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Wednesday 22 Nov 2017

दोहे :अपने अपने तीर


पाठ अहिंसा का पढ़ा गये बुद्ध, महावीर।
सबने पैने कर लिए, अपने-अपने तीर।

जीवन भर सन्मार्ग की, खातिर रहे फकीर।
अब पंथों में बंट गये, दादू और कबीर।।

सिर्फ कथानक रह गए, बेगम और वजीर।
ऐसी छीनी वक्त ने, लोगों की जागीर।।

घर छोड़ा जिस शख्स ने, लड़ा स्वयं से युद्ध।
कोई तुलसी बन गया, कोई गौतम बुद्ध।।

जब से आया चलन में, है एकल परिवार।
दादी नानी के सजल, दुर्लभ हुए दुलार।।

सावन भी सूखा रहा, सूखा गया अषाढ़।
महंगाई से धुल गये, क्या मुजरे क्या माढ़।।

दादा पटवारी रहे, जिनके बाप अमीन।
नहीं रही उनके सजल, पैरों तले जमीन।।

साथ रहा अधिकांश के, जीवनभर दुर्भाग्य।
कुछ के पीछे दौड़ता, रहा सदा सौभाग्य।।

पीहर जा बैठी बहू, लड़ा सास से चोंच।
पति, ससुर, परिवार के, मन पर खिंची खरौंच।।

जिसके पाले में रहे,  गुणा, जोड़, ऋण, भाग।
उस घर के हर दौर में, चर्चित रहे चिराग।