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Saturday 18 Nov 2017

ड्रायवर


शुक्ला चौधरी
म.नं. 88, जे.पी. विहार, मंगला बिलासपुर (छ.ग.) 495002
मो. 8109748188,
नोनी सपने में खोई थी।
सपने में सुन्दर था जो कहता है- ‘‘एई नोनी, मुझसे दोस्ती करेगी?’’
नोनी कहती है- ‘‘नहीं, कभी नहीं।’’
‘‘कोहे?’’
‘‘तू ड्रेभर है ड्रेभर!.. भाग हियां से...’’
सुन्दर हंसता है...। सुन्दर की हंसी में नोनी घुलने लगती है... कि अम्मा का बर्फीला हाथ नोनी को झकझोरता है...
‘‘उठ, उठ... बेर होने को है और तू है कि...’’
‘‘और थोड़ा सोने दे न अम्मा...’’ बिस्तर पर करवट बदलते हुए नोनी कुनमुनाई।
‘‘नाहीं बिटिया, तीन घरों का काम है...’’
नोनी फिर भी न उठी, कथरी को चारों ओर से लपेटती आंखें मूंद लीं।
‘‘उठ न मरी! खाट पर पड़े-पड़े क्यों अपना जांगर तोड़ रही है...?’’
‘‘सुबह का बखत गारी मत दे अम्मा कहे देती हूं हां...’’ नोनी कथरी सरकाकर तड़ाक से उठ बैठी।
बहरी को लगा नोनी एकदम नाग के नानकुन बच्चे की तरह फुंफकार रही है। पता नहीं इस छोरी को भी आजकल क्या हो गया है, उसने मन में सोचा। फिर सम्भलते हुए नर्म लहजे में बोली- ‘‘मत उठ, मुझे क्या... अस्कूल नहीं जा पाएगी तो हमें कोसना मती...’’
नोनी अब खाट से कूद गई।
‘‘दिदिया चली गई का अम्मा।’’
‘‘कबके...। पांच घरों में उसे नाश्ता-खाना पकाना होता है, अभी से नहीं जाएगी तो कैसे चलेगा।’’
‘‘हूं...’’ नोनी जल्दी-जल्दी हाथों से मुंह पर पानी का छींटा मारने लगी।
बिचारी दिदिया।... नोनी को अपनी दिदिया पर बड़ा तरस आता है। एक साल पहले भागी थी किसी ड्रेभर के संग। भागी थी तो भागी थी, प्यार करती थी दिलोजान से। यहां बात बनी नहीं तो भाग गई, इसमें क्या... पर, फिर मिली ही क्यों?... इतना हंगामा, शोर-शराबा... कायर! मरा ड्रेभर।... दिदिया को छुपाने के लिए यही गांव मिला था दुनिया में। नोनी के मुंह का स्वाद कसैला हो गया। उसने चाय का गिलास परे ढकेल दिया।
‘‘का हुआ, जुड़ा गया का? ला, गरम किए देती हूं।’’
‘‘नहीं, रहन दें। ये चाय है! न शक्कर, न दूध।’’
नोनी ने मुंह बिचकाया। कोने में चूल्हा सुलग रहा था गन-गन। आंच के पास बैठी अम्मा हाथ-पांव में तेल चुपड़ रही थी। बाबू की नींद अभी टूटी नहीं थी, वो भी शायद अम्मा के बुलाए के इंतजारी में था। अम्मा दस बजे तक निकलेगी काम पे। जब से दिदिया घर आई है, फिर से चंगा हो गई है अम्मा। बनाव-सिंगार की भी कोई कमी नहीं। मेम साहबों का दिया बाली-चूड़ी पहनकर कमर मटकाती चार घरों का काम कर चार बजे तक घर लौटती है। खनका ले अम्मा और दो-चार साल ये चूड़ी-पायल, फिर देखूंगी।
नोनी मन ही मन मुस्कुराती हुई आंगन में निकल आई। अभी पौ पूरी तरह से फटी नहीं थी। ठंड की सुबह, छ: बजने पर भी घुप अंधेरा। स्वीटी मेम ठीक छ: बजे दरवाजा खोल देती है। बड़ी तेवर वाली है स्वीटी मेम। अंगरेजी स्कूल में मास्टरनी, बड़ी रौब दिखलाती है। अब नोनी के पास एकदम टैम नहीं, वह उडऩे लगी और पलक झपकते पहुंच गई एक सौ दस यानी स्वीटी मेम के क्वार्टर के सामने गेट खुला हुआ था। अन्दर घुसते ही मेम की तीनों बिल्लियां दौड़ आईं और नोनी के पैरों से लिपटने लगीं। म्याऊं... म्याऊं...
...ऊं  हूं, परे हट... नोनी फुसफुसाई। ...म्याऊं... म्याऊं... ढीठ बिल्यिां हट नहीं रही थी...
