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Thursday 23 Nov 2017

जबरिया ढोल


जयनंदन
एस एफ-3/116, बाराद्वारी सुपरवाइजर फ्लैट्स, साकची, जमशेदपुर - 831 001. (झारखंड),
मो. 09431328758
दसमेस पांडेय को जब अनुमंडलाधिकारी कार्यालय से एलेक्शन ड्यूटी का नोटिस मिला तो उसे पढक़र उसका रोम-रोम सिहर गया। यह पहली बार था जब बैंककर्मियों के माथे को भी एलेक्शन ड्यूटी की टोपी में फिट किया जा रहा था।
वह एलेक्शन ड्यूटी में गये कुछ लोगों की त्रासद आप बीती सुन चुका था। सबकी कहानी एक जैसी थी - बेहद कष्टदायी, डरावनी और सनसनीखेज। एलेक्शन ड्यूटी के नाम से ही हर किसी के चेहरे पर उसने हवाई उड़ते पाया। ड्यूटी सकुशल निपट जाने पर वे किसी नरभक्षी के जबड़े से निकल आने जैसी राहत महसूस करते पाये जाते।
दसमेस का एक निकटतम पड़ोसी प्रताप वर्मा, जो अंचल कार्यालय में बड़ा बाबू था, पिछले चुनाव में शहीद हो गया। पीठासीन पदाधिकारी के तौर पर उसकी ड्यूटी एक अति संवेदनशील घोषित क्षेत्र के एक घातक बूथ पर पड़ गयी। पिछले सभी चुनावों में इस क्षेत्र के प्राय: सभी बूथों पर छोटी या बड़ी हिंसक वारदातें होती रही थीं। मतदान की ड्यूटी में जाने वाले सभी सरकारी कर्मचारी ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि कुछ ऐसा करिश्मा हो जाये कि इस ड्यूटी से उसे निजात मिल जाये और अगर ऐसा संभव न हो तो कम से कम वैसे क्षेत्र में जाना न पड़े जो हिंसा और रक्तपात के लिए कुख्यात रहे हैं। वर्मा का दुर्भाग्य था कि लॉटरी में उसे ऐसा ही एक अतिसंवेदनशील बूथ मिल गया। अंजाम वही हुआ जिसका डर था। उग्रवादियों ने हमला किया और उनकी गोलीबारी में वर्मा और एक सुरक्षाकर्मी रास्ते में ही मारे चले गये।
उसके पहले के हुए अन्य चुनावों में भी उस क्षेत्र के ट्रैक रिकॉर्ड इसी तरह हिंसा और रक्तपात के रहे थे। भारी से भारी पुलिस बंदोबस्त को भी उग्रवादी हर बार भेदने में कामयाब हो जाते। मानो पुलिस की बड़ी से बड़ी तैयारी को वे एक चुनौती और प्रेस्टिज इशू की तरह लेकर उसे असफल बना देने के लिए उससे भी बड़ी तैयारी कर लेते। अपनी ताकत का लोहा मनवाने और अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने का वे इसे शायद सबसे अच्छा मौका मानते थे। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी चर्चा हो जाती थी और क्षेत्र में अगले चुनाव तक उनका दबदबा बना रह जाता था।
दसमेस पांडेय भी भगवान से यही मनाने लगा था कि ड्यूटी जब पड़ गयी तो कोई एक शांत और सुरक्षित बूथ उसे मिल जाये। उसे पता था कि इस पर किसी का कोई वश नहीं है। अंतिम समय में यानी कल मतदान है तो आज लॉटरी निकालने का नियम है, जिसके भाग्य में जो मिल जाये। वह यह सब जानते हुए भी दस दिन पहले यों ही किसी गुंजाइश की तलाश में अनुमंडलाधिकारी कार्यालय पहुंच गया।
