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Thursday 23 Nov 2017

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से

 

 
2जयशंकर प्रसाद

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से,
प्रबुद्ध शुद्ध भारती।
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला,
स्वतंत्रता पुकारती
अमत्र्य वीर पुत्र हो,
दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो।
प्रशस्त पुण्य पंथ है,
बढ़े चलो बढ़े चलो
असंख्य कीर्ति रश्मियाँ,
विकीर्ण दिव्य दाह-सी।
सपूत मातृभूमि के,
रुको न शूर साहसी
अराति सैन्य सिन्धु में,
सुबाड़वाग्नि से जलो।
प्रवीर हो जयी बनो,
बढ़े चलो बढ़े चलो

(प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद के नाटक चंद्रगुप्त के छठे दृश्य में यह वीर रस का प्रेरणादायक गीत है। )