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Monday 23 Apr 2018

तसल्ली1


2फैज़ अहमद फैज़
चन्द रोज  और मेरी जान $फ$कत चन्द ही रोज!

 जुल्म की छांव में दम लेने पर मजबूर हैं हम।
और कुछ देर सितम2 सह लें, तड़प लें, रो लें।

अपने अजदाद3 की मीरास4 से माजूर5 हैं हम।
जिस्म पर कैद हैं, जजबात पे  जंजीरें  हैं।

फिक्र 6 महबूस7 है, गुफ़्तार8 पे ताजीरें9 हैं।
अपनी हिम्मत है के हम फिर भी जिए जाते हैं।

जिन्दगी क्या, किसी मुफलिस की $कबा10 है जिसमें।
हर घड़ी दर्द के पैबन्द लगे जाते हैं।

लेकिन अब  जुल्म की मीआद के दिन थोड़े हैं।
इक  जरा सब्र के फरयाद के दिन थोड़े हैं।

अर्स:-ए-दहर11 की झुलसी हुई वीरानी में।
हम को रहना है, पे यूं ही तो नहीं रहना है।

अजनबी हाथों का बेनाम गरांबार12 सितम।
आज सहना है, हमेश: तो नहीं सहना है।

यह तेरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम13 की गर्द।
अपनी दो रोज: जवानी की शिकस्तों14 का शुमार।

चांदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द।
दिल की बेसूद तड़प, जिस्म की मायूस पुकार।।

चन्द रोज़ और मेरी जान फक़त चन्द ही रोज़।
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1.दिलासा, 2. अत्याचार, 3.बाप-दादा, 4. छोड़ी हुई संपत्ति,
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