बड़ा बाबू ने उसके चेहरे की उड़ी हुई रंगत देखकर सहानुभूति दर्शाते हुए कहा, ‘‘घबराइए नहीं पांडेय जी। होइहें सोई जो राम रचि राखा। लोकतंत्र का पर्व है, इसे बचाने की जिम्मेवारी हम सबके माथे पर ही है।’’
दसमेस ने तय किया कि एक बार सीधे एसडीओ से मिलकर आजमा लिया जाये। वह उनके कमरे में घुस गयाऔर दीन-हीन चेहरा बनाकर गिड़गिड़ा उठा, ‘‘सर, मेरे दो छोटे बच्चे हैं और बूढ़े मां-बाप हैं। घर में दूसरा कोई नहीं है जिम्मेदारी उठाने वाला। पहली बार मुझे यह ड्यूटी मिली है। मुझे डर लग रहा है कि कहीं मेरी ड्यूटी किसी खतरनाक जगह में न पड़ जाये। मुझ पर रहम कीजिए सर, मुझे इस ड्यूटी से छूट दे देते तो बड़ी कृपा होती।’’
अधिकारी ने उसकी हालत पर तरस खाते हुए कहा, ‘‘पांडे जी, आप चिंता मत कीजिए। जिस क्षेत्र के लिए आप घबरा रहे हैं, इस बार प्रशासन ने बहुत सख्त इंतजाम किया है वहां। सीआरपीएफ  की पूरी एक बटालियन गश्त में लगा दी गयी है। हम एक पत्ता तक वहां खडक़ने नहीं देंगे। सूची जब बन जाती है तो उसमें कोई बदलाव नहीं होता। चूंकि इस ड्यूटी से हर कोई कन्नी काटना चाहता है। आप बेफिकर रहिए, आपकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेवारी प्रशासन की है। इसके बावजूद दुर्भाग्य से अगर कुछ अनिष्ट हो जाये तो प्रशासन ने इस क्षेत्र में भेजे जा रहे सभी कर्मियों के लिए एक-एक करोड़ का बीमा कर दिया है।’’
अपनी जान की कीमत सुनकर हताश मन दसमेस घर वापस आ गया। अब कोई उपाय नहीं था। इसमें कोई कोताही या बहानेबाजी की भी कोई जगह नहीं थी। इसे एक अति अनिवार्य ड्यूटी की श्रेणी में गिना जाता था। किसी भी टाल-मटोल या अवमानना की स्थिति में बर्खास्तगी की तलवार सीधे गर्दन पर। कहते हैं बाप तक के मर जाने पर भी इसमें रियायत की गुंजाइश नहीं।
दसमेस का साला शोभन तिवारी सरकारी मध्य विद्यालय में शिक्षक था और वह कई वर्षों से मतदाता सूची को अद्यतन करने तथा एलेक्शन बूथ ड्यूटी में लगाया जाता रहा था। विद्यालय में पढ़ाने से ज्यादा उसे इन्हीं कामों में लगा रहना पड़ता था। पिछले लोकसभा चुनाव के मतदान के एक दिन पहले उसके बूढ़े पिता यानी दसमेस के ससुर का देहावसान हो गया। वह एलेक्शन ड्यूटी से मुक्त होने के लिए कई कई अधिकारियों के समक्ष लाख गुहार लगाता रहा, लेकिन मदद करने से सबने हाथ खड़े कर दिये। अन्तत: शवगृह में पार्थिव शरीर रखवाना पड़ा और सुदूर देहात से मतदान करवाकर जब वह लौटा तो अंत्येष्टि करवायी।
वह निकट का संबंधी था, इसलिए दसमेस ने महसूस किया था उसके दर्द को। शोभन एक मर्मभेदी कचोट से लहूलुहान होकर रह गया। बेबसी का आलम था कि उसके पिता के शव को अंतिम संस्कार के लिए भी इंतजार करना पड़ गया। जीवन में तो वे कई-कई चीजों के लिए इंतजार करते ही रहे। उनके एक पुश्तैनी मकान पर एक बाहुबली ने कब्जा कर लिया तो अदालती इंसाफ  के इंतजार में वे वर्षों टकटकी लगाये रहे। मोतियाबिंद के गलत ऑपरेशन के कारण एक आँख की रोशनी चली गयी तो इलाज के द्वारा रोशनी लौटने का वे महीनों इंतजार करते रहे। बैंक