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Thursday 23 Nov 2017

मोती


2 सैयद अमीर अली ‘मीर’
कुछ थोड़े से मुक्ता देखे, राजमुकुट में जड़े हुए।
असंख्यात है, सिन्धु-गोद के, अंधकार में पड़े हुए।।
‘‘है अभाग्य मुक्ताओं का यह’’ या विधि की विधि इसे कहें?
‘‘हैं अत्यल्प जौहरी जग में’’, या दुर्लभ निधि इसे कहें?
कुछ चढ़ते है सिर पर सुर के, कुछ के बनते हैं हृद-हार।
फूल-फूलकर मुरझा जाते, बन-बागों में अपरम्पार।।
जाना उन्हें न केवल, मानव-कुल ने उनको दिया बिसार।
क्या यह दुख की बात नहीं है, हो जीवन उनका निस्सार?
(‘महारथी’- मार्च, 1928)