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Monday 20 Nov 2017

तिमला


2सुजाता रंगराजन
हिन्दी अनुवाद : र. शौरि राजन
247, 41-स्ट्रीट,
सेक्टर-8, के.के. नगर,
चेन्नई-600078 (तमिलनाडु),
मो. 9840310997
‘आप से मिलने आपकी...’’ बात पूरी करने से पहले ही आत्मा ने टोका, ‘‘कितनी बार बोल चुका हूं, इस हाई टाइम पर विजिटर को इजाजत मत दिया करो!’’
दरवाजा गु़स्से के साथ खोला गया, ‘‘मैं विजिटर नहीं हूं, तुम्हारी पत्नी, धर्मपत्नी।’’
‘‘ओह! नित्या, तुम?’’
‘‘अंदर आ सकती हूं?’’
‘‘मजे से, तुम्हें कौन रोक-टोक सकता है? पास आओ, एक बात बतानी है।’’
नित्या उसके निकट गई नहीं, सिर्फ घूर कर देखा। आत्मा की टेबल पर टर्मिनल स्क्रीन पर अक्षरावालियां तेजी से गुर रही थीं। दीवार पर लम्बे-चौड़े, लाल-हरे मानचित्र सजीव दिख रहे थे, जो आत्मा एंड कंपनी की मौजूदा तुष्टि-पुष्टि की ऐलानी नक्शे जैसे थे।
आत्मा टचफोन पर ‘न्यूयार्क’ बोलने के बाद बोला, ‘‘बैठो नित्या!’’
नित्या वैसे ही हाथ बांधे खड़ी-खड़ी पति को गौर से देख रही थी।
‘‘न्यूयार्क... न्यूयार्क।’’
‘‘न्यूयार्क सर!’’
‘‘कितना चाहिए उनको?’’
‘‘बीस मिलियन (करोड़)।’’
‘‘उन्नीस पर निपटा लो?’’
‘‘निक्स सर!’’
‘‘खरीदार कौन?’’
‘‘रॉ चाइल्ड।’’
‘‘वह गिद्ध का बच्चा? एक मिनट रूको, न माने तो 19 करोड़ 40 लाख रुपए तक बढ़ो।’’
‘‘हां जी।’’
आत्मा ने टचफोन से सिर उठाकर नित्या को देखा, पल-भर मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘बहुत बिजी हूं, डार्लिंग! इस वक्त आने की तकलीफ क्यों उठाई?’’
नित्या बोली नहीं, आत्मा ने कोट के भीतर हाथ डालकर पेसमेकर के सहारे दिल की धडक़न बढ़ा ली और दिमाग के लिए खून-ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ा ली। अब सटीक सोचना उसके लिए आसान हो गया।
टर्मिनल पर्दे पर चित्र अब भी थिरक रहे थे। आत्मा ने उन्हें पल-भर अविचल करके परखा , फिर कहा, ‘‘ग्रेट! मिनट भर में। लाख रुपए कमा लिया मैंने। नित्या, खड़ी क्यों हो? बात क्या है...?’’
‘‘मैं कौन हूं, पता है तुम्हें?’’
‘‘पगली, ऐसा भी पूछा जाता है? तुम मेरी धर्मपत्नी हो, प्यारी भार्या!’’
‘‘...हलो, न्यूयार्क? उनतीस पर पचास? ना, ना चालसी सेकेंड और रूको, पैंतालिस पर उतर आएगा तब फाइनल कर  दे। नित्या! कुछ कहा?’’
‘‘कुछ नहीं, अपने प्राणप्रिय पतिदेव के चलते-पुर्जे अंदाज को देख रही हूं।’’
‘‘नित्या! क्या चाहिए तुम्हें?’’
‘‘आत्मा! मुझे चाहिए तुम, तन-मन समेत तुम!’’
‘‘सामने तो हूं?’’
