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Saturday 18 Nov 2017

रण-विदा


2महादेवी वर्मा
माँ! जीवन-अंजलि में मेरे तर्पण-हित कुछ अर्पित फूल।
उन्हें करूं क्या? चढ़ा दिया, लो, चरणों की लेने दो धूल।।
‘हृदय-द्वार’ हो गये बन्द, कोने में अब कुन्दित ‘अनुराग’।
अरे सिखाना है जग को जीने का सच्चा राग विराग।
इस नि:सीम गगन के अन्दर, कभी न होगा उल्कापात।
फिर न देखने में आवेगा, वधिकों का भीषण उत्पात।।
हो जाने दो नत्र्तन अघ का, बस, मांँ! है यह अन्तिम वार।
दे देती आहों पर तेरी चंडी को जग का अधिकार।।
झुलस न जायें हृदय-कुसुम, सुठि वितरण करते रहें सुगन्ध।
सौरभ-लोलुप अलि को मंजुल भावों ही से कर दें अन्ध।।
गूंज उठे यह चतु:पाश्र्व में, गर्वीला मन-निर्भय नाद।
‘बलि हो जाऊंगी’ मां-हित, मां ऐसा दे तू आर्शीवाद।।