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Saturday 18 Nov 2017

प्रयोगधर्मी गज़़लकार ‘दरवेश’ भारती

डॉ. मधुकर खराटे
किला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, बोदवड, जिला- जलगांव-425310 (महाराष्ट्र)
मो. 09422567778

‘गज़ल के बहाने’ पत्रिका के माध्यम से दरवेश भारती का नाम हिंदी साहित्य जगत में चिरपरिचित हैं। उनके लिए यह पत्रिका चलाना किसी ‘मिशन’ से कम नहीं है। इस पत्रिका के सुचारू संपादन के साथ-साथ उन्होंने कई गज़लें भी लिखी हैं। नव-नवीन विषयों को उन्होंने अपनी गज़लों के माध्यम से स्वर प्रदान किया है। ग़ज़लों के लिए एक नई ज़मीन तैयार करने का महत्वपूर्ण कार्य दरवेश भारती ने किया है। उनका ‘रौशनी का स$फर’ यह गज़ल-संग्रह 2013 में प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी 75 गज़लें संग्रहित हैं। दरवेश भारती और उनकी गज़़लों के संबंध में विचार व्यक्त करते हुए डॉ. जीवन सिंह ने लिखा है कि गज़़ल वर्तमान की एक ऐसी लोकप्रिय काव्यविधा है, जिसमें व्यक्ति और समय के वास्तविक सरोकारों के एहसासों की एक नई ज़मीन तैयार करने की मुहिम इन दिनों परवान चढ़ रही है। ऐसे समय में दरवेश भारती सरीखे अनुभवी गज़लकार ने समय की चाल को पहचानते हुए न केवल गज़ल को अपने अनुभव दिये हैं, वरन् स्वयं के मिज़ाज को भी उसमें उड़ेला है। उन्होंने गज़ल के अनुशासन और उसकी रीति-नीति को उसके मौलिक स्वरूप में कायम रखने का प्रयत्न किया है। दरवेश भारती द्वारा ‘रौशनी का स$फर’ विगत 40-50 वर्षों में लिखी गई ग़ज़लों का चुनिंदा संचयन है। इसमें वे ग़ज़लें भी है जो ‘जमाल’ $काइमी के नाम से लिखी गई थीं और वे भी जो बाद में दरवेश भारती के नाम से लिखी गईं। इस संचयन में रिवायती और जदीद शायरी दोनों परिलक्षित होती है। इस संदर्भ में स्पष्टीकरण देते हुए जहीर कुरैशी लिखते हैं कि आप प्रश्न कर सकते हैं कि कवि तो एक है - फिर हरिवंश अनेजा ‘जमाल’ काइमी और डॉ. दरवेश भारती जैसे नामों की बात क्यों की जा रही है। मेरा उत्तर होगा कि नाम बदलने के साथ ही गज़़लों का मिज़ाज भी बदल गया है। इस संचयन की गज़लों में ‘जमाल’ $काइमी और डॉ. दरवेश भारती के शे’रों के बीच एक महीन-सी पार्थक्य-रेखा आसानी से देखी और समझी जा सकती हैं।
‘दरवेश’ की गज़़लों में हमें व्यक्ति और समाज से जुड़े विभिन्न विषयों के दर्शन होते हैं। उन्होंने अपनी गज़़लों के माध्यम से अपने जीवनानुभवों को प्रामाणिकता के साथ अभिव्यक्त किया है। दुष्यंतोत्तर हिंदी गज़़लकारों में दरवेश भारती भी एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। बदलते समय की समस्याओं पर उनकी पैनी नजऱ हैं। इसीलिए उनकी गज़लों में वर्तमान समय की त्रासदियों को देखा जा सकता है।  दरवेश भारती ने अपनी गज़लों में समसामयिक राजनीति के विकृत और घिनौने पक्ष को उजागर किया है। वर्तमान राजनेताओं की सही तस्वीर दिखलाने के साथ ही उन्होंने लोगों को जागरूक बनाने का कार्य किया है। वर्तमान राजनेता इतने भ्रष्ट हो चुके हैं कि वे अपने दायित्व को ही भूल चुके हैं। ऐसे राजनेताओं को संबोधित करते हुए वे कहते हैं -
ली थी शपथ तो मुल्क की $िखदमत के वास्ते
क्या कर रहा है, अपनी अना को जगा के देख
हम अपने जन-प्रतिनिधियों को इसलिए चुनते हंै कि वे देश को अच्छी तरह चलायें। आम आदमी की समस्याओं को दूर करें। देश और अवाम की हिफाज़त करें। किन्तु वे अपने स्वार्थ में इतने मशगूल हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं है। वे अपने स्वार्थ के लिए, वोटों की राजनीति के लिए मानवता को कलंकित करते रहते हैं। सद्भाव के स्थान पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं। ऐसे राजनेताओं पर व्यंग्य करते हुए ‘दरवेश’ भारती लिखते हैं -
जिनके हवाले की थी हिफाजत की बागडोर
इन्सानियत के कत्ल में वो सरगने रहे
धर्म की कट्टरता के परिणामस्वरूप देश के अनेक शहरों में पिछले कई वर्षों से आगजऩी, मारकाट, लूटमार तथा हिंसा की घटनाओं में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। इन सभी घटनाओं के पीछे किसका हाथ है, यह हमसे छिपा नहीं है। इस बात पर कटाक्ष करते हुए ‘दरवेश’ भारती कहते हैं -
न जाने रहनुमाओं ने कैसी भडक़ाई
तमाम शहर मिला आग में झुलसता हुआ