में वे क्लर्क थे, परीक्षा पास करने के बावजूद प्रोमोशन के लिए वे लंबा इंतजार करते रहे। जिस लोकल ट्रेन से वे बैंक जाते थे, वह अक्सर लेट रहा करती थी, उसके इंतजार में उन्हें हजारों घंटे बर्बाद करने पड़े। घर के सामने बिजली के खंभे पर दो ढीले हो गये तार के आपस में टकराने से चिंगारी झड़ती रहती थी, उन्होंने दर्जनों बार कम्पलेन की और ठीक होने का महीनों इंतजार करते रहे। इंतजार करते-करते वे गुजर गये।
शोभन ने अपना दुख व्यक्त करते हुए कहा था, ‘‘नौकरी की किल्लत और दाल-रोटी चलाये रखने के लिए इसे ढोते रहने की मजबूरी न होती तो मैं इस बेसिरपैर की नौकरी को लात मारकर चल देता। कहां तो मैं एक शिक्षक होने चला था। बड़े बड़े आदर्श और उसूल पाल रखे थे। लेकिन बना दिया गया गली-गली, दर-दर भटकने के लिए फेरीवाला, हरकारा(हॉकर) या सेल्समैन। मतदाता सूची में किसी का नाम चढ़ाने या हटाने के लिए घर-घर जाकर पूछना पड़ता है। एक शिक्षक के रूप में मैं अपनी पहचान लगभग भूल चुका हूं। मतदाता सूची को अपडेट बनाये रखना और किसी न किसी (कभी विधानसभा, कभी लोकसभा) का मतदान कराना कभी खत्म न होने वाला (एवर लास्टिंग)काम है, जिसमें मुझे लगभग साल भर जुते रहना पड़ता है।
‘‘मतदाता सूची में दर्ज नाम का कोई व्यक्ति कभी मर जाता है, कोई घर बदल लेता है, लड़कियां शादी करके विस्थापित हो जाती हैं, कोई नौकरी करने के लिए कहीं और चला जाता है, नाबालिग बालिग हो जाता है, कई बार प्रकाशित सूची में क्लर्कियल भूलें रह जातीं हैं, नाम मर्द का और फोटो औरत का लग जाता है, पति, पत्नी और पिता के नाम में भी गंडोगोल हो जाया करता है। मतलब संशोधन का काम सृष्टि रहने तक कभी मुकम्मल नहीं होनेवाला। आदमी तो आदमी, ब्रह्मा भी करें तब भी नहीं। नतीजतन मेरे जैसे जो टीचर इसमें एक बार फंस जाते हैं, वे स्कूल की ड्यूटी से हटाकर बस इसी काम में सिर धुनते हुए खपते चले जाने के लिए मजबूर कर दिये जाते हैं।
‘‘विद्यालय में छूटे हुए एक दो खुशकिस्मत शिक्षक दो-तीन कक्षाओं को एक ही साथ बैठाकर बस पढ़ाई की खानापूरी करते रहते हैं। ऊपर से सरकार बढ़-चढ़ कर तुर्रा यह झाड़ती है कि उसने शिक्षा के अधिकार का बिल पारित कर दिया। मानो बिल पारित करने भर से ही सारा सिस्टम दुरुस्त हो गया और हर कोई पढक़र पंडित बन गया। शिक्षक के बिना शिक्षा। विद्यालय के बिना शिक्षा। अमीरों और बड़े लोगों के लिए अलग शिक्षा, गरीबों के लिए अलग शिक्षा। वाह रे शिक्षा का अधिकार। ऐसे में क्या यह मान नहीं लेना चाहिए कि अन्य अधिकारों की तरह यह अधिकार भी सिर्फ कागजी घोड़ा है। आखिर क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं की जाती कि शिक्षकों को चौराहे का मदारी न बनाया जाये और उससे लिए जाने वाले इतर कार्यों के लिए अलग कर्मचारी या एजेंसी नियुक्त किये जायें। प्रशिक्षित शिक्षकों को इस काम में लगाना शिक्षा के अधिकार कानून का क्या एक भद्दा मजाक नहीं है ?’’
