Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

स्वतंत्रता

 

2 पुरुषोत्तमदास टंडन
हेे स्वतंत्रता प्यारी तू क्यों हमको इतना बिसर गई।
भारत छोड़ किधर को भागी हमको इकला छोड़ गई।।

ईश्वर पुत्री जग की प्यारी गुण की आगर कहां गई।
हाय हाय कह रोवैं भारतवासी तेरा नाम लई।।

जीवन फुलवारी का तू ही तो इक पुष्प सुगन्धित है।
तेरे बिन यह सुनसान है जग सुख सारा खण्डित है।।

किसी भांति की रोक-टोक जब मानव चित्त पर रहती है।
नहीं काम कर सकता पूरा जिसमें तबियत लगती है।।

विद्या बुद्धि शिल्प अरु सूनृत का कदापि नहिं बास वहां।
सबही गुण इक-इक कर भागै स्वतंत्रता है नहीं जहां।।

जैसा कि एक छोटा पौधा दब कर नहीं उभड़ता है।
वैसा ही यह चित्त मनुष्य का उठै नहीं जब गिरता है।।

पर वे बीर सही हैं जो गिर कर भी नहिं हुए निरास।
कमर बांध लडऩे पर तत्पर एक शस्त्र रख केवल आस।।

प्रकृति ने यह ढंग रचा है जीव सभी होवै स्वाधीन।
उसकी देन सबहिं को एकसां क्या धनाढ्य अरु क्या धनहीन।।

हिमाचल के पर्वत पर अरु सहरा के भी जंगल में।
सबहिं ठौर भोजन को मिलता सबहिं कटै सुख मंगल में।।

ईश्वर की समस्त रचना में ऐसा है स्थान नहीं।
जहां श्रमी उद्योगी को है जीवन का सामान नहीं।।

यदि विपत्ति अरु काल कहीं पर कभी दिखाई पड़ते हैं।
एक मूल उनकी अधीनता जिससे सबही डरते हैं।।

एकहि भांति मनुज हैं आये उसी भांत वे जाते हैं।
समदर्शी निर्गुण के आगे सब समान दिखलाते हैं।।

तब किसको अधिकार कहें यह हम धनाढ्य अरु धनहीन।
औरों के कर्मों को रोकै देन प्राकृतिक लेवैं छीन।।
 
 क्या हो अद्भुत वस्तु मनुज भी श्रेष्ठ कहावै सृष्टि में।
पर भरे हुए ऐगुण इतने जो नहिं देखें पशुओं में।।

नहीं कभी एक घोड़ा कहता मेरी मूल्यवान है जीन।
गर्व नहीं उसको यह होता मेरा चमड़ा है रंगीन।।


यदि घमण्ड वह करता है तो केवल अपनी तेजी का।
पर हाय! नीचता मनुष्य की कैसी अभिमानी धनसंपत्ति का।।

एक एक के गुण नहिं देखें ज्ञानवान् का नहिं आदर।
लड़ै कटै धन पृथ्वी छीनैं जीव सतावें लेवै कर।।

भई दशा भारत की कैसी चहूं ओर विपदा फैली।
तिमिर अज्ञान घोर है छाया स्वारथ साधन की शैली।।

हा वही भूमि यह आरज की जहं भये एक से एक सुधीर।
जहां कपिल, पातंजलि उपजे, द्रोण और अर्जुन सम वीर।।

जहां धर्म में प्रौढ़ युधिष्ठिर, राम, बासुदेव, हरिचन्द्र।
व्यास, बाल्मीक से कितने जन्मे श्रेष्ठ कविन के वृन्द।।

जहां भरत, गौतम, शंकर ने अद्भुत छटा दिखाई।
जहां भोज विक्रम के यश से रही संपदा छाई।।

हुई दशा है उसी भूमि की हाय आज कैसी न्यारी।
विद्या गुण तो घटते जाते पर अभिमान रहा भारी।।

अपनी अपनी चाल ढाल की सब कोउ धर-धर छप्पर पर।
चले ढुलकते बुरी प्रथा पर जिसका कहीं पैर नहिं सर।।

धनी दीन को दुख अति देते हमदरदी का नाम नहीं।
धन मदिरा गनिका में फूकै करैं भला कुछ काम नहीं।।

कभी-कभी संशोधक होने का यदि किसी को आया ध्यान।
समझ लिया एक स्पीच झाडऩा है बस मेरा पूरा ज्ञान।।

लोग नहीं उनको पतियाते सच पूछो तो बात यही।
देश उपकार करेगा वह क्या जिसका मन है विमल नहीं।।

ऐसी भूमि में है स्वतन्त्र हो नहिं सकता तेरा बास।
जहां कुटिल अरु नीच प्रकृत हो बने सभी स्वारथ के दास।।

तेरे रहने को हे प्यारी उज्जवल हृदय भवन चाहिये।
तो भी दशा देख भारत की अब तो दया दृष्ट करिये।।

भरा स्वार्थ से हृदय हमारा दीजै हमको दान यही।
तेरी मूर्ति मोहनी प्यारी रहै सदा चित्त मांहि बसी।।

जिसे देख देखकर मुझ में बल अरु साहस अधिक बढ़ै।
कि तेरा गुण मैं जग में गाऊं जिसमें भारत कष्ट कढ़ै।।