वर्तमान युग में राजनीतिक परिवेश की तरह ही सामाजिक परिवेश में भी अत्यंत तीव्र गति से मानवीय मूल्यों का पतन हुआ है। मनुष्य दिन-प्रतिदिन स्वार्थी एवं संवेदनहीन होता जा रहा है। अपनापन, सहानुभूति, त्याग, सहयोग, मानवता आदि से उसे कोई सरोकार नहीं है। समाज में इन्सानियत खत्म हो चुकी है। समाज में एक ऐसी सभ्यता का विकास हो रहा है, जिसमें आदमी कहीं दिखाई नहीं दे रहा है -
विश्व में विकास हो रहा है सभ्यता का यूं
आदमी तो है, मगर रहा नहीं वो आदमी
‘जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग/ इक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते है लोग’ गीत की यह पंक्तियां वर्तमान समय में सार्थक सिध्द हो रही है। अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य किसी भी हद तक जाने में तनिक भी संकोच नहीं करता। वह स्वार्थ की खातिर अपने वादों से मुकर जाता है। मनुष्य की इसी प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए ‘दरवेश’ भारती फरमाते हैं -
खुद भी तो रंग बदलने में हो माहिर तुम लोग
सिफऱ् गिरगिट को ही बेकार में रूस्वा न करो
वर्तमान राजनीति की नींव भ्रष्टाचार पर आधारित है जिसके परिणामस्वरूप लाल फीताशाही को प्रश्रय प्राप्त हुआ। नौकरशाही, तानाशाही बन गयी। हमारे देश में सरकारी कार्यालय भ्रष्टाचार के अड्डे बन चुके हैं। योजनाओं के धन का बहुत बड़ा हिस्सा नेतागण और सरकारी अधिकारी ही हड़प लेते हैं। इसीलिए दरवेश भारती कहते हैं -
जब से जाल योजनाओं का नगर-नगर बिछा
बहती गंगा में सभी को हाथ धोने की पड़ी
राजनेताओं की बातों पर अब किसी को एतबार नहीं रहा। वे जनता के दुख-दर्द की अनदेखी करते हैं। ग्राम-सुधार के स्थान पर अपना सुधार करते हैं। इस बात पर टिप्पणी करते हुए गज़लकार कहता है -
सब-कुछ निगल गया वो सुधारों की आड़ में
जिस ‘चौधरी’ की राह खड़े देखते रहे
निजीकरण, उदारीकरण एवं भूमंडलीकरण के फलस्वरूप व्यवसाय का रूप ही बदल गया है। इस बाजारवाद का प्रभाव समाज में हर घर में दिखाई दे रहा है। इसीलिए गज़लकार कहता है -
घरों तक आ गया बाजारवाद यूं यारो
कि लोग अपने ही लोगों से जा रहे हैं छले
0 0 0
ये भी हो और वो भी हो, गोया हर इक शय इसमें हो
अब तो घर को घर नहीं, बाज़ार होना चाहिए
दरवेश भारती की गज़लों में हमें कहीं-कहीं नारी-विमर्श के भी शे’र दृष्टिगोचर होते हैं। नारी पर होनेवाले अन्याय-अत्याचार का चित्रण करनेवाले शे’र तो दिखाई नहीं देते, किन्तु नारी-मुक्ति के परिणामस्वरूप विकसित होनेवाली नारी का चित्रण उन्होंने अवश्य किया है। पढ़-लिखकर नारी विविध क्षेत्रों में अपना योगदान दे रही है। शिक्षित होकर उसने समाज में अपना एक स्थान बना लिया है। उसकी सक्रियता पर प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं -
आज औरत पा रही है वो मकाम
बन न पायेगी वो दरवेश अब शिला
दरवेश भारती प्रेम और सद्भाव को अत्यंत महत्व देते हैं। उनकी मान्यता है कि प्रेमपूर्वक किया गया व्यवहार निश्चित ही व्यक्ति और समाज के लिए लाभदायी सिद्ध होता है जिससे सारे मतभेद मिट जाते हैं, मनमुटाव खत्म हो जाता है। किन्तु इसके लिए हमें सार्थक प्रयास करने की आवश्यकता है -
मोम बन जायेगा हर पत्थर-दिल
साज़े-दिल आप उठाएं तो सही
है कहां $गैर कोई दिल से ज़रा
भेदभाव आप मिटाएं तो सही
दरवेश भारती की ग़ज़लों में भी हमें दार्शनिक तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं। दरवेश भारती मनुष्य को यह संदेश देते हुए कहते हैं -
कभी दुख-ही-दुख हैं कभी सुख-ही-सुख
हैं ‘दरवेश’ जीवन की ये झांकियां
दरवेश नई पीढ़ी के रवैये से खुश नहीं हैं। बदलता सामाजिक परिदृश्य उन्हें आशादायी नहीं लगता। एक ज़माना था जब समाज और परिवार में बड़े-बूढ़ों की इज़्ज़त की जाती थी। किन्तु इस नए ज़माने में उन्हें कोई इज़्ज़त नहीं देता, बल्कि वे अब नई पीढ़ी के लिए बोझ बन गये हैं। इस बात पर कटाक्ष करते हुए गज़लकार कहता है -
हासिल न हो सका बड़े-बूढ़ों को सुख कभी
चाहे सपूत उनके कमाते रहे बहुत
000
बड़ों की जो न करे खिद्मत उनके जीते-जी
शुमार क्यों न हो नाम उनका नामुरादों में
निष्कर्षत: हम कह सकते है कि दरवेश भारती का हिंदी गज़ल साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी गज़लों में परम्परागत एवं नवीन प्रयोगधर्मी शायरी का सुंदर समन्वय हुआ है। चिंतन के विविध आयाम उनकी गज़लों में परिलक्षित होते हैं। कम से कम शब्दों में अपनी बात को कहने का उनका अंदाज़ ही निराला है।