अपने रिश्तेदार शोभन तिवारी की दास्तान-ए ‘जबरिया ढोल’ से दसमेस वाकिफ था। इसलिए उसे पता था कि उसके गले में भी जो जानलेवा जबरिया ढोल लटका दिया गया है, उसे बजाने से वह किसी तरह बच नहीं सकता।
आठ दिन पहले एक बड़े हॉल में पूरे जिले के मतदानकर्मियों को बुलाकर ट्रेनिंग दी गयी। लॉटरी द्वारा बूथ बंटवारे की सूचना घोषित होने पर, इवीएम मशीन और मतदान संबंधी स्टेशनरी आदि को लेने से लेकर बूथ तक पहुंचने और वहां मतदान कराने संबंधी एक-एक कदम तथा अगले दिन शिविर में आकर ईवीएम व सारे दस्तावेज जमा करने के बारे में शुरू से अंत तक पूरी प्रक्रिया समझायी गयी।
जब वह मतदान के एक दिन पहले पूरा चुनाव किट और अंतिम आदेश लेने के लिए जिला प्रशासन द्वारा संचालित चुनाव शिविर में चलने की तैयारी करने लगा तो घर का माहौल बहुत उदास और भारी हो उठा। सब के सब एक गहरे अनिष्ट की आशंका में घिर गये। पत्नी सवेरे से ही पूजा-पाठ व मन्नत मांगने में लग गयी थी। वह उन्हें ढांढ़स देकर सामान्य करना चाहता था, लेकिन उसका अपना ढांढ़स भी साथ कहां दे पा रहा था।
शिविर में उसने सांस रोककर लाउडस्पीकर से की जा रही घोषणा पर कान लगा दिया। पचास-पचपन नाम पुकारे जाने के बाद उसकी बारी आयी। उसकी किस्मत में उसी बदनाम क्षेत्र का एक बूथ घोषित हुआ जिसका इतिहास खूनखराबे का रहा था। उसने अपना माथा पीट लिया। वे नाम भी बताये गये जो उसके साथ पांच अन्य सहायककर्मी जाने वाले थे। बताये गये टेबुल संख्या पर वे सभी मिले और ईवीएम मशीन सहित सारी स्टेशनरी, ड्यूटी करने के एवज में मिलने वाले पैसे और खाने के लिए चूड़ा-गुड़-सत्तू आदि रिसीव करने के लिए वह लाइन में लग गया। चूंकि उसे पीठासीन पदाधिकारी का तमगा मिला था, इसलिए रिसीविंग पर दस्तखत उसे ही करना था। दो घंटे तक उसे लाइन में लगा रहना पड़ा।
उस बूथ के नाम से टीम के सभी सदस्यों के चेहरों पर एक मातमी रंग पसर गया था। उन्हें एक ट्रैक्टर का नंबर दिया गया जिस पर सवार होकर अब सीधे यहां से कूच कर जाने का निर्देश था।
शिविर परिसर में ही भिन्न-भिन्न प्रकार के सैकड़ों चार पहिया वाहन खड़े थे। दस दिन पहले से ही प्रशासन इन्हें ड्राइवर समेत पकडऩे का अभियान चला रहा था। पकड़ी गयी इन तमाम गाडिय़ों के मालिक और ड्राइवर भी कई तरह की परेशानियों और दहशत में घिरे थे। चुनाव का हर मौसम उनके लिए मुसीबत बनकर आता रहा है। इन मौसमों में आम जनता को भी कई तरह की फजीहतों से गुजरना पड़ जाता है। अधिकांश वाहनों के पकड़े चले जाने के कारण कहीं भी आना जाना मुश्किल और महंगा हो जाता है। बाजार में सब्जी तथा अन्य सभी उपभोक्ता सामग्रियों की भारी किल्लत हो जाती है और उनके मनमाने दाम चुकाने पड़ जाते हैं।
दसमेस ने अपना ट्रैक्टर नंबर ढूंढकर सारी सामग्री चढ़वा दी। उसे बताया गया कि उसके आगे आगे सीआरपीएफ की एक जीप भी जायेगी। जोखिम कितना बड़ा है, उसे इसका भान हो गया। उसे लगा कि पांच-दस मिनट के लिए भी एक बार घर हो आना ठीक रहेगा। क्या पता किस हालत में उसका लौटना हो। पास ही दो किलोमीटर के दायरे में उसका घर था। वह साथ जाने वाली टीम के साथियों से थोड़ी मोहलत लेकर चल पड़ा।
