ कोई यादगार बनकर आज यहां खड़ा नहीं है, बल्कि उससे तब भी पानी निकलता था और आज भी निकलता है। और इसके ठीक पश्चिमी भाग में है - चंद्रशेखर वाटिका।
   इस मकान से बाहर है वह संग्रहालय भवन जहां जे.पी.-क्रांति से जुड़ी तस्वीरें, फोटो, समाचार पत्रों की कटिंग्स, उनमें छपी रपटें, उनकी कुछ फोटो-स्टेट प्रतियां तथा ऊपर तल्ले पर जे.पी. की एक ऊध्र्वकाय (बस्ट) मूर्ति, धरोहर  के रूप में विद्यमान है। इस भवन के पास ही एक मंदिर है, जिसमें शिव-लिंग सहित राम-लक्ष्मण और सीता की प्रस्तर- मूर्तियां हैं और उसके आस-पास फिर वही हरे-भरे पेड़-पौधे, आम्र के सुंदर वृक्ष और उनपर लटकते रसीले रसाल।
   वहां से लौटने लगे तो जबरन रामदास जी हमें अपने घर ले जाकर चाय-नाश्ता करवाने लगे और यह सब करते-करते इतनी देर हो गई कि हम ‘लाला-टोला’ नहीं जा सके। ‘वहां फिर कभी जाएंगे’—का हमने प्रण तो कर रखा है। अब देखें कि हम अपने उस प्रण को कभी पूरा कर पाते भी हैं या नहीं?
   छोटी होने पर भी यह यात्रा हम सब के लिए एक सुखद यात्रा थी। हां, अगर आप भी चाहें तो वहां जा सकते हैं। आपका अपना वाहन है तो वाह-वाह, वरना आप छपरा सरकारी-बस पड़ाव के पास से गरीबा टोला जाने वाली जीप-ट्रेकर पर बैठिए, चालक महोदय को 35 रु दीजिए और पहुंच जाइए छपरा-बलिया के सीवान पर बसे सिताब दियार के गरीबा टोला। वहां से जे.पी. नगर पैदल का ही रास्ता है।