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Saturday 18 Nov 2017

कौन देस को वासी


सूर्यबाला
बी, 504 रुनवाल सेंटरगोवंडी स्टेशन रोड देवनार मुंबइ-88
मो. 9930968670
आपकी मोगरे वाली महमह वेणी कहां गई आंटी? न्यूजर्सी में विशाल के पिता को देख कर अचकचा गया था मैं। मां-बाप दोनों थे। आना पहले ही था उन्हें, जब मानिनी की डेलीवरी थी लेकिन अमेरिकन कौन्सुलेट के वीसा अफसर को जाने क्या सूझा कि अचानक ही फार्म पर लिखीं तारीखें देख उसे शुबहा हो गया कि अभी-अभी रिटायर हुए पिता-माता अवश्य ही अमेरिका में रह रहे बेटे-बहू के पास स्थायी रूप से बस जाने की सोच रहे हैं। कैंसल का ठप्पा लगा कर फार्म वापस पकड़ा दिया। कहने सुनने की कोई गुंजाइश ही नहीं। हक्के-बक्के सहमे बुजुर्ग दंपति घर लौट गए थे। जैसे सरेआम किसी ने बेइज्जत कर दिया हो। जैसे वीसा नहीं, भीख मांगने गए हों और दुरदुरा कर बाहर की तरफ  उंगली दिखा दी गई हो। मतलब तो यही निकला न कि वे लोग झूठे हैं। कौंसुलेट को झांसा देकर उनके देश में बसने जा रहे हैं। बेइज्जती और अपमान जैसे चेहरों पर लिख गया हो लेकिन लोग थे कि पूछने से बाज नहीं आते-अरे, ऐसे कैसे कैंसिल कर दिया? आप लोगों ने कहा नहीं।
ऊपर से विशाल फोन पर अलग झुंझलाया- जरूर कुछ ऊटपटांग बोल आए होंगे आप लोग। कितना समझाया था, बहुत सावधानी से सिर्फ  जरूरत भर, जो पूछे उसी का टू द पांइंट बोलना है, लेकिन क्या? वही बोला, मां से भी पूछा क्या? अंग्रेजी में? तब तो पूरा बेड़ा गर्क? खैर जाने दीजिए। मानिनी की मां को आने के लिये फोन कर दिया है, डेलीवरी तक पहुंच जायें तो भी गनीमत। ज्यादा वे भी नहीं रूक पायेंगी। मानिनी के पिता डायबेटिक जो ठहरे।
उदासी गहरा आई। दूने अपराध बोध की मार। कितने चाव से पड़ोसन के साथ बाजार जा कर खरीदारी की थी। झालर लगे रंग बिरंगे झबले, देवा! मुलगा-मुलगी जो भी आये, पहन सके। बिठोबा के लॉकेट वाली आधे तोले की चेन भी। रवा लाडू, करंजी, शकर पारी और लो, वीसा ही कैंसिल। तब के अटके अब कहीं जाकर आ पाये। उन्हें देख कर अचकचाया था मैं। सहसा पहचान में ही नहीं आये दोनों। पतली सी चोटी और लंबे झल्ले गाउन वाली मां और विशाल का पुलोवर और जीन्स पहने पिता। यह क्या सूझी इन्हें!  कुछ सालों पहले ही तो देखा था, मिला था दोनों से इंडिया में। इन्हीं के घर। वृंदा की शादी में इंडिया जाते समय विशाल ने एक छोटा सा पैकेट दिया था, अपने घर, शहर के नाम पते का कि इंडिया पहुंच कर कुरियर कर देना। लेकिन पहुंचने पर मां का कहना था कि कुल एक साल पहले औचक अचानक बड़े फूफा के हार्ट अटैक से गुजर जाने के बाद, निसंतान अकेली बड़ी बुआ से मिलने मुझे भी जाना ही है और वृंदा की शादी के लिये अपने साथ लिवा भी लाना है।  नक्शे में देखा तो तीन स्टेशन पहले ही शंकरगढ़। उतर लिया था जाते समय। हरी किनारी वाली बैंजनी नारायणपेठ साड़ी में कैसी खिली पड़ रही थीं आंटी। माथे के बीचों बीच बड़ी सी बिंदी और जूड़े में महमह करती मोगरे की वेणी। अमरीका से आने वाले, बेटे के दोस्त का उतावली से इंतजार कर रहे थे दोनों। सलेटी बुशर्ट और पैंट में कितने तपाक से मिले थे अंकल, जैसे जनसंख्या विभाग में इन्सपेक्टर न होकर किसी रियासत के मालिक हों। स्टील की नई चमचमाती प्लेटों में चिवड़ा, करंजी, चकली और शेंग। दोनों में मुझे खिलाने की होड़ सी लगी थी। बेटे की बात करते हुए सीना जितना भी चौड़ा था उससे बालिश्त भर चौड़ा तो नजर आता ही था। कहां कहां की बातों में बीच गुंथी विशाल की बातें। आंटी रोकते न रोकते बोल पड़ी थीं-तुम्हीं, तू क्या आया, जैसे विशाल ही आया। तुम्हें खिला रही हूं तो विशाल को खिलाने जैसा सुख, खुशी, माझा विशाल मेरे बेटे के पास से आये हो। फिर दूर रह रहे बेटे का विछोह छुपाने को कहां कहां की बातें, हम तो नाम के मराठी हैं, विशाल के परदादा जी काशी नरेश के राजदरबारियों में। राग माला पर कई बंदिशें बनाई। दरबार में मुहरें जीतीं। बाद को रियासत खत्म हुई, कलावंत नहीं रहे, न कला के पारखी, विशाल के बाबा तक राग-रागिनियों की पुस्तकें सहेजी रखीं गई, महाराज के हस्ताक्षरों वाली। अभी भी एकाध होंगी पुराने बक्सों में। हमारे पुरखों के लिये गंगा के घाटों और बाबा विश्वनाथ के मंदिर से बढक़र पृथ्वी पर कोई दूसरे जगह नहीं थी। कितनी कहानियां, कितने किस्से। दरबारों में गुजराती, मराठी, बंगाली, कथक सबका आपसी भाईचारा।
यहां विशाल के अपार्टमेंट में वे कुछ नहीं पूछ रहीं। नमस्ते और हाय के बीच एक सहमी, निरीह मुस्कान। निस्तेज, सकुचाई।
पता चला, सलवार-कुर्ते में उन्हें शरम आती है। कभी पहना नहीं न! हमेशा नउवारी साड़ी बांधी। लाचारी में यह गाउन। साड़ी सुखाना और मेन्टेन करना इज रियल प्रॉब्लम नो यहां? मानिनी समझाते हुए उनका स्पष्टीकरण दे रही थी या अपना?
लेकिन मेरे अंदर एक उटपटांग बगावत चल रह रही थी। मन कर रहा था, अंकल को झकझोर कर पूछूं - आपकी वो वाली सलेटी बुशर्ट और पैंट क्या हुई? कुछ पता है, इस पुलोवर और जीन्स में कितने निरीह और हास्यास्पद लग रहे हैं आप? और तो और, खुल कर हंसना भी भूल गए? मुस्करा भी रहे हैं तो पूरी सतर्कतापूर्वक, विशाल की ओर देखते हुए, जैसे हर क्षण आदेश पालन के इंतजार में। शीशे में देखिये, क्या से क्या हो गए हैं आप? और आंटी! इतने फूल हैं अमेरिका में, आपकी वेणी के लिये एक फूल नहीं।
अचानक मन में कौंधा, अपने पिता भी तो देर सबेर आयेंगे ही, मैं उन्हें अपने कपड़े हर्गिज हर्गिज नहीं पहनने दूंगा।
मैं चाय बनाऊं क्या? कहते हुए आंटी ने मानिनी की तरफ  इस तरह देखा जैसे घोर असमंजस अनिश्चय और आशंका के बीच वे समझ नहीं रही हों कि यहां, इस समय, यह पूछना ठीक है कि नहीं। उनका रोल क्या है इस वक्त? बैठी भी रहें या नहीं?
मैं कहना चाहता था, कह कर उन्हें हंसाना चाहता था कि लीजिए इसमें पूछना क्या है? सिर्फ  चाय क्यों चिवड़ा करंजी और शेंग नहीं लायेंगी क्या?
लेकिन मानिनी ने उन्हें टोकते हुए कहा था-नहीं, मैं लाती हूं कोल्ड कॉफी, आप जरा दीवा के बाथ की तैयारी कर दीजिए। ठीक है, ठीक है और वे आदेश पालन की मुद्रा में आज्ञाकारी भाव से उठ गईं।  मानिनी ने जैसे खुली हवा में सांस ली। एक्चुअली विकास ने भी आने को बोला है। मैं वेट कर रही थी कि वो भी आ जाये तो इक_े कॉफी लाऊं, वो लो, ग्राउंड फ्लोर का यही तो फायदा, देखो विकास की ही कार है न विशु।
नाम तो इसी डेयर डेविल का लिया था न। हमने एक साथ ठहाका लगाया। अंकल थोड़ी देर हमारे बीच, थोड़ी बहुत येस, नो करते मुसकुराते रहे फिर धीमे से उठ गए।
विकास को देख कर अच्छा लगा। चेहरा वैसा ही, सहज-मुखमुद्रा लेकिन चेहरे पर आत्मविश्वास की एक रौनक सी।
अच्छा हुआ। तू भी मिल गया। मुझे तो पता ही नहीं था, तुम इसी शहर में हो।
शहर? कैसा शहर? मैं तो विलेजर हूं भई, न्यू जर्सी में तो दो दिनों से कंपनी की वसूली पर निकला हूं। पता चला , पूरे चार साल सूरज निकलने के पहले घर से क्लास, कोचिंग, लाइब्रेरीज के यहां से वहां चक्कर काटने के बाद कहीं जा कर यूएस एमएलसी क्लियर कर पाई है मनीषा। और फिर अनवरत, अथक अर्जियों आवेदनों का नतीजा है। मनीषा को किंग्सटन में मिली रेसीडेन्सी ..
क्या? किग्ंसटन, व्हाइ दैट फार। बहुत दूर है यार।
बेगर्स हैव नो च्वॉयस। तो हम दोनों अभी स्ट्रग्लर्स हैं।
मुश्किल ही सही, पर स्ट्रगल तो अब खत्म हुई न!
सिर्फ कागजों पर या अच्छे दिनों की उम्मीद कह लो। प्रैक्टिकली तो हमारा बेस्ट टाइमपास अभी मनीषा के एजूकेशन लोन की किश्तों का हिसाब रखना और किंग्सटन से फिलाडेल्फिया के दूसरे छोर पर स्थित अपने ऑफिस आने-जाने के लिये ढाई-ढाई घंटे मिला कर पांच घंटे ड्राइव की हिम्मत और गैस (पेट्रोल) जुटाना है।  सो कोई बात नहीं, भविष्य में एक न एक दिन, मर्सिडीज या बीएमडब्लू के ख्वाब देखते हुए, टाइम पास करना कुछ खास मुश्किल नहीं, विशाल उसकी पीठ पर धप्पा जमाते हुए हंसा। अमेरिका में डॉक्टर बीबी खुली लाटरी की तरह होती है।
चलो, क्या कह गए हैं वो तुम्हारे अंकल गालिब वेणु! दिल को बहलाने को गालिब ये ख्याल अच्छा है। फिर अचानक अपार्टमेंट के दिनों के लतीफे याद करता, आती क्या खंडाला टोन से पूछ बैठा- विशाल के तो अभी बेबी सिटिंग के मुरादों भर दिन हैं पर तेरा क्या? आता है क्या हमारे गांव? आ जाओ वीकेंड पर मेधा के साथ। मनीषा भी, पहले पता होने पर डयूटी एक्सचेंज कर लेगी।
बाहर निकले तो अंकल-आंटी लॉन रेकिंग सूखे पत्ते साफ  करते मिले। ढीले पुलोवर और जीन्स में रेकिंग का लंबा सा त्रिशूल सरीखा फावड़ा थामे, पत्ते बुहारते अंकल और उन्हें खुश-खुश इक_े करती आंटी। वाह! आप लोग तो पूरे अमेरिकन हो गए? अब मुझे समझ में आया विशाल का लॉन इतना साफ  क्यों रहता है?
मैंने देखा, बाहर वे दोनों कम से कम ठीकठाक हंस ले रहे थे। यहां खुले में अच्छा लगता है। कुछ करते रहो तो समय कट जाता है। चारों तरफ  खूब हरा-भरा देख कर भी मन बहलता है।
बिल्कुल अंकल। न्यूजर्सी का यह एरिया है भी खूब ज्यादा हरा-भरा। वैसे भी, मैं इसे एक शहर भर लॉन कहता हूं। जहां देखो हरी-हरी घास। मन करता है हिंदुस्तान के सारे दुबले-पतले चौपायो को लाकर यहां छोड़ दूं।
हां, फिर वे तुझे थैंक्यू कार्ड भेजेंगे, थैंक्स गिविंग डे पर, विशाल ठठा कर हंसा। कहां से कहां पहुंच गई विकास की हंसी! नहीं, मैंने पहले कभी विकास को हंसते देखा ही कहां था!