घर पहुंचकर वह कुछ बहुत जरूरी और खुद तक ही सीमित मालूमात से पत्नी को अवगत कराने लगा, ताकि न लौटने की स्थिति में उसे किसी बेबसी का सामना न करना पड़े। किस एकाउंट में कितने पैसे हैं, इंश्योरेंस के पेपर किस फाइल में हैं, उसकी गैरहाजिरी में किस-किस दोस्त से मदद ली जा सकती है, बाबूजी को अगले किस दिन डॉक्टर के पास ले जाना है। पत्नी रोने लगी, एक काल्पनिक सदमे को सोचकर। उसने उसे अपने गले से लगाकर सांत्वना दिया कि जो भाग्य में बदा होगा, उसे कौन टाल सकता है। यह कहकर वह घर से तेजी से निकल गया। अच्छा था कि बच्चे स्कूल गये हुए थे।
जिस बूथ पर उसे ड्यूटी मिली थी, वह मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर एक पहाड़ के उस पार एक निपट बीहड़ क्षेत्र में अवस्थित था। उसी बूथ पर जाते हुए पिछले चुनाव में गोलीबारी दहुई थी और दो मतदानकर्मी बुरी तरह घायल हो गये थे। इसे अति संवेदनशील बूथ का दर्जा प्राप्त था। गाड़ी जाने का रास्ता पहाड़ के इस पार तक ही था। इसी पार एक सीआरपीएफ कैम्प था। पुलिस वालों ने कहा कि रात में हम सबको यहीं रुक जाना है और अगले सुबह पैदल ही निकल जाना है। सीआरपीएफ  कैम्प के इंचार्ज ने सहानुभूति दर्शाते हुए सबके खाने-पीने का इंतजाम कर दिया। पुलिस वालों ने हिदायत कर दी कि कल गाँव में खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं रहेगा। चूड़ा और सत्तू पर ही गुजारा करना पड़ सकता है। इसलिए मेस में रात का कुछ बचा-खुचा हो तो उसे ले लें।
देर रात गये जमीन पर बिछी चटाई पर ओघड़ाने का मौका मिला। चिंता के कारण आंखों में नींद आधी-अधूरी ही थी। तडक़े भोर में ही पुलिसवालों ने जगा दिया और कहा कि पहाड़ से होते हुए 10 किलोमीटर पैदल जाना है, इसलिए जितना जल्दी संभव हो, निकल चलिए। सबके सब अधनींदे उठे और फटाफट दिशा फरागत करके तैयार हो गये।
गांववालों को सौदा-सुलुफ  करने के लिए पहाड़ के इस पार के बाजार में ही आना पड़ता था। उनका एक रास्ता बना हुआ था। लेकिन पुलिस वालों ने कहा कि हमें इस रास्ते को छोडक़र जंगल, पहाड़ और खेत से बिना लीक वाली जगह से गुजरना होगा। चूंकि बने हुए चालू रास्ते पर कहीं भी लैंड माइन बिछी हो सकती है। दसमेस पांडेय और उसी की तरह की थुलथुल कद-काठी के दो साथियों की तो आंखों के आगे अंधेरा छा गया। आज तो उनका कचूमर निकलना तय है। एक तो दस किलोमीटर पैदल जाना और उस पर टेढ़े-मेढ़े पथरीले और कंटीले रास्ते से।
गिरते-पड़ते और हांफते-बिसूरते किसी तरह वे पहुंच गये और दो कमरे वाले एक खंडहरनुमा छतविहीनस्कूल मेें मतदान की तैयारी करने लगे। सीआरपीएफ वालों ने चारों दिशाओं में फैलकर मोर्चा संभाल लिया। दस बजे के आसपास मतदान शुरू कर दिया गया। किसी में वोट डालने का कोई खास उत्साह नहीं दिख रहा था। इक्के-दुक्के लोग आ रहे थे। बूथ के अंदर बेंच पर कुछ पार्टियों द्वारा अधिकृत चार लडक़े पोलिंग एजेंट के तौर पर बैठे थे। पुलिसवालों ने कह रखा था कि चार बजे तक सारा कुछ समेटकर हमें निकल जाना है। दो बजे तक बमुश्किल 20 प्रतिशत वोट कास्ट हुआ था। दसमेस मन ही मन सोच रहा था कि भाड़ में जाये प्रतिशत, बस किसी तरह शांति से सब कुछ गुजर जाये और हम यहां से सुरक्षित निकल जायें।