‘‘मेरे सामने है एक धन कमाऊ मशीन, मेरी ‘आत्मा’ नहीं।’’
‘‘धन-दौलत में बढ़ी ताकत है नित्या इधर आने का क्या कारण है, इस बारे में चालीस सेकण्ड में बता दो।’’
‘‘आत्मा! घंटे भर के लिए तुम, मात्र तुम, मुझे चाहिए।’’
‘‘रात को तो आ ही जाता हूं।’’
‘‘आते हो, कैपसूल निगल लेते हो, दिल की धडक़न कम कर लेते हो, तुरंत सो जाते हो। सुबह उठकर देखती हूं। बिस्तर खाली पड़ा है। यही तो रोजाना चलता है. पति होने का अर्थ समझते हो?’’
‘‘हम अक्सर स्टी.वी. में बात कर लिया करते हैं, फिर क्या?’’
‘‘वह तो सिर्फ तुम्हारा बिम्ब है, छवि वाला बिम्ब! मुझे चाहिए असली खालिस तुम।’’
‘‘हेलो! टोकियो?...’’ नित्या ने टेलीफोन छीनकर बंद किया।
‘‘क्या कर रही हो नित्या?’’
‘‘मिस्टर आत्मा! मेरी बात ध्यान से सुनो। पिछले साल ‘तिमला’ जाने की अनुमति के लिए अर्जी भेजी थी हमने, याद है?’’
‘‘उससे क्या?’’
‘‘अनुमति मिल गई।’’ नित्या ने सोत्साह पीले रंग का कार्ड आत्मा के सामने बढ़ाया। उस पर कम्प्यूटरी अक्षरों में छपा था : तिमिला प्रशासन
आपकी अनुमति-प्रार्थना : 20.02.2080 पूर्वान्ह 10:16 बजे
आपके लिए समय निर्धारित। ठीक समय पर प्रवेश द्वार पर उपस्थित रहें। यह अनुमति-पत्र साथ लाएं। आपकी दर्शनार्थी सं. 154396 (यह नकली कागज है)।
आत्मा ने कार्ड लौटाते हुए कहा, ‘‘लो, आखिरकार अनुमति मिल गई, संतोष की बात है। तुम हो जाओ नित्या।’’
नित्या को क्रोध तो बहुत आया पर नम्रता से बोली, ‘‘आत्मा! तुम भी साथ चलो, नहीं तो इस ऑफिस को तहस-नहस करके ही दम लूंगी, सब कलपुर्जों को तोड़ताड़ कर कचूमर निकाल दूंगी।’’
‘‘रुको, रुको। नित्या डियर! कब चलना है?’’
‘‘कल सुबह 10:16 को।’’
‘‘कम्प्यूटर! कल सुबह 10:16 को फ्री हूं।’’
भयंकर स्वर गूंजा, ‘‘कल सुबह 10:16 को वत्ता नपे आ रहे हैं।’’
‘‘ओह, माइ गॉड! वत्ता नपे जापानी, $खास ठेकेदार चंद्रकेन्द्र का। सॉरी, नित्या! मैं आ नहीं सकता।’’
नित्या अब जमकर बठ गई- ‘‘नहीं, तुम्हें कल मेरे साथ चलना ही होगा। टेलीफोन मुझे दो। उस जापानी से मैं बात करती हूं। हेलो कम्प्यूटर! वत्ता नपे को बुलाओ।’’
आवाज आई, ‘‘सॉरी, कनेक्शन मिल नहीं रहा।’’
‘‘हट जा नासपीटे! अपना सिर खा ले।’’
‘‘सॉरी! अपना सिर नहीं।’’ कम्प्यूटर का जवाब।
‘‘सब्र करो नित्या! मेरा साथ चलना लाजमी तो नहीं, जबकि मुझे ‘तिमला’ में कोई रुचि नहीं। तुम उतावली हो, तड़प रही हो, अकेली हो जाओ। फिर कभी हम साथ चलेंगे।’’
नित्या बरस पड़ी, ‘‘आत्मा! कैसे समझाऊं? पहले ही तय हो चुका है कि हम दोनों एक साथ चलेंगे। एडमिशन कार्ड देखो। दो लोगों के लिए अनुमति मिली है।’’
‘‘तुम्हारे साथ एक आदमी भेज दूंगा।’’
नित्या रो पड़ी।
‘‘नित्या डार्लिंग! यह क्या कर रही हो? इस जमाने में कोई रोता नहीं।’’
नित्या बिलख-बिलख कर रोती रही।
‘‘यह देखो, माई डियर! तुम्हें किस बात की कमी है? जब हमारी शादी तय हुई, तभी मैंने कहा था ना? हमारी जिदगी ऐसी ही होगी...’’
