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Thursday 23 Nov 2017

पहला रोज़ा


सेहबा जाफरी
मजेस्टिक नगर
खजराना , इंदौर
याद नहीं उम्र कितनी थी, पांचवे का इम्तेहान दिया था और अब तक रमज़ान में इफ्तारी खाने का ही लुत्फ उठया था कि रमज़ान के छटवें रोज़े के दिन अम्मा, दादी अम्मा के साथ लोगों की फेरहिस्त बनाती बरामद हुईं। अप्रैल का महिना, ऐन मेरी सालगिरह के एक दिन पहिले। स्कूल अभी खुले नहीं थे, लिहाज़ा मदरसा और पेटिंग की क्लास के बाद चंग-अष्ट की महफि़लें और चम्पक, नंदन के साथ बीतती ख़ाली ख़ाली दुपहरें। बुज़ुर्गों के काम में ज़्यादा दख़लअंदाज़ी की इजाज़त तो थी नहीं सो पता भी नहीं था कि क्या होने जा रहा है। पड़ोस की रफ़ीक़ा ख़ालाजान के साथ दादी अम्मा जो जो मशविरे कह सुन रहीं थी उससे तो यही अंदाज़ लगाया जा सकता था कि दूर दराज़ की किसी कुंआरी फूफीजान या ख़ालाजान की मंगनी ही होनेवाली है। तभी बड़ी अम्मा ने घुडक़ा - ज़्यादा इतराओ नहीं! कल तुम्हारा ही काम होगा। या अल्लाह! मेरी मंगनी!!! ख़ौफ के मारे कलेजा मुंह को आ गया! दूर दूर तक मोहब्ब्त लुटाते भाइयों के बीच कहीं भी दुल्हे की ख़ौफनाक तस्वीर का तस्व्वुर भी नहीं था, फिर ये मंगनी!!!! अंदर के बाग़ी तेवर कोई जवाब तलब करते इंसाफ की ज़ंजीर हिलाते इससे क़ल्ब ही अम्मा ने आकर बताया, कल तुम्हारी सालगिरह भी है और पहिला रोज़ा भी। जान में जान आयी मेरी।
 बक़ौल दादीअम्मा, दिन भर भूखे भिनभिनाना तो मेरा ख़ास शगल था, सो मुझे कोई ऐतराज़ नही था, फिर यहां तो पब्लिसिटी भी पूरी मिल रही थी, सो फख़्र से उड़ी उड़ी अड़ोस पड़ोस में भी गा आयी मैं!  मेरा पहिला रोज़ा है, फ़लानी तुम भी आइयो और ढमाकी तुम भी आइयो। अगले दिन पूरे जोश से सेहरी में जगाया मुझे। नेहला धुला अम्मा ने नीली अम्ब्रेला फ्राक के साथ पड़ोस की पिंकी बाजी की छोटी हुई पीली शल्वार पहना दी। (अस्ल में भाइयों के कपड़ों पर डाका डालने वाली उम्र की वजह से अभी जि़ंदगी में शल्वारों की घुसपैठ शामिल नहीं हुई थी) जल्द जल्द सेहरी खिला कर रोज़े की नियत करवाई गयी। बड़ी अम्मा ने ख़त्म-वक्ते-सेहरी नाक दबा कर बड़ा सा ग्लास पानी का भी हलक़ में उड़ेल दिया। और सेहरी का वक्त खत्म हुआ।
