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Sunday 19 Nov 2017

बग्गड़ की कहानी उर्फ पंद्रह अगस्त की सुबह 3

 

ऐइसे बैठ गया
जैसे सत्तर साल का बूढ़ा
जाने फिर का भया
बिगड़ गया हमरे अंदर का बग्गड़
हमरा वर्तमान भूत होय गवा
हम झपट के पकड़े मिक्कू का हाथ
चल बिटवा झंडोलन में

रोकत रही सुरसतिया
हम लेकिन अपना भविष्य को खींच गले
जाय पहुंचे उस मैदान में
इस्कूल की चौहद्दी के अंदर
न भीड़ के रोके हम रूके
न कुछ कर पाये रंगे सियार
ऐसी होय गई हमरी हुंकार
मिक्कू, ले खींच ई रसरी
उड़ा दे अपना झंडा
बिना सोचे मिक्कू के हाथ उठे
खींच दिया ऊ रसरी
लहराया ऊपर में झंडा
फूलन की वर्षात हुई
मिक्कू के चेहरे पर धूप खिली

फिर हमका नहीं पता
का....का....का....का हुआ
कि का....गा....का..... गा.... हुआ

कुछ मज़दूर हमारे साथी थे
जो हमको लिये बचाय
एक-एक अंग दुख रहा था पीड़ा से
सांस मगर चल रही थी
मिक्कू, पिंकी, सुरसतिया सबही रोय रहे थे
लेकिन हम बोले उनका ..
नहीं रोना है, अभी हम जिंदा हैं
अगले साल फिर झंडोलन करना है।