‘‘मैं सि$र्फ एक घंटा तुम से मांग रही हूं। कोई पहाड़ खोद के उठा लाने को नहीं कहती, समझे?’’
‘‘अच्छा जी! ऐसा हो सकता है कि... यह बताओ, तिमला कितनी दूर है यहां से?’’
‘‘डेढ़ सौ कि.मी.।’’
‘‘पहले तुम निकलो। मैं उस जापानी से डील पूरी करके वहां आ जाऊंगा।’’
‘‘हरगिज नहीं, जानती हूं कि तुम टाल दोगे, आओगे नहीं। मैं अभी चली जाती हूं। मुझे कुछ नहीं चाहिए। तुमसे शादी करके भारी $गलती कर चुकी हूं। एक कम्प्यूटर को ब्याह लेती, तो बेहतर होता... ऐ कम्प्यूटर, मुझसे शादी करने को तैयार है तू?’’
आवाज आई, ‘‘सॉरी, जवाब नहीं।’’
आत्मा हंस पड़ा।
‘‘हंस रहे हो। आग-सी लग रही है, जल रही हूं। मुझे लगता है, हम अलग हो जाएं। मुझसे ब्याह करने के लिए दस आदमियों ने अर्जी भेजी हुई है।’’
‘‘ऐसा मत कहो नित्या!’’
‘‘फिर क्या?’’
‘‘तिमला में क्या $खास रखा है?’’
‘‘$खासियत है, मेरा $खास मतलब भी है। वहां हो आना मानसिक शांति-संतुलन के लिए परम आवश्यक है। वहां हमें जो आश्वस्ति और सांत्वना मिल सकती है। वह इस दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगी, समझे?’’
‘‘इस सदी में ये ख्याल बेहूदा माने जाते हैं।’’
‘‘आत्मा! तुम एक बार तिरुमला आकर देखो। तुम्हारी सोच-समझ में परिवर्तन आएगा। शांति मिलेगी, सुखद शांति, कहा जाता है कि दंपत्ति समेत तिरुमला हो आना बहुत मंगलकारी है।’’
‘‘इस बार क्षमा कर दो। एक और प्रार्थना-पत्र भेज देंगे अनुमति के लिए... हेलो न्यूयॉर्क। क्या हुआ?’’
नित्या ने टेलीफोन को छीनकर जमीन पर पटक दिया। हाई इंपैक्ट पालीमर में बनाया गया टेलीफोन टूटा नहीं, खराब भी न हुआ। आत्मा उसे उठाकर मेज पर रखते हुए मुस्कुरा कर बाला- ‘‘गुस्सा न करो मेरी सहधर्मिणी देवी।’’
‘‘इस क्षण से मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हंू।’’
इतने कम्प्यूटर की सूचना गूंजी, ‘‘नई खबर आई है।’’
‘‘क्या है?’’
‘‘वत्ता नपे की सूचना, दूसरा बहुत जरूरी काम होने से वह कल इधर आ नहीं सकते। माफी चाहते हैं।’’
नित्या खिल उठी। चिल्लाई, ‘‘जय हो वत्ता नपे की। हे कमम्प्यूटर! तुम्हारी जय हो।’’
कम्प्यूटर बोला- ‘‘यह अति उत्साह काहे को?’’
‘‘फिर भी धन्यवाद! अल्ट्रा कंपनी की तरफ से आप को सलाम।’’
आत्मा हंस पड़ा।
‘‘अब भरा मन? तुम्हारे साथ कल चलूंगा। एक ‘किस’ प्लीज।...’’
