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Wednesday 22 Nov 2017

बग्गड़ की कहानी उर्फ पंद्रह अगस्त की सुबह 1


कुशेश्वर
पी166, मुदियाली फस्र्ट
लेन कोलकाता-24
मो. 9831894193
कल रात
हमरा घर
रोअत रहा वर्षात मा
औउर हम चार जने भी
बिसूरते रहे ओके संग

हम बग्गड़
सुरसतिया हमरी घर वाली
मिक्कू हमरा बेटा
और रिंकी हमरी बिटिया
चारो जने कोने मा दुबके
आपन सिर को रहे बचाते

एक सिर ही तो है आदमी के पास
जब तक बचा है
ऊ बचा है
कबहूँ तनि के
कबहूँ झुकि के
इ सिर ही तो है
टोकत है हमका बार-बार
जब हमरे घर दया नहीं बरसती
धन नहीं बरसता
तो घन-घन बरसे काहे
ससुरे जाके बरसें कहीं औउर
खेत, नदी नाला, जंगल और पहाड़
हमरी रात पहाड़ बनाये की जरूरत का?

बापो हमरा सही नहीं था
जनमाया हमको काहे
जब मज़दूर बनाना था
ई कक्षा पांच पढ़ाके
सुरसतिया भी जि़द्दी ऐसी
मूरख नहीं रहेंगे हमरे बच्चे
हम कक्षा सात पढ़ी हूं
ऊ दूनो बी.ए. पास करेंगे
ई सुनो, बाप मारी में ढकी
बेटा तीरंदाज
अरे ! हमरे दद्दा मंगरू काटे माटी
झगड़ू बाप ढोया झांका
और हम बने मज़दूर
ऊपर से काम नहीं है पूरा
बंद पड़ा करखाना
का खायें, का पहनें
का बच्चन को देंय
फिर भी हम माने सुरसतिया की बात
सीता जी की जि़द मृगा की।

कल जब मिक्कू आयके
हमरे गले लिपट के बोला
पापा, कल हमरे इस्कूल में झंडोलन होगा
का होता है पंद्रह अगस्त,


कौंउच गए थे हम
हम का जानें पंद्रह अगस्त
हम जन्मे नाहीं ऊ दिन
अरे, जब अकाल पड़ा था देश में
वहा गांव छोड़ के आए थे इहां परदेस
काटे माटी