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Thursday 23 Nov 2017

नज़्म


2मौलाना ‘‘शिबली’’ नौमानी
कोई पूछे के ऐ तहजीबे इंसानी के उस्तादो!
यह जुल्म आरईयां1 ताके2 ये हश्र अंगेजियां3 कब तक।।
यह जोश अंगेजिये4 तूफाने बेदादो5 बला ताके?
यह लुत्$फ अन्दोजिये6 हंगाम:-ए:-आहो फुगां7 कब तक।।
यह माना तुमको तलवारों की तेजी आजमानी है।
हमारी गर्दनों पर होगा इसका इम्तहां कब तक।।
निगारिस्ताने8 खूं की सैर गर तुमने नहीं देखी।
तो हम दिखलाएं तुमको जख्म हाय खूं चकां9 कब तक।।
यह माना गर्मी-ए-महफिल के सामां चाहिए तुम को।
दिखाएं हम तुम्हें हंगाम:-ए-आहोफुगां कब तक।।
यह माना किस्म :-ए-$गम से तुम्हारा जी बहलता है।
सुनाएं तुमको अपने दर्दे दिल की दास्तां कब तक।।
यह माना तुमको शिकव: है फलक10 से खुश्क साली11 का।
हम अपने खून से सींचें तुम्हारी खेतियां कब तक।।
उरूसे बख़्त12 की खातिर तुम्हें दरकार है अफशां13।
हमारे जर्र: हाय खाक होंगे जरफिशां14 कब तक।।

1. अत्याचार करना, 2. कब तक 3. अस्त-व्यस्त करना 4. तीव्रता, 5. अत्याचार, 6. मजा उठाना, 7. ची$ख पुकार, 8. चित्रालय, 9. खून में डूबी, 10. आकाश, 11. अकाल, 12. भाग्य की दुल्हन, 13. स्त्रियों के गालों व बालों पर छिडक़ने वाला रूपहला-सुनहला पदार्थ, 14. स्वर्ण की भांति लुटना
आजादी के तराने (ब्रिटिश राज द्वारा प्रतिबंधित उर्दू साहित्य से) से साभार