नित्या ने आत्मा के होंठों को भावावेश में चूम लिया।
दूसरे दिन सुबह 9 बजे तैयार हो गई। ‘स’ टी.वी. कार्यालय से एक दिन की छुट्टी मांग ली। खुद को थोड़ा सजा लिया। सिंथरान में मनपसंद गाना भर लिया। बैग में जरूरी चीजें ले ली। टेलीफोन पर आकाश-यान (टैक्सी) को बुला लिया।
9.15 बजे कुली छत पर आकर $खड़ी हो गई। वक्त $काफी था। तिमला, अरसे की चाह, मन्नत पूरी करने वाला धाम तिमला। पति समेत हो आने का संकल्प एक साल से पूरा नहीं हुआ था, सो अब पूरा होगा। नित्या इतर नारियों जैसी नहीं है। पति-पत्नी के संबंध की अर्थहीन मान्यता इस सदी की उपज है। नित्या इसे मानती नहीं। दांपत्य उसके लिए सार्थक सोद्देश्य भावना प्रधान प्यारा रिश्ता है। उसका विश्वास है, पति-पत्नी के संबंध में, सह जीवन में अब भी कवितामयी मधुर भावनाएं बरकरार हैं।
आत्मा का कहना था कि नित्या पर जींस का दुष्प्रभाव हावी है, होने दो, यह दुष्प्रभाव अच्छा लगता है। नित्या की मान्यता है, मुझे एक पुरुष पति पर्याप्त है। वह आत्मा है अब तक, बस मेरे सुख-दुख उसी के साथ रमे रहें।
हल्की आवाज निकालता हुआ आकाश यान निर्दिष्ट स्थान पर आ खड़ा हुआ। नित्या उसमें बैठ गई।
‘‘कहां जाना है?’’ चालक ने पूछा।
‘‘पहले अजाक्स बिल्डिंग चलो। वहां से पतिदेव को लेकर तिमला जाना है, 10:15 बजे तक। तुम्हारे पास बूस्टर है?’’
‘‘है तो, वक्त तो काफी है, अजाक्स भवन में कितनी देर ठहरना पड़ेगा?’’
‘‘पांच मिनट।’’
‘‘ठीक है।’’ स्काई टैक्सी उड़ चली।
अजाक्स भवन पर उतरते समय 9 बजकर 40 मिनट, 30 सेकेंड हुए थे।
‘‘अभी आई।’’ कहकर नित्या हाई-स्पीड लिफ्ट से उतरकर आत्मा के कमरे में घुसी। हस्बमामूल आत्मा धन-राशि पर बातचीत कर रहा था।
‘‘हेलो लंदन! सुप्रा मेट्रो पर डॉ. टॉमिलसन को बुलाओ... हेलो, नित्या!’’
‘‘देर हुई जा रही है, उठो जी, जल्दी निकलो।’’
‘‘एक मिनट... डॉ. टॉमिलसन, आत्मा हेयर, आई.एम. होल्डिंग, ... नित्या! हम कहां जा रहे हैं?’’
‘‘जहन्नुम में... ‘तिमला’ भूल गये?’’
‘‘ओ यस, तिमला.... तिमला, हमें प्रवेश अनुमति मिल गई है न? आधे घंटे का वक्त बाकी है न? अभी आ जाता हूं।’’
नित्या आत्मा को जबरन उठा लाई, 10 बज चुके हैं। 10:16 बजे की प्रवेश-अनुमति है। नित्या की चिंता बढ़ गई। हे भगवान! ट्रैफिक जाम न हो जाए, सही सलामत वक्त पर तिमला जा पहुंचना है...’’
‘‘ड्राइवर! 10:16 बजे हमें वहां उपस्थित रहना है।’’
‘‘चिंता न कीजिए, फ्यूल सेल्स नये सिरे से चार्ज किए हुए हैं। बूस्टर भी है। हां बताइए, तिमला में फ्लाइट फार्म पर उतरना है?’’
‘‘पता नहीं।’’
‘‘आपके अनुमति कार्ड का रंग क्या है?’’
