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Saturday 18 Nov 2017

बग्गड़ की कहानी उर्फ पंद्रह अगस्त की सुबह 2

बाबू ढोये झांका
गाड़ी के नीचे आए
फिर हम बने मज़दूर

बिटवा हम तो यही सुना है
झंडोलन के दिन कोई नेता
आवत है आकाश से
फहरावत हैं झंडा
उड़ावत हैं बैलून
औउर उड़ जात हैं बैलून के साथ
ऊपर, बहुत ही ऊपर
जहां न हम उनका देख सकें ।
मिक्कू गुस्साया था हम पर
ऊ सब नहीं सुनना है हमको
कल स्कूल में झंडोलन है
इस्त्री ड्रेस पहन के जाना है
एही से रात में दू-दू बार
ऊ चौंक के जागा था
हुआ सवेरा?

पिछले सात महीने से
बंद पड़ा है करखाने का गेट
लेकिन मिल के चारों ओर
मंदिर, मस्जिद, गिरजा और गुरूद्वारा
सब का गेट खुला है
ई कौनो नहीं बोला
बंद है जब करखाना
तो पूजा कैसे होय
पंडितजी तो पहले
खूब प्रेम से गाते थे
भूखे भजन न होय गोपाला
मुदा अब नहीं गाते हैं
खाली बजावें घंटी
और पढ़त हैं मंतर

चौधरी बाबू बोला करते थे हम मज़दूर से
टाका माटी, माटी टाका
कैसे बतलाते हम चौधरी बाबू को
कि दादा काटे माटी
बाबा ढोयें झांका
औउर हम बने मज़दूर
पर मिला नहीं ई टाका
माटी भी नहीं अपने पास

भोर की आवाज सुनि के
मेघ मल्हार गाते-गाते
कहीं दूर छिटक गये सब
जैसे मिल के गेट मीटिंग के बाद
हम मज़दूर साथी तितर-बितर हो जाते थे
देते-देते जिंदाबाद का नारा

अब मुदा ऊ बात कहां
ठर्रा पीके सब चुल्लू भर पानी में डूब रहे
बेचारी सुरसतिया सीता मैया के गांव की
घर-घर मांजे बर्तन
औउर हम भी भये न राम
कि रखते बाण धनुष पर
औउर सागर जैसा मालिक हाथ जोड़ के कहता .
ठहरो-ठहरो, खोल रहे कारखाना

सात बजे का टेम था
सूरज बाबा मुस्काय रहे
काहे कि धरती पस्त हाल होय रही थी
पानी उलीच-उलीच के
कि तबहीं जोर से चीखा था मिक्कू
हम कैसे जायें झंडोलन में
कैसे मिठाई खायेंगे
भीग गया है ड्रेस हमारा
दाग लगा है चारों ओर

फिर ऊ आपन दूनो घुटना के बीच
डार के अपनी गर्दन