 फज्र की अज़ान हुई, अम्मा ने नमाज़ के बाद कुरान हाथों में थमा दिया। यासीन पढ़ते-पढ़ते जम्हाइयों को दबा कर जल्द ही फारिग़ हो बिस्तर में लुढक़ गयी। एक नींद निकाली और जले पैर की बिल्ली की तरह आदतन बावर्चीख़ाने का रुख़ किया- अरी!! ये भूत की तरह यहां क्यूं मंडरा रही हो? रोज़ा है तुम्हारा!!! बड़ी अम्मा ने डपटा तो खय़ाल आया कि रोज़ा है। खिसियाती हुई बाहर आयी तो बाजी ने टोका, अरे! मेहमान आ गये हैं! जऱा मुंह धोकर कपड़े बदल लो, नानीजान, मामूजान-मुमानी जान, चचा चची सब के सब लोग ही आते होंगे, जल्द कंघा लेकर आओ तो तुम्हारी चोटियां बना दूं। मुझे बाजी का बाल खींच खींच कर चोटी बनाना सख्त नापसंद था मगर उन्हें ना सुनने की आदत नहीं थी, अभी रोज़े में ही धुनककर रख देतीं सो मैंने चुपचाप चोटी करवाने को ही गऩीमत जाना। इतने में अम्मा ने आकर बताया कि आज सब लोग मेरे लिये तोहफ़े और ढेर से कपड़े भी लाने वाले हैं। मैं थोड़ी सी ख़ुश हो गयी। आज मुझे मेरी रोज़ की झाडू बुहारने वाली ड्यूटी से भी छुट्टी मिल गयी थी।
 नानी के घर से लाये गये कपड़े पहिन मैं फिर आंगन से कमरे, कमरे से छज्जे डोलने लगी। दिल में खयाल आया, रोज़ा है, कोई काम तो है नहीं, क्यूं न थोड़ी टीवी टावी ही देख ली जाये। प्लग लगाया ही था कि सीआईडी की तरह फिर बड़ी अम्मी नाजि़ल, अरी कम्बख्त! रोज़े में टीवी नहीं देखते, रोज़ा मतलब नफ्स का रोज़ा। किसी कि़स्म का कोई एंनटरटैनमेंट नहीं। उनकी घुड़कियां दिल पर ली भी ना थी कि सब के सब चचा, फूफा अपनी जतन से जमा की गयी बच्चों की फौज समेत हाजिऱ। गुडिय़ा गुडिय़ा का शोर मचाते कोई चूमचाट रहा था तो कोई मारे ख़ुशी के गले लगा रहा था। मेरा पूरा ध्यान साथ लाये तोहफों के झोलों पर था। दिन का दूसरा पहर चालू। सूरज ऐन सर के ऊपर। ज़ुहर की नमाज़ का वक्त। मर्द हजऱात मस्जिद में नमाज़ अदा करने गये। औरतों ने घर में पढ़ी। नानीअम्मी का फरमान जारी हुआ,  बाई! रोज़दार बच्ची को हवा में लिटा दो। चचियां, मुमानियां और फुफियां नमाज़ के बाद बावर्चीख़ाने में अम्मां की मदद करने लगीं। नसीम आपा एक बड़े से टोकरे में गर्मागरम पकौड़े उतारने में लगीं तो क़ुरैश आपा पापड़ तलाई को बैठ गयीं, मुहल्लेभर से झारे पल्टे मांग इफ्तारी की तैयारियां होने लगीं। पड़ोस की यास्मीन और तस्नीम बाजी पपीते और तरबूज़ काटने को मुकर्ऱर हुईं और छम्मी आपा लगीं ख्वान परातों की सफाई में। हम उम्र सहेलियां घर के वाहिद कूलर ( जिसे दादीजान भड् भड ख़ूंटा भी कहती थीं ) के सामने मुझे लेकर बैठ गयीं। बबलीबाजी ने फौरन मेहंदी घोली और मेरे हाथ पैरों में बेलबूटे लगा डाले। हमउम्र लड़कियों बालियों को भी मेहंदी लगा वह किचन में गयी और मैं घड़ी की तरफ़ देख वक्त का जायेज़ा लेने लगी। सारी सहेलियां ठंडी हवा में सो पसर गयीं इतने में पड़ोस के बच्चे भी आ गये। भाई लोगों ने पूछा, रोज़ा तो नहीं लग रहा? बस चार पांच घन्टे और हैं फिर जी भर के खाना! बाहर तो सिर्फ तुम्हारे रोज़े की खुशी में ही शामियाने लगे हैं, टैरेस गार्डन की सफाई की है और जमातख़ाने से बड़े बर्तन भांडे मंगवाकर गांव भर की दावत और रोज़ाकुशाई का इंतेज़ाम किया है। सुनते हैं दुल्हेभाई और बड़ी बाजी के ससुराल वाले तुम्हारे लिये नोटों का हार लाने वाले हैं! मैं मारे खुशी के और फूल फैल गयी।
 दोपहर की नमाज़ में खूब दुआ की कि ऐ अल्लाह! तू मेरा रोज़ा क़ुबूल फरमा! दिन के चार बजने आये, दोपहर ढलने की नमाज़ में थोड़ा वक्त होगा कि पड़ोस के मेहनाज़ और गुल्नवाज़ आ धमके। मुझे डाले गये हारों को बाजी ने कऱीने से एक ढेरी की शक्ल दे, चादर से ढांक दिया था। उन दोनों शैतानों की नजऱ जब हार पर गयी तो गुल्गेंदे की पत्तियां तोड़ वह उसके फूलों की नमकीन जड़ें खाने लगे। लो तुम भी खाओ, कहने की देर थी और मैं भी खाने लगी, एक जड़ खायी ही थी कि याद आया मेरा तो रोज़ा है! हाय अल्लाह !! अब क्या होगा!!! मेरे चेहरे के रंग उड़ते देख दोनों आंखे तरेरते हुए बोले,  होगा क्या! तुमने रोज़ा तोड़ दिया है!! हम अभी सब से कह आते हैं शामियाने निकालो, तोहफे हमें दे दो, खाना पकाना बंद करो, भटियारों घर जाओ, इफ्तारी मुहल्ले पड़ोस में बांट दो, नोटों का हार फेंक दो कि लडक़ी रोज़ा तोड़ चुकी है!!! मेरा दिल बैठ गया और मैं ख़ुद का तस्सवुर कोर्ट मार्शल किये गये कैप्टन सा ही करने लगी। आंखों से आंसू की बूंदें छलक पड़ी और जी में आया मैं ख़ुद्कुशी कर लूं। इतने में उन दोनों का बड़ा भाई शाहनवाज़ जो उम्र में हमसे कोई साल दो साल बड़ा होगा आया और रोने का सबब पूछने लगा।
   मैं कुछ कहती उससे पहिले वह दोनों उसे नमक मिर्चे लगा सब कह गये। उसने गौर से सुना और मुझे समझा के कहने लगा,  जाओ! दौड़ कर गुस्लख़ाने में जा कर कुल्लियां कर लो और तौबा कर लो, भूल में तो सब माफ़ है। मैं फौरन तौबा करती हुई गुस्लख़ाने की जानिब दौड़ गयी, वापस आयी तो दोनों शैतान फिर बोले,  अल्लाह मियां तो ठीक हैं, तुम दुनिया को क्या जवाब दोगी!!! हम अभी सब से बोल आते हैं! शाहनवाज़ ने आंखे तरेरी और बेंत दिखाते हुए उन्हें धमकाया,  ख़बीसों! आज सुबह हदीस की क्लास में आलिम साहब ने समझाया था न कि जो किसी के एक ऐब पर पर्दा डालेगा, अल्लाह आखिऱत में उसके ऐबों से पर्दापोशी कर उसे ज़लील होने से बचायेगा!!! दोनों के दोनों डर कर भाग खड़े हुए। मगरिब हुई, मैंने गोटे टका नया सूट पहिना। लाल हाथों में चट मेहंदी रचायी, रोज़ा इफ्तारा गया, मुझे कपड़े, खिलौने और तोहफे सभी कुछ मिले। खिलौने मैंने शाहनवाज़ को दिखाये और इफ्तारी के बचे हुए पापड़ों का टोकरा मैंने और शाहनवाज़ ने कच्ची सीढिय़ों पर साथ बैठ कर निबटाया।