‘‘आ गई, नोनी?’’
‘‘पहले काफी बना फटाफट’’
‘‘...............’’ नोनी किचन में भागी।
बिल्लियों को दूध दे दे नोनी’’
नोनी बिल्लियों को परे धकेलकर किचन में दाखिल हुई। कौन-सा काम पहले करे, काफी बनाए या बिल्लियों को दूध दे। उसने गैस जलाकर दूध चढ़ाया। सफेद गाढ़ा मलाईदार दूध। नोनी ललचाई। हूं... जानवरों के लिए मलाईदार दूध और मनई के लिए ठेंगा... नोनी बुदबुदाई। बिल्लियां पैरों से लिपटी जा रही थीं- ‘‘जा जा भाग...’’ ‘अच्छा रुक, पहले तुम तीनों को दूध देती हूं’... नोनी ने पहले आधा कप कुनकुने दूध में पानी मिलाकर एक पतीली में बिल्लियों को पीने के लिए दे दिया।
‘‘क्या हुआ नोनी, स्कूल जाना है कि नहीं? जल्दी कर’’, मेम चिल्लाई।
नोनी मुस्कुराई। अगर जल्दी थी तो बना न लेती अब तक- नोनी मन ही मन बोली।
‘‘शक्कर कम डालना...’’
नोनी पहले तो एक कप मलाईदार दूध गटक गई, फिर काफी बनाने लगी। एक कप अपने लिए भी, फिर जूठे बर्तनों के बीच छिपा दी और चल पड़ी मेम के पास...। ‘‘लाई? दे... काफी बनाने में इतनी देर क्यों लगी, जैसे यह काफी न हुई, बीरबल की खिचड़ी हुई...!’’
‘‘....’’ नोनी जाने लगी।
‘‘नोनी, ... रुक तो जरा’’... नोनी रुक गई।
‘‘आटा सान लेना...’’
‘‘..........’’
‘‘सब्जी काटकर पानी में भिगो देना, समझी!’’
‘‘......’’
‘‘अब जा...’’
‘‘.........’’
‘‘जा न, खड़ी क्यों है? ज्यादा नखरे मत दिखा, बर्तन आज बहुत कम है...’’
बर्तन कम है का मतलब दूसरा काम मत्थे चढ़।
नोनी किचन में आई। छुपाई गई झागदार कॉफी निकाली, फिर एक घूंट में पी गई।
नोनी बर्तन मांजने लगी।
‘‘आवा•ा मत कर लडक़ी, कान भन्ना जाता है...’’
नोनी हंसी। बिना आवाज के भी भला बर्तन मांजा जाता है! खुद मांज कर दिखाए!
घड़ी में अभी आठ नहीं बजे थे। नोनी का काम खतम। खड़ी हो गई मेम के सामने...
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘..............’’
‘‘तू क्या जादूगरनी है?... अभी आठ भी तो नहीं बजा और सारा काम कर लिया। ’’ मेम भरपूर अंगड़ाई लेकर उठ बैठी- ‘‘जरा बालों में तेल तो लगा दे... वो देख फ्रिज के ऊपर रखा है, ले आ...’’
नोनी तेल ले आई।
‘‘ले लगा, एकदम पोर-पोर में समा जाए ऐसा लगाना।’’
नोनी तेल लगाने बैठी। काले बालों के नीचे कहीं-कहीं पके बाल चांदी की तरह चमक रहे थे। ये लो मेम तो बुढ़ा गई!
‘‘तेरी उंगली में जादू है नोनी, मुझे फिर से नींद आने लगी...’’ - तो सो जाओ न, किसने मना किया है आलसी कहीं के! -नोनी बंद होठों के अंदर अपने से ही बतियाती है।
फ्रिज के ऊपर तेली की शीशी रखकर नोनी जाने लगी, अभी दो घर और बचे हैं।
‘‘अरे सुन...’’
‘‘....’’ नोनी खड़ी हो गई।
चोर लगती है लडक़ी। एक नम्बर की घाघ। पता नहीं किचेन से क्या-क्या मारकर आई है। पर काम अच्छा करती है। ... मेम मन ही मन सोच रही थी।
‘‘सुन नोनी...’’
‘‘.....’’
‘‘फुली कहां है री?’’
‘‘..........’’
‘‘सुना है बैचलरों के घर खाना पकाने का काम पकड़ा है...’’
‘‘....’’
‘‘तेरी अम्मा भी न! ... जानबूझकर लडक़ी को शेर के मांद में ढकेलती है, फिर बाद में इतना शोर मचाएगी कि कान पर उंगलियां रखनी होगी।’’
‘‘.........’’