‘‘पीला।’’
‘‘तब तो दसवां फ्लाइट फार्म है।’’
आकाश-यान तीर की तरह उड़ चला। तेजी का असर नित्या अपने पेट में महसूस करने लगी। आत्मा से सटकर बैठ गई।
तिमला वे पहुंचे, तब समय था दस बज कर चौदह मिनट, चालीस सेकंड, नित्या को बड़ी आश्वस्ति हुई कि सही-सलामत ‘तिरुमला’ आ पहुंचे।
लम्बे प्लेटफार्म पर चहल-कदमी कम थी। ‘‘तिमला पर आपका सादर स्वागत है।’’, सोडियम रोशनी पर चमक रहा था। नित्या तेजी से बढ़ी। लंबी चौकोर मशीन पर सूचना छपी थी, अपना अनुमति कार्ड यहां ठूंस दें।
नित्या ने ऐसा ही किया। चुंबकीय अक्षर पढ़े जाने के बाद सूचना गूंजी, ‘‘आप एक मिनट पहले आ गए। सीधे चलकर बाई तरफ मुडिय़े, नौंवी कन्वेयर दीर्घा के गेट पर पहुंचे। ऊपर नारंगी रंग की रोशनी चमकी, सूचना गूंजी ‘‘30 सेकंड पर प्रस्थान आरंभ होगा।’’
आत्मा, नित्या दूसरों के साथ गेट पर कर खड़े रहे। नारंगी रंग लाल रंग में बदल दिया टर्न स्टाइल गेट बंद हुआ। ‘उश’ करके बेल्ट सरकता चला गया। पास वाले मंडप पर धीरे चलकर आगे थोड़े तेज रफ्तार में परिक्रमा कर आगे बढ़ा। गोपुर का दर्शन हुआ। नित्या के दिल की धडक़न बढऩे लगी। भाव-विभोर होकर आत्मा से चिपक गई।
प्रधान कपाट खुला था। दूर से दर्शन कर नित्या उमंगभरी उछल पड़ी...
‘‘देखो आत्मा. वही... वही...’’
वेग कम हुआ, 10:16 बजे आत्मा नित्या को अंदर प्रवेश मिला। हल्की-सी आवाज एयरकंडीशनर की आती रही। निकट... और निकट...
‘‘आहा! कितना जाज्वल्यमान! भव्य दिव्य गंभीर स्वरूप!’’
‘‘आपको ठीक 20 सेकेंड का समय मिला है। मन भर दर्शन कर लें। ऊपर से सूचना गूंजी। त्रिपुड़धारी वैष्णव पुजारी चमकदार रेशमी धोती पहने हुए थे। पूछने लगे, ‘‘अर्चना करना है? किस भाषा में?’’
‘‘तमिल’’ नित्या बोली।
पुजारी ने पास वाला बटन दबाया। मधुर धुन फैलने लगी। महिला के मीठे कंठस्वर में वैष्णव संत नम्मालवार का भक्तिपूर्ण तमिल गीत सुनाई पड़ा।
‘‘दर्शन कीजिए। दर्शन कीजिए। आंख भर, मन भर दर्शन कीजिए। भगवान श्री वेंकटेश्वरजी, श्रीनिवासजी, बालाजी, सहस्र नाम हैं भगवान के। पिछली सदी में इस तीर्थधाम के प्रचलित नाम थे। तिरुपति, तिरुवेंकटम्, तिरुमलाई, सप्तगिरी आदि। अब तो कम्प्यूटर की सुविधा के लिए छोटा करके ‘तिमला’ रखा गया है। ये भूलोक के प्रत्यक्ष दर्शनीय भगवान सर्वेश्वर हैं। प्राचीन मंदिर है यह। दर्शन कीजिए।’’
‘‘श्रिय: कांतायकल्याणनिधमे निधमेहऽर्थिनाम्।
श्रीवेंकटनिवासाय श्रीनिवासाय मंगलम्।।’’
कर्पूर आरती की प्रभा में दर्शन करते हुए आत्मा उमगकर बोल उठा, ‘‘वाह थ्रिलिंग...’’ ठ्ठ