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Monday 20 Nov 2017

वीर की कामना


2श्री सुखलाल ‘मुसाफिर’

खिदमते मुल्क का जब दिल में ख्याल आएगा।
खुद ब खुद पास चला हुनरे कमाल आएगा।।

निकलेंगे सर से क$फन बांध जो शैदाए वतन।
नजर तब काम कोई कैसे मुहाल आएगा।।

सबसे पहले हो मैं मकतल में पहुंच जाऊंगा।
जब वतन के लिए मरने का सवाल आएगा।।

कुशतए तेरा सितम होगा मेरी लाश पर।
खून रोने के लिए माहे हिलाल आएगा।।

अपने जल्लाद की फिर फिर मैं बलाएं लूंगा।
खींचने जिन्दगी में गर मेरा ख्याल आएगा।।

बेकस मेरी मनाएगी मेरा मातम और।
गुस्ले मय्यत के लिए रंजो मलाल आएगा।।

आग लग जाएगी खुद सोजे वतन से मेरे।
लकडिय़ां चार चिता पर कोई डाल आएगा।।

शोले उठ उठ के चिता से मेरी दिखलाएंगे।
तब नजर $खल्क को भारत का जलाल आएगा।।

बनके इंग्लैंड मसीहा तू ही मुर्दों को जिला।
वरना किस काम तेरा हुस्नो जलाल आएगा।।

साय म$कतल में ‘मुसाफिर’ को भी लेते जाना।
यह भी अरमान वहां दिल के निकाल आएगा।।

(महारथी- अक्टूबर, 1927)