‘‘तेरी अम्मा से कई बार कहा कि बहरी, फूली या नोनी को मेरे पास छोड़ दे, जी खा लेगी और क्या, ... पर बहरी सुने तब न!’’
‘‘...............’’
‘‘अच्छा, अब तू जा... तुझे तो स्कूल भी जाना है न!..... एई नोनी, क्या बनेगी रे पढ़-लिखकर डॉक्टरनी? ... या तू भी भागेगी फूली की तरह... मेम हंसी जा रही है।’’
नोनी अब और खड़ी नहीं रह सकी, भाग आई वहां से। कितना बुरा हंसती है मेम, फूली भागी थी। भागी थी तो भागी थी, तुम्हें क्या। तुम सब तो बिन भागे ही घर में ऐसे ऐसे कारनामे करते हो कि क्या बताएं। वो तो पेट है हमारा जो तुम्हारे दरवाजे पे आते हैं, छी:... उस वक्त तो नानी मर गई थी सबकी जब फूली भागी थी, कैसे हाथ-पैर फूल गए थे सबके। चाक-चौबंध काम था फूली का, अब वैसी काम करने वाली मिलने से रही...। अच्छा। तो क्या जिनगीभर चौका-बर्तन ही करती रहे, प्रेम न करे, शादी न करे। फूली फूली और फूली, जब गई, पगला गए आफिसर कॉलोनी के मेम लोग। जब देखो तब गेट के बाहर खीं-खीं कर हंसती, आंखें मटकाती। पगलाए तो अम्मा भी कम नहीं गई थी, लाख टके की बेटी। प्रण कर बैठी अम्मा जब तक फूली नहीं मिलेगी, तब तक बाल नहीं बांधेगी। वह अपना विकराल झोंटा बिखराए डायन की तरह घर-घर घूमती रही। पूरे दो हजार पर पानी फिरा था, कैसे संभलती। पर अम्मा तो अम्मा ठहरी, अपना ऐसन परताप दिखलाई कि दो महीने में ही मिल गई दिदिया। और वो ड्रेभर! ऊ तो साला ऐसा भागा कि सालभर होने को आया, मरा अपना मुंह तक नहीं दिखाया।
नोनी ऑफिसर कॉलोनी के दो सौ चालीस नम्बर बंगले के सामने जब पहुंची तो चारों ओर धूप खिल आई थी। ठंड तो खूब थी; घास पर, दीवार पर, फूल-पत्तों पर सूरज की किरणें चमक रही थी। धूप के इन नन्हें-नन्हें छौनों के साथ खेलने को बड़ा मन हुआ नोनी को। पर नहीं; यहां तो उसे बर्तन मांजना है- सो भी एक-दो नहीं, पूरा झौवा भर। लोग कुल चार जने, पर बर्तन! लगता है जैसे इस घर में दस-पन्द्रह आदमी रहते हों। ठीक है चलो बर्तन मांज लिया, अब तो छुट्टी दो... नहीं, ये कर ... वो कर..., धुत्!
‘‘आ गई?’’ मेम साहब आंगन में ही टहल रही थी।
‘‘..........’’
मोटी थुलथुल, सोएटर के ऊपर एक और गर्म शाल ओढ़़े हुए थी मेम, नोनी के माथे पे चू आए पसीने को एकटक देखती रही कुछ देर...
‘‘तुझे ठंड नहीं लगती?’’
‘‘........’’
‘‘जा एक कुर्सी ला दे... जरा धूप में बैठूं...’’ नोनी भागी-भागी अंदर गई और कुर्सी ले आई। टैम नहीं है बिलकुल। जल्दी काम निपटाना है। किचन में बर्तनों का ढेर देख आई है नोनी।
‘‘अरे कहां चली? चल, जरा तू भी धूप सेंक ले...’’ मेम साब ने रबरबैंड के भीतर से अपने बालों को आजाद कर पीठ पर फैला दिया- ‘‘ले जरा देख तो, आजकल खुजली हो रही है बहुत...’’
‘‘....’’ नोनी टस से मस नहीं हुई, वैसी ही खड़ी रही।
‘‘क्या हुआ, खड़ी क्यों है?... बड़ी ढीठ है तू तो! ... मुझे सब पता है, मास्टरनी के यहां तू क्या-क्या करती है। क्या वो ही पैसे देती है, हम नहीं? मैं तो पैसों के अलावा भी बहुत कुछ देती हूं... देती हूं कि नहीं? बता न! मुंह से बोलती नहीं तो अपना सर ही हिला दे जरा!’’
‘‘...’’ नोनी बुत बनी खड़ी रही।
‘‘ये जो सूट पहनी है न, जानती है कितने की है...  और उस दिन जो बेलबॉट्स दिए उसका?... बहुत महंगे होते हैं ये सब.,.. हूं:... अच्छा, खड़ी मत रह, जा जाकर काम कर....’’
नोनी बर्तनों का ढेर लेकर नल के नीचे बैठ गई। बाल्टी में गिरते पानी की आवाज में वह अपने आंसुओं को छुपाने लगी। उसका मन हुआ बदन के सारे कपड़े नोच-नोच कर आंगन में खड़ी मेम साहब के मुंह पर दे मारे। कई जगहों से सिला हुआ पुराना सूट नोनी को मुंह चिढ़ाने लगा था। उसे अपने दरुहा बाप पर बड़ी कोफ्त होने लगी। मरा, बाप बना फिरता है! एक चड्डी तक तो खरीद देने की कूबत नहीं है उसकी, और अम्मा? उसका तो मटकना ही खतम नहीं हुआ अब तक। इस बीच दो-दो बार पेट साफ करा आई। रात उचटती नींद के बीच मिट्टी की दीवार के उस पार से ऐसी आवाजें आती हैं कि पूछो मत। बेटियों के पैसे से गुलछर्रे उड़ाने में इन दोनों को जरा भी शर्म नहीं आती। यह नहीं होता कि अलग से एक कमरा ही निकाल ले।
नोनी का हाथ लगते ही स्टील के बर्तन चांदी की तरह चमके लगे। मेम साब मुस्कुराती हुई चाय लेकर आई और साथ में दो बिस्कुट- ‘‘ले खा ले नोनी, फिर बर्तन मांजना...’’
मेम साब के जाते ही नोनी ने चाय-बिस्किुट को नाली में फेंककर पानी डाल दिया। आज उसका मिजाज बेतरह चढ़ा हुआ था।
नोनी दो सौ चालीस नम्बर का काम खत्म कर जब बाहर आई तब लॉन के ऊपर से धूप गायब हो चुकी थी। अभी एक घर और, जहां उसे कपड़े धोना है। वहां बड़ी-बड़ी दो लड़कियां, पर वे अपनी चड्डी तक नहीं धोती। अब घिन आए या उबकाई, नोनी को तो काम करना ही करना है। सो करती है चुपचाप। अंगूठे में चड्डियों को फंसाकर ब्रश मारती है खरर-खरर। चैन यहां भी कहां, सर पर खड़ी रहती है घोष आंटी- ‘‘एई नोनी, कोपड़ा ठीक से धोबी, तीन बार पानी बदलबी ठीक हाय, साबुन का एकटु भी गंधो नाही रहना चाई, बुझली!’’
नोनी को क्या। तीन क्या, चार-पांच बाल्टी पानी से कपड़ों को धोती। हरर-हरर पानी बहाती नाली में। वो जानती है अगले दिन आते ही घोष आंटी कहेगी- ‘‘पूरा टैंक ही खाली कोर दिया कल तुम, हम चार बजे उल्टी टाइम तक चान किये बिना बोइठा रहा,... बदमायेश कोथाकार!’’
घोष आंटी के यहां कपड़ा धोने के बाद जब नोनी घर आई तो उसके पास समय का एक कतरा  भी नहीं बचा था जो उसका अपना हो। वह उढक़े हुए दरवाजे के बाहर देहरी पर बैठकर चंद लम्हों के लिए सुस्ताने लगी।
बाबू दूर से हिलते-डुलते आते दिखे। ‘देसी दारू की कई बोतलें चढ़ाई होंगी’- नोनी के मुंह में थूक भर आया जिसे फेंकना जरूरी था। उसे कै सी आने लगी, यह सोचकर कि रोज की तरह आज भी एक बासी बू उसके नथूनों में घुस आएगी और इसे बर्दाश्त कर सारा काम उसे आधे घंटे में निपटाना होगा। फिर किसी तरह आधा बाल्टी पानी में नहा कर चूल्हे के पास तोप कर रखा बासी खाना- जिसे अम्मा कलेवा कहती है, नोनी मन मारकर बैठी रहती है। अब कब जाएगी वह स्कूल और कब करेगी घर का काम!
बाबू दारू के नशे में रास्ते पर ही गिर पड़े। सचमुच सुन्दर ठीक ही कहता है, ये दोनों तेरी या तेरी दिदिया की कभी शादी नहीं करेंगे देख लेना। तुम दोनों कमाओगी और ये बैठे-बैठे रोटी तोड़ेंगे! ... भाड़ में जाए स्कूल! वह उठी और छांव का खेल! एक कौआ कांव-कांव करता उड़ गया। डंगाल पर टहनियां कुछ देर तक हिलती रहीं।
नोनी ओढऩी से मुंह ढांपकर लेट गई। इस वक्त उसे एक बेफिक्र नींद की सख्त जरूरत थी, और एक शानदार सपने की जिसमें सुन्दर का हाथ पकड़े वह ट्रक पे चढ़ रही है और सुन्दर ट्रक फर्राटे से भगा रहा है।