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Saturday 18 Nov 2017

अभिलाषा

2 ‘शांत’
नहीं चाहता सुखद राज्य-पद नहीं विश्व-वैभव-भण्डार।
नहीं गगन का चन्द्र सूर्य बन, भोगूं स्वर्गिक-सुख-श्रृंगार।
नहीं दिव्य मणि माला भूषित, कण्ठ बनाऊंगा अपना।
नहीं स्वार्थ का यत्किञ्चित भी, देख सकूंगा मैं सपना।
नहीं देख बाधा-विपदाएँ, हृदय जरा भी तुम कंपना।
नहीं कर्म करने में प्यारे, नयन बन्धुओ! तुम झपना।
बान यही हो जन्म जन्म ही, रखें देश-माता का मान।
काम पड़े जब, बलिवेदी पर, हंसते-हंसते हों बलिदान।

(‘महारथी’- फरवरी, 1928)