पुलिस निश्चिंत सी होकर अपनी पीठ थपथपाने के मूड में दिखने लगी थी कि इस दफा गड़बड़ी करने वालों की हवा निकाल दी गयी। तभी तीन बजते-बजते पन्द्रह लडक़े आकर लाइन में लग गये। उनमें से एक ने अपने चेहरे पर आक्रामक रौब लाते हुए कहा, ‘‘आप सभी लोग खामोश बैठे रहो। सारे गैरहाजिर वोटरों के वोट हमें कास्ट करने हैं। राजी-खुशी से वोटर लिस्ट में टिक मारते रहो और हमें बारी-बारी से ईवीएम का सिग्नल देते जाओ, हम बटन दबाते जायेंगे। अगर ना-नुकूर करोगे तो हमें जबर्दस्ती करनी होगी।’’
दसमेस पांडेय ही चूंकि इस मतदान केन्द्र का सबसे बड़ा पदधारी था। फैसला उसे ही करना था। वह बुरी तरह घबरा गया और क्या करे, क्या न करे की दुविधा में घिर गया। एक पोलिंग एजेंट ने उसकी मनस्थिति भांप ली। उसे लगा कि शरीफ  जैसा दिखने वाला यह आदमी कहीं सिद्धांत और कर्तव्य पालन के चक्कर में पड़ गया तो नाहक मारा जायेगा।
उसने पांडेय को धीरे से एक किनारे बुलाया और मार्गदर्शन करने के भाव से कहा, ‘‘मैंने कई चुनाव देखे हैं। इधर में ऐसा ही चलता है। इनसे रार लेकर मुसीबत बुलाना अक्लमंदी नहीं है। बेहतर है कि ये जो करते हैं करने दीजिए। आखिर आप इन्हें रोककर क्या हासिल कर लेंगे। जो भी जीतेगा या जो भी हारेगा, उससे आपका तो कोई लेना देना है नहीं। ऐसे भी जीतने वाला कौन सा पुरुषोत्तम राम होगा। कोई बाहुबली, अपराधी, दबंग या लंठ जैसा ही तो होगा। शरीफ  या भले आदमी को न तो मौका मिलता है राजनीति में आने का और न तो वह खुद आना ही चाहता है। तो जो भी जीतेगा वह एक गलत और घटिया आदमी ही होगा, जिससे आपका या हमारा कोई परिचय नहीं, फिर हम क्यों जोखिम उठायें। लॉ एंड आर्डर के लिए पुलिस है, मजिस्ट्रेट है, वे जब आँख मूंदकर कहीं किनारे दुबके हुए हैं तो आप अपनी गर्दन इसमें क्यों फंसायें? पुलिसवाले भी यही सोच रहे होंगे कि शांति से जो काम हो रहा है, उसे होने दो।’’
दसमेस ने महसूस किया कि यह लडक़ा बहुत सही और खरी राय दे रहा है। उसने उसकी बात मान ली। फिर उन लडक़ों ने इस बूथ के कुल वोटरों में से दस-बीस को छोडक़र सारे वोटरों के बोगस वोट कास्ट कर दिये।
लडक़ों ने जाते-जाते चेतावनी दे दी,‘‘बोगस वोटिंग की खबर ऊपर नहीं जानी चाहिए। अगर गयी और वोटिंग रद्द हुई तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। हमारा नेता घर तक पहुंचकर हिसाब-किताब चुकता करवा देगा।’’
पूरी टीम उसी रात वापस हो गयी। दसमेस भरे हुए सारे औपचारिक कागजात और ईवीएम मशीन लेकर जिला प्रशासन के चुनाव शिविर में आ गया और जमा करने वाली लंबी लाइन में लग गया। ढाई घंटे के बाद उसका नंबर आया। जमा करके वह रात तीन बजे घर पहुंचा। थकान और फजीहत से उसका चेहरा कुम्हला सा गया था।
पत्नी, उसके बच्चे और उसका साला शोभन उसके आने के बारे में तरह तरह के कयास लगाकर एक-दूसरे को समझा रहे थे। बैटरी डिस्चार्ज हो जाने की वजह से मोबाइल से संपर्क नहीं हो पाया था। जहां वह गया था वहां न बिजली थी, न टावर था।
शोभन तिवारी को इस बार नजदीक का ही एक अच्छा बूथ मिल गया था। इसलिए वह शाम को ही घर लौट आया और सांत्वना देने के मकसद से अपनी बहन के पास आ गया। दसमेस को सकुशल वापस देखकर सभी खुश हो गये, जैसे उनकी कोई दुर्लभ व अप्रत्याशित मनोकामना पूरी हो गयी। लेकिन दसमेस के चेहरे पर अभी भी एक दहशत मौजूद थी और उसे लग रहा था जैसे सौ-पचास जूते खाकर वह घर लौटा हो।