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Thursday 23 Nov 2017

विप्लव गान


2बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’
कवि! कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल पुथल मच जाये,
एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये।
प्राणों के लाले पड़ जायें, त्राहि-त्राहि रव नभ में छाये,
नाश और सत्यानाशों का, धुवांधार जग में छा जाये।।
बरसे आग, जलधि जल जायें, भस्मसात् भूधर हो जायें,
पाप-पुण्य, सद-असद भाव की, धूल उड़ उठे दायें-बायें।
नभ का वक्षस्थल फट जाये, तारे टूक-टूक हो जायें।
कवि! कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये।।
माता की छाती का, अमृतमय पय कालकूट हो जाये,
आंखों का पानी सूखे, वे शोणित की घूंटे हो जायें।
एक ओर कायरता कांपे, गतानुगति विगलित हो जाये,
अंधे, मूढ़ विचारों की वह, अचल शिला विचलित हो जाये,
और दूसरी ओर कंपा देने वाला गर्जन उठ धाये।
अन्तरिक्ष में एक उसी, नाशक तर्जन की ध्वनि मंडराये,